ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनष्ट होना शरीरका स्वभाव है- तथा सारा शरीर जात । स्वभावसे है नाशवंत । इसलिये हो युद्धरत । ऊठ अर्जुन ॥ ३६ ॥ य एनं वेत्ति हंतारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हंति न हन्यते ॥ १९ ॥ परिवर्तन देहोंका है, बाहरी है - धर तू देहका अभिमान । शरीरको ही सर्वस्व मान । मारता मैं मरते आप्त जन । कह रहा है ॥ ३७ ॥ अर्जुन ! तू यह नहीं जानता । यदि विचार करे तो तत्वता । तू नहीं हैं किसीका वधिता । न ये हैं बध्य ॥ ३८ ॥ न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥ वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥ जैसे स्वप्नका है दृश्य । स्वप्नमें ही है सत्य । जगकर देखें तो अदृश्य । वैसे ही ॥ ३९ ॥ कहे जो मारता आत्मा और जो मरता कहे । दोनों न जानते तत्व मार या मरता न जो ॥ १९ ॥ न जन्म पाता न कदापि मृत्यु होता न पीछे न आगे न होगा । अजन्म जो नित्य सदा पुराण देही न मरता नाशे भी देह ॥ २० ॥ जानता जो निर्विकार अनाशी नित्य अव्यय । कैसे वह मरता या मारता किसको कब ॥ २१ ॥ ४७ सांख्ययोग.