ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
नष्ट होना शरीरका स्वभाव है- तथा सारा शरीर जात । स्वभावसे है नाशवंत । इसलिये हो युद्धरत । ऊठ अर्जुन ॥ ३६ ॥ य एनं वेत्ति हंतारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हंति न हन्यते ॥ १९ ॥ परिवर्तन देहोंका है, बाहरी है - धर तू देहका अभिमान । शरीरको ही सर्वस्व मान । मारता मैं मरते आप्त जन । कह रहा है ॥ ३७ ॥ अर्जुन ! तू यह नहीं जानता । यदि विचार करे तो तत्वता । तू नहीं हैं किसीका वधिता । न ये हैं बध्य ॥ ३८ ॥ न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥ वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥ जैसे स्वप्नका है दृश्य । स्वप्नमें ही है सत्य । जगकर देखें तो अदृश्य । वैसे ही ॥ ३९ ॥ कहे जो मारता आत्मा और जो मरता कहे । दोनों न जानते तत्व मार या मरता न जो ॥ १९ ॥ न जन्म पाता न कदापि मृत्यु होता न पीछे न आगे न होगा । अजन्म जो नित्य सदा पुराण देही न मरता नाशे भी देह ॥ २० ॥ जानता जो निर्विकार अनाशी नित्य अव्यय । कैसे वह मरता या मारता किसको कब ॥ २१ ॥ ४७ सांख्ययोग.
जान तू ऐसी है यह माया । भ्रममें तू है व्यर्थ ही गया । शस्त्रसे वध किया तो छाया । न टूटता अंग ॥ १४० ॥ अथवा पूर्ण कुंभ उलट । दीखता बिंबाकार है टूटा । किंतु भानु-बिंब है अटूट । वैसे ही ॥ ४१ ॥ अथवा जैसे मठमें आकाश । मठकृतिसे बना मठाकाश । भंगनेसे मठके समावेश । महदाकाशमें ॥ ४२ ॥ लोप होनेसे वैसे शरीरका । नाश न होता कभी स्वरुपका । तभी आरोप न कर नाशका । भ्रांतिसे तू ॥ ४३ ॥ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान् अन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥ जैसे जीर्ण वस्त्रको त्यजते । फिर नवीनको हैं ओढते । वैसे देहान्तर स्वीकारते । चैतन्यके ॥ ४४ ॥ नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥ अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥ उतारके जर्जर जीर्ण वस्त्र मनुष्य लेता दुसरे नवीन । तथैव तजके शरीर जीर्ण आत्मा भी लेता दुसरे नवीन ॥ २२ ॥ इसे न चुभते शस्त्र इसे अग्नि न बालता । न गलाता इसे पानी इसे वायू न सोखता ॥ २३ ॥ छिदता जलता ना जो गलता सूखता नहीं । स्थिर निश्चल है नित्य सर्व-व्यापी सनातन ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४८
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥ है यह अनादि नित्य सिद्ध । निरुपाधि तथा विशुद्ध । इससे शस्त्रादिकोंसे छिद्र । न होता यह ॥ ४५ ॥ प्रलयोदकसे यह न भीगता । अग्निदाह यहां न संभवता ! महाशोषका प्रभाव न होता । मारुतके ॥ ४६ ॥ अर्जुन यह है नित्य । अचल तथा शाश्वत । सर्वत्र यह सदोदित । परिपूर्ण होता है ॥ ४७ ॥ अजी ! दृष्टिसे तर्ककी । भेंट न होती इसकी । ध्यानको इसकी भेंटकी । उत्कंठा है ॥ ४८ ॥ मनसे न होता प्राप्त । साधनासे अप्राप्त । निःसीम यह पार्थ । पुरुषोत्तम ॥ ४९ ॥ है गुणत्रय रहित । व्यक्तिकेलिये अतीत । अनादि औ' अविकृत । स्वरुप इसका ॥ ५० ॥ अर्जुन इसको ऐसे जानना । सकलात्मक रूप ही देखना । इससे सहज ही शोक पूर्ण । मिटेगा तेरा ॥ ५१ ॥ अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥ यदि तू ऐसा नहीं जानता । अन्तवन्त ही इसे मानता । तब भी कहो कैसी है चिन्ता । पांडुकुमार ॥ ५२ ॥ जो है आदि स्थिति अंत । है निरंतर औ' नित । प्रवाह है अनुस्यूत । गंगा जलका-सा ॥ ५३ ॥ अचिंत्य वह अव्यक्त निर्विकारी कहे सब । ऐसी है जानके आत्मा तेरा शोक अकारण ॥ २५ ॥ अथवा देखता तू है जन्म-मृत्यु प्रति-क्षण । तो भी तुझे न है कोयी शोकका योग्य कारण ॥ २६ ॥ ४९ सांख्ययोग (7)
आदि भी वह अखंड रहता । अन्तमें है सागरसे मिलता । मध्यमें वह बहता रहता । दीखता वैसे ॥ ५४ ॥ वैसे ही यहां ये तीन । चलते एक समान । असंभव है अर्जुन । रोकना इसको ॥ ५५ ॥ इसलिये इस बातका । कारण नहीं शोकका । स्वभाव ही है इसका । मूल रूपसे ॥ ५६ ॥ न तो भी सुन अर्जुन । जीव जन्म मरणाधीन । देख कर यह कारण । शोक है व्यर्थ ॥ ५७ ॥ इससे यहां कुछ नहीं । शोकका कारण भी कहीं । टलता यहां कभी नहीं । जन्म औ' मरण ॥ ५८ ॥ जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥ अजी ! जन्मता जो सो नाशता । नाशता सो है पुनः दीखता । जैसे घटिका-यंत्र चलता । वैसे ही पार्थ ॥ ५९ ॥ या उदयास्त जैसे स्वभावसे । अखंडित होते जाते हैं वैसे । जन्म-मरण भी विश्वमें वैसे । हैं अनिवार्य ॥ १६० ॥ महाप्रलयके अवसर । होता त्रिभुवनका संहार । इसीलिये नहीं परिहार । आदि अन्तका ॥ ६१ ॥ जानकर तू यह मनमें । पडता क्यों व्यर्थ ही दुःखमें । जानकर बनता जनमें । पागलका--सा ॥ ६२ ॥ सब ढंगसे पार्थ । शोक है सब व्यर्थ । दुःखदायह सर्वथा । नहीं विषय ॥ ६३ ॥ तय है जन्मसे मृत्यु मृत्युसे जन्म निश्चित । अटल उसका जो है व्यर्थका शोक है यह ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ५०
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥ हैं यहां ये भूत समस्त । जन्मके पहले अमूर्त । फिर किया व्यक्तित्त्व प्राप्त । जन्म लेके ॥ ६४ ॥ मिटाकर अपना आकार । नाशसे बनते निराकार । जाते हैं मूल-रूपमें और । यथा स्थिति ॥ ६५ ॥ मध्यमें जो प्रतिभासे । निद्रितका स्वप्न जैसे । वैसे आकार मायासे । है सत्यरूपका ॥ ६६ ॥ न तो वायुने छेड़ा नीर । बना जैसे तरंगाकार । परापेक्षासे अलंकार । दीखता सोनेमें ॥ ६७ ॥ वैसे सकल हैं यह मूर्त । जान ले तू मायाका है रीत । जैसे आकाशमें है बिंबित । बादल सारे ॥ ६८ ॥ नहीं यहां जो मूलता । उसके लिये है रोता । देख तू नित तत्वता । चैतन्यएक ॥ ६९ ॥ उसकेलिये होकर पार्थ । विषय तज करके संत । रहते हैं सदैव विरक्त । एकांतमें ॥ १७० ॥ दृष्टि रखकर जिस पर । ब्रह्मचर्यादि व्रतको कर । तपाचरते मुनीश्वर । अनन्य हो ॥ ७१ ॥ आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम् आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥ अव्यक्त मूल भूतोंका मध्य है व्यक्त भासता । पुनः है अंत अव्यक्त इसमें शोक है कहां ॥ २८ ॥ आश्चर्य कोयी अवलोकता है आश्चर्य कोयी कहता यही है । आश्चर्य है वर्णित अन्य बातें सुने भी ना जान पाता इसे हैं ॥ २९ ॥ ५१ सांख्ययोग
अन्तरमें एक निश्चल । देख करके जो केवल । भूल गये हैं जो सकल । संसार मात्र ॥ ७२ ॥ गुणगान करता । उपरत हो चित्त । सदैव तल्लीनता । रहते हैं वे ॥ ७३ ॥ शांत होते सुनकर । देहभान भूलकर । पाते तद्रूप होकर । अनुभाव ॥ ७४ ॥ जैसे नदी-नद बहकर । सागरमें नहीं मिलकर । परांग्मुख आते लौटकर । ऐसा नहीं होता ॥ ७५ ॥ वैसे है योगियोंकी मति । पाकरके आत्मानुभूति । पुनः देह-तादात्म्य वृत्ति । पाती । नहीं ॥ ७६ ॥ देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वंशोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥ देहमें जो सर्वत्र बसता । उसका घात कभी न होता । देख वह विश्वात्मक सत्ता । चैतन्य एक ॥ ७७ ॥ स्वभाव ही है इसका । होता जाता है सबका । इसमें क्या है शोकका । यहां कारण ॥ ७८ ॥ न तो भी हे अर्जुन । न जाने क्यों बुद्धिमान । शोक करना है हीन । सब प्रकारसे ॥ ७९ ॥ स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥ क्षात्र धर्म महता— अबतक तू क्या सोचता । यह कैसी चिन्ता करता । स्वधर्म को ही है भूलता । जो है तारक ॥ १८० ॥ अमर नित्य जो आत्मा सबके देहमें बसा । इससे भूत-मात्रोंमें नकर शोक तू कभी ॥ ३० ॥ स्वधर्म देखके यों भी न योग्य डिगना तुझे । क्षत्रियोंको नहीं कोयी श्रेष्ठ है धर्म-युद्धसे ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५२
कौरवोंका हुआ अनुचित । अथवा तेरा ही हुआ घात । या मानो हो गया है युगांत । तो भी यहां ॥ ८१ ॥ स्वधर्मे यह रहता एक । सदा जो आचरणीय नेक । तुझे वह है कृपा पूर्वक । तारेगा ही ॥ ८२ ॥ अर्जुन तेरा जो चित्त । हुआ यदि द्रवीभूत । किंतु यह अनुचित । संग्राममें ॥ ८३ ॥ हुवा यदि गायका दूध । पथ्यमें हुआ इससे बाध । करेगा विषसा प्रमाद । नव ज्वरमें ॥ ८४ ॥ वैसे असमयमें अनुचित । इससे होगा हितका घात । इसलिये हो सावध चित । कार्यकर ऊठ ॥ ८५ ॥ व्याकुल है तू अकारण । कर स्वधर्मका आचरण । उससे होगा सब रक्षण । तीनों कालमें ॥ ८६ ॥ जैसे सरल पथपे चलना । उपाय है अपायसे बचना । या है दीप प्रकाशमें चलना । न लगे ठोकर ॥ ८७ ॥ वैसे सुन तू अर्जुन । करस्वधर्माचरण । सकल कामना पूर्ण । होती हैं ॥ ८८ ॥ देखो इससे अन्य नहीं । क्षत्रियकेलिये जो सही । रणके बिन कछु कहीं । उचित धर्म ॥ ८९ ॥ हो करके निष्कपट । लडना अति विकट । देखना क्या रही बाट । प्रत्यक्षमें यहां ॥ १९० ॥ यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥ स्वधर्माचरणकी अपूर्व स्वर्णसंधि— यह है युद्ध आजका । फल है तेरे दैवका । धरोहर है धर्मका । हुआ प्रकट ॥ ९१ ॥ हुवा प्राप्त अनायास स्वर्गका द्वार है खुला । भाग्य शाली क्षत्रियोंको मिलता धर्म-युद्ध है ॥ ३२ ॥ ५३ सांख्ययोग
इसे युद्ध कहे कैसा। यह है स्वर्गरूप सा । या तब प्रताप ऐसा । उत्तर आया ॥ ९२ ॥ या तेरे गुणों पर हो लुब्ध । उत्कट भावसे करबद्ध । स्वयंवरार्थ होकर सिद्ध । आयी है कीर्ति ॥ ९३ ॥ क्षत्रियों को अतीव पुण्यसे । लडने मिलते युद्ध ऐसे । मिलती है चिंतामणि जैसे । राह चलतेको ॥ ९४ ॥ अथवा देते हुये जंभायी । अमृतबूंद टपक आयी । ऐसी है यह लडाई आयी । स्वाभाविक हो ॥ ९५ ॥ अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥ करके इसकी अवहेलना । व्यर्थका शोक करते बैठना । अपना घात आपही करना । यह है ऐसा ॥ ९६ ॥ पूर्वजोंका जो यश संचित । अपनेसे खोना है निश्चित । शस्त्र त्यजना हो शोकग्रस्त । रणमें यहां ॥ ९७ ॥ इससे नष्ट होगी तब कीर्तिं । विश्व गायेगा तेरी अपकीर्तिं । मिलेगी महापापकी थाथी । निश्चित तुझे ॥ ९८ ॥ वनिता जो भर्तार रहित । होती सर्वत्र अनादरित । वैसे है जीवनका सतत । बिन स्वधर्मके ॥ ९९ ॥ अथवा रण-भूमिका प्रेत । होता गिद्धसे क्षत विक्षत । नर वैसा स्वधर्म रहित । होता महादोषसे ॥ १०० ॥ अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥ ऐसा जो धर्म संग्राम टालेगा यदि तू यहां । पायेगा पाप दुष्कीर्ति तजके धर्म युद्ध को ॥ ३३ ॥ सदैव लोग गायेंगे तेरी दुष्कीर्ति विश्वमें । अकीर्ति मृत्युसे हीन मानी पुरुषके लिये ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४
यदि तू स्वधर्म छोडेगा । महापापका भागी होगा । कल्पांतमें भी न मिटेगा । कलंक अकीर्तिका ॥ १ ॥ भलोंको तब तक ही जीना । जब तक कुयश न पाना । इससे कैसे अब बचना कह तू अर्जुन ॥ २ ॥ निर्मत्सर तू सहृदयतासे । जायेगा लौट रण-भूमिसे । किंतु सभी न मानेंगे इसे । युद्ध भूमिमें ॥ ३ ॥ घेरेंगे यहां चहूं ओर । चलेंगे तीर पर तीर । कैसे होगा यहांसे पार । कृपालुतासे ॥ ४ ॥ इस प्राण संकटसे मुक्त । हुआ तो अपकीर्तिमें लिप्त । ऐसा जीवन भी है निश्चित । मृत्युसे हीन ॥ ५ ॥ भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥ न सोचता तू और एक बात । आया रणमें उत्साह सहित । लौटेगा यदि हो रण विरत । युद्ध भूमिसे ॥ ६ ॥ सोच देख तब अर्जुन । सोचेंगे क्या शत्रु दुर्जन । मानेंगे क्यां सत्य वचन । यह कहो मुझे ॥ ७ ॥ अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥ कहेंगे वे गयारे गया । पार्थ हमसे डर गया । यह वाक्य जो गूंज गया । तब क्या होगा ॥ ८ ॥ अनेक कष्ट करके जन । करते हैं स्वयश रक्षण । समय पे कर प्राणार्पण । आनंदसे ॥ ९ ॥ तुझे वह अनायाससे मिला अनजान भावसे । वह भी अद्वितीय जैसे । आकाश है ॥ २१० ॥ डरके रणसे भागा मानेंगे ये महारथी । मान्य तू इनमें आज पायेगा क्षुद्रता फिर ॥ ३५ ॥ बोलेंगे शत्रु जो तेरे अवाच्य कुत्सित सब । कोसेंगे शौर्य जो तेरा यह है अति दुःखद ॥ ३६ ॥ ५५ सांख्ययोग
कीर्ति है तेरी निःसीम । वैसी ही जो निरुपम । तेरे गुण भी उत्तम । तीनों लोकमें ॥ ११ ॥ नृपति जो हैं त्रिभुवनके । गाते हैं गीत भाट बनके । डरते गीत सुनकरके । कृतांत भी वे ॥ १२ ॥ ऐसी तेरी महिमा महान । गंगाकी गरिमाके समान । देख करके सुभट मर्न । चकित होता ॥ १३ ॥ पौरुष तेरा ऐसा अद्भुत । सुनकरके ये हैं समस्त । जीवनसे हुये वे विरक्त । अपने ही ॥ १४ ॥ सिंह गर्जनासे जैसे । कांपते हैं हाथी वैसे । कौरव तेरे भयसे । होते त्रस्त ॥ १४ ॥ जैसे हैं पर्वत वज्रसे । अथवा सर्प गरुड़से । वैसे अर्जुन हैं तुझसे । सहमतें सब ॥ १६ ॥ जायेगी वह महानता । चिपकेगी अति दीनता । यदि तू यहांसे लौटता । युद्धके बिना ॥ १७ ॥ किंतु तुझे ये भागने नहीं देंगे । पकड़ अति अपमान करेंगे । अमर्याद कटु वचन कहेंगे । तेरे ही सम्मुख ॥ १८ ॥ तब होगा विदीर्ण हृदय । अब न लड़ना क्यों कौंतेय । राज्य करेगा पाकर जय । पृथ्वीतलका ॥ १९ ॥ हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥ अथवा यहीं रण भूमिमें । पावोगे मृत्यु भी लड़नेमें । अनायास ही स्वर्ग लोकमें । पहुंचेगा तू ॥ २२० ॥ इसी लिये तू यहां पर । छोड़कर सारे विचार । करमें ले कमान तीर । लडो शीघ्र ॥ २१ ॥ मरनेसे स्वर्ग भोग जीतनेसे धरातल । तथैव पार्थ तू उठ युद्धार्थ कर निश्चय ॥ ३७ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६
स्वधर्मका है आचरण । करता दोष निवारण । चित्तभ्रम किस कारण । जो है पाप ॥ २२ ॥ डूबेगा क्या कोई नांवसे । अड़े क्या कोई पथसे । सही न चलने आनेसे । होगा ये सब ॥ २३ ॥ अमृत-पान भी मारेगा । विष-सह यदि पीयेगा । स्वधर्म भी दोष लायेगा । सहेतुक जो ॥ २४ ॥ इसीलिये तुझको पार्थ । निरहेतुक हो सर्वथा । लडनेमें क्षात्र-धर्मार्थ । नहीं पाप ॥ २५ ॥ सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥ सम-बुद्धिसे लड — संतोष न मानना सुखमें । विषाद न मानना दुखमें । तथा लाभालाभ भी मनमें । नहीं धरना ॥ २६ ॥ यहां जो विषय भी होगा । या सर्वथा तन जायेगा । न सोचना आगे क्या होगा । पहलेसे ही ॥ २७ ॥ उचित जो अपना । स्वधर्म सो करना । प्राप्तव्यको भोगना । शांत भावसे ॥ २८ ॥ ऐसे होनेसे तू सम चित्त । होगा सहज ही पाप-मुक्त । इसलिये हो तू युद्ध रत । निश्चिंत भावसे ॥ २९ ॥ एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोंगे त्विमां शृणु । बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥ बुद्धियोगका वज्र कवच — सांख्य स्थिति यह संक्षिप्त । किया तुझको निरूपित । तभी होकरके निभ्रांत । लडना अब ॥ २३० ॥ हानि लाभ सुख दुःख सम हो हार जीतमें । फिर युद्धार्थ हो सिद्ध न होगा पाप लिप्त तू ॥ ३८ ॥ सांख्य बुद्धि यही जान सुन तू योग बुद्धि भी । तोडेगा उससे सारे जगमें कर्म बंधन ॥ ३९ ॥ (४) ५७ सांख्ययोग
जो है बुद्धि युक्त । सुनो वह पार्थ । कर्म-बंध मुक्त । रहता सदा ॥ ३१ ॥ वज्र कवच पहननेसे । शस्त्रोंकी वर्षांमें भी है जैसे । शरीर रहता है उससे । अचुंबित ॥ ३२ ॥ नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥ ईश्वरार्पित बुद्धिसे अनासक्त कर्म — मिटता नहीं जिससे लौकिक । सहज मिलता पारलौकिक । चल आया पूर्वानुक्रम देख । शुद्ध रूपसे ॥ ३३ ॥ कर्माधारसे बरतना । कर्म फलको न देखना । मंत्रज्ञको मुक्त रहना । भूत बाधासे ॥ ३४ ॥ उस पर जो सुबुद्धि । अपनेको निरवधि । मिलने पर उपाधि । नहीं लगती ॥ ३५ ॥ न जा वहां पुण्य-पाप । जो है अति सूक्ष्म निष्कंप । औ' गुणत्रयादिका लेप । चढता नहीं ॥ ३६ ॥ अर्जुन ऐसा यदि पुण्यवश । हुआ हृदयमें बुद्धि प्रकाश । होगा उससे ही अशेष नाश । संसारका भय ॥ ३७ ॥ व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥ जैसे छोटीसी दीप-ज्योति । तेजसे प्रकाशती अति । वैसे न मानता सुमति । अल्पसी कभी ॥ ३८ ॥ सुन तू पार्थ अनेक प्रकार । चाहते हैं बुद्धि विचार शूर । किंतु है दुर्लभ सचराचर । सद्वासना ॥ ३९ ॥ चूकता जो न आरंभ न बने विपरीत भी । अल्प भी यह धर्मांश तारता भयसे महा ॥ ४० ॥ बुद्धि एकाग्र होती है इसमें दृढ होकर । अनंत बहु शाखाकी बुद्धि निश्चय हीनकी ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८ (8)
जैसे वस्तु अनेक मिलते । वैसे पारस नहीं मिलते । अमृत-बिंदु हैं मिलते । दैव योगसे ॥ २४० ॥ वैसी दुर्लभ है सद्बुध्दि । जिसे परमात्म ही अवधि । जैसे भागीरथीको उदधि । निरंतर ॥ ४१ ॥ नहीं जिसे ईश्वरके बिन । कोई अन्य है अवलंबन । वही एक सद्बुध्दि है जान । इस जगतमें ॥ ४२ ॥ अन्य जो है सब दुर्मति । पाती है अनेक विकृति । वहां निरंतर सुमति । रमते हैं ॥ ४३ ॥ वेदवादविदोंके वाग्जालमें नहीं आओ— इसीलिये सुन उन्हे पार्थ । स्वर्ग संसार नर्ककी वार्ता । न कभी आत्म-सुख सर्वथा । मिलता देखने भी ॥ ४४ ॥ यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥ वेदके आधारसे हैं बोलते । केवल कर्म-प्रतिष्ठा करते । किंतु आसक्ति हैं नित धरते । कर्म फलोंमें ॥ ४५ ॥ संसारमें जनम लेकर । यज्ञ यागादि कर्मको कर । भोगो स्वर्ग सुख मनोहर । कहते ऐसे ॥ ४६ ॥ यहां बिन इसके नहीं । अन्य सुख सर्वथा कहीं । अजी ! ऐसे बोलते यही । दुर्बुद्ध लोग ॥ ४७ ॥ कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥ देखो कामनासे अभिभूत । होकरके कर्म-आचरित । केवल वे भोगमें दे चित्त । अपना सारा ॥ ४८ ॥ अनाडी व्यर्थकी बात कहते हैं फुलाकर । वेदके करते वाद कहते अन्य ना कछु ॥ ४२ ॥ जन्म लेके करो कर्म पावोगे भोग वैभव । लो कर्म फल स्वादिष्ट कहते स्वर्ग कामुक । ४३ ॥ ५९ सांख्ययोग
क्रिया विशेषको बहुव । नहीं लोपते विधिवत । निपुण हो धर्ममें रत । करते हैं नित्य ॥ ४९ ॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥ किंतु करते एक बुरी बात । स्वर्ग कामनामें हो लिप्त चित्त । भूलते हैं यज्ञ पुरुषको नित । भोक्ता है जो ॥ २५० ॥ बनाकर जैसे कर्पूरका ढेर । उसमें आग लगाकरके फिर । अथवा मिष्ठान्न भला पकाकर । मिला दिया विष ॥ ५१ ॥ पाकर अमृतकुंभ दैवसे । ठुकराते हैं उसको पैरसे । नासते हैं धर्म-कृत्यको वैसे । करके फलाकांक्षा ॥ ५२ ॥ पुण्य करते हैं सायास । धरके संसारकी आस । विवेक बिनु करें नास । करें क्या ॥ ५३ ॥ जैसे घरका सुग्रास भोजन । बेचते लेकरके कुछ धन । वैसे खाते हैं धर्म मति-हीन । भोगार्थि जो ॥ ५४ ॥ इसीलिये सुन तू पार्थ । दुर्बुद्धिमें होकर लिप्त । ये वेदवाद रत सतत । आचरते हैं ॥ ५५ ॥ त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥४५॥ तीन गुणोंसे है आवृत । जानो ये वेद निर्भ्रांत । उपनिषदादि समस्त । हैं सात्विक ॥ ५६ ॥ है यहां रज रज-तमात्मक । जहां है निरूपण कर्मादिक । जो हैं केवल ही स्वर्ग सूचक । धनुर्धर ॥ ५७ ॥ लुभायी जिससे बुद्धि भोग वैभवमें फंसी । न होती बुद्धि स्थायी समाधिमें कंभी स्थिर ॥ ४४ ॥ तीन गुण वदे वेद उनसे हो अलिप्त तू । तथा निश्चित निर्द्वन्द्व सत्वस्थ योग क्षेममें ॥ ४५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०
इसलिये तू जान अर्जुन । ये हैं सुख दुखके कारण । न जाने देना अंतःकरण । इसमें कभी ॥ ५८ ॥ गुणत्रयोंका कर अनादर । मैं मेरा ऐसा कभी न कर । केवल आत्म-सुखका अंतर । कर आश्रय ॥ ५९ ॥ यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥ तू निष्काम कर्म कर- वेद यदि अनेक बोलते । विविध भेदोंको है सुझाते । अपना हित आप देखते । उसमेंसे ही ॥ २६० ॥ जैसे सूर्यका उदय होते । सारे पथ दिखायी पड़ते । किंतु सभी पथ क्या चलते । कहो मुझे ॥ ६१ ॥ या जलमय सकल । हुआ सभी महीतल । लेते हम जो केवल । आवश्यक ॥ ६२ ॥ वैसे ही ज्ञानी जन । कर वेदार्थ चिंतन । शाश्वत जो तत्व-ज्ञान । स्वीकारते हैं ॥ ६३ ॥ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥ इसीलिये सुन तू अर्जुन । करके ऐसे अवलोकन । तुझे यह उचित है जान । जो स्वकर्म ॥ ६४ ॥ विचार किया हमने पूर्ण । यह हमारा निश्चय जान । अनुचित त्यजना अर्जुन । विहित कर्म ॥ ६५ ॥ सभी ओर भरा पानी कुएंमें क्या धरा रहा । ब्रह्मज्ञ-तत्वज्ञानीको वेदोंमें सार जो रहा ॥ ४६ ॥ कर्मका अधिकारी तू न कर फल-कामना । न कर्म-फलमें हेतु न हो राग अकर्ममें ॥ ४७ ॥ ६१ सांख्ययोग
किंतु कर्म फलकी आशा न करना । तथा कुकर्मका संग भी न धरना । सत्कर्मका आचरण सदा करना । बिन हेतुके ॥ ६६ ॥ योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय । सिद्धयसिद्धयोःसमो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥ ईश्वरार्पित कर्म सदैव पूर्ण ही- तू योगयुक्त होकर । फलाशाको छोड़कर । अर्जुन ! मन देकर । कर कर्म ॥ ६७ ॥ किंतु हुआ कर्म सफल । दैव था यदि अनुकूल । न होना संतुष्ट बहुत । मनमें भी ॥ ६८ ॥ या हुआ कोई कारण । कार्य रहा जो अपूर्ण । जिससे तू अंतःकरण । न कर क्षुब्ध ॥ ६९ ॥ काम हुआ हाथका पूर्ण । यदि रहा वह अपूर्ण । इससे विचार सगुण । ऐसे मानना ॥ २७० ॥ कर्मका जो है मूल कारण । उसको ही किया समर्पण । वहीं हुआ वह परिपूर्ण । सहज भावसे ॥ ७१ ॥ सफल असफलमें सतत । रहता है जिसका सम चित्त । योग स्थिति है वह प्रशंसित । ज्ञानियोंसे ॥ ७२ ॥ दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५०॥ फल लाभे न लाभे तू असंग सम-भावसे । योग-युक्त कर कर्म योग-सार समत्व है ॥ ४८ ॥ समत्व-बुद्धि है श्रेष्ठ उससे कर्म हीन है । बुद्धिका आसरा ले तू चाहते फल दीन हैं ॥४९॥ यहां समत्व बुद्धिसे टलता पाप पुण्य है । समत्व-युक्त हो सारा योग है कर्म-कौशल ॥ ५० ॥ ज्ञानेश्वरी ६२
ईश्वरार्पित साम्य-बुद्धि योगका सार है— अर्जुन ! समत्व जो चित्तका । सार जान वही तू योगका । जिससे मन तथा बुद्धिका । होता ऐक्य ॥ ७३ ॥ बुद्धियोगका विवेचन । करनेसे लगता हीन । कर्म मार्ग है जो अर्जुन । वह सकाम ॥ ७४ ॥ किंतु कर्म करना है सतत । उससे योग मिलता निश्चित । शेष कर्ममें जो सहज चित्त । योग स्थिति है ॥ ७५ ॥ बुद्धियोग है सधर । उसमें ही हो तू स्थिर । मनसे ही त्याग कर । फल हेतुका ॥ ७६ ॥ लेकर आसरा बुद्धियोगका । पार हो जाते हैं भव सागरका । तोड़कर बंधन उभयका । पाप-पुण्य ॥ ७७ ॥ कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥५१॥ वे यदि कर्म करते रहते । मनसे कर्म फल नहीं छूते । तभी जन्म-मृत्युसे मुक्त होते । सुनो पार्थ ॥ ७८ ॥ होते हैं जो योग च्युत । पद पाते हैं अच्युत । हैं जो आनंद भरित । धनुर्धर ॥ ७९ ॥ तू भी ऐसा ही होगा । यदि मोह छोड़ेगा । मनमें जो धरेगा । विराग को ॥ २८० ॥ यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥५२॥ तब निष्कलंक गगन । उदित होगा तत्वज्ञान । उससे निरीच्छ होगा मन । सहज रूपसे ॥ ८१ ॥ समत्व-बुद्धिसे ज्ञानी तजके कर्मके फल । छुडाके जन्मकी गांठ पाते हैं पद अच्युत ॥ ५१ ॥ बुद्धि जो तर जायेगी मोहका जब कीचड़ । हुवा होगा शब्द ज्ञान पचायेगा तभी सब ॥ ५२ ॥ ८२ सांख्ययोग
और है कुछ जानना। बीतेको अब स्मरना। ऐसा सब तू अर्जुन। भूलेगा तब ॥ ८२ ॥ श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥५३॥ बुद्धि जो इंद्रियोंके संगमें । फैलती है दशदिशाओंमें । होगी वही फिर आत्मरूपमें । स्थिर नित्य ॥ ८३ ॥ समाधि सुखमें केवल। बुद्धि होगी अति निश्चल । वहां पायेगा तू सकल । योगस्थिति ॥ ८४ ॥ अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥५४॥ स्थितप्रज्ञताकी जिज्ञासा— कहता है पार्थ हे कृष्ण। इसी बातको जानुं पूर्ण । कहो अब हो सकरुण । कृपानिधि ॥ ८५ ॥ कहा अच्युतने फिर । पूछ ले तू धनुर्धर । मनके कोई विचार । मुक्त भावसे ॥ ८६ ॥ बोला अर्जुन कृष्णसे । कहो बातें ये मुझसे । जानना उसको कैसे । स्थितप्रज्ञ है ॥ ८७ ॥ जो है स्थिरमति कहलाता । समाधि सुख नित भोगता । कैसा कहो वह जाना जाता । शार्ङ्गधर ॥ ८८ ॥ किस स्थितिमें वह रहता । कैसे वह बर्ताव करता । किस रूपमें वह रहता । लक्ष्मीपति ॥ ८९ ॥ सुनके उलझी बुद्धि तेरी पाकर निश्चय । समाधिमें स्थिर होगी पायेगा तब योग तू ॥ ५३ ॥ अर्जुनने कहा समाधिमें स्थिराथा जो रहता किस भांतिसे । बोले रहे फिरे कैसे स्थित-प्रज्ञ कहो मुझे ॥५४॥ ज्ञानेश्वरी ६४
तब परब्रह्मका अवतरण । है जो षड्गुणाधिकरण । सुन इसे वहां नारायण । बोले ऐसा ॥ २९० ॥ भगवान उवाच प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५५॥ स्थितप्रज्ञके लक्षण— सुन तू अब अर्जुन । मनकी प्रौढ़ कामना । होती अति उलझन । आत्म सुखमें ॥ ९१ ॥ सदैव जो हैं नित्य तृप्त । अन्तःकरणमें भरित । किंतु विषयमें पतित । जिसके संगसे ॥ ९२ ॥ काम वह जब मूलतः मिटता । मन उसका आत्मतोषी हो जाता । तभी वह स्थितप्रज्ञ कहलाता । धनंजय ॥ ९३ ॥ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥ होते हैं जब दुख प्राप्त । तब न होता उद्विग्नचित्त । सुखमें भी वह हर्षित । होता नहीं ॥ ९४ ॥ होता अर्जुन उसका चित्त । सदा काम क्रोधसे रहित । तथा होता है भयसे मुक्त । परिपूर्ण वह ॥ ९५ ॥ ऐसा वह निरवधि । उसे जान स्थिर बुद्धि । सब त्यागके उपाधि । द्वंद्वातीत ॥ ९६ ॥ श्री भगवानने कहा मनकी कामना सारी छोडके अपनी वह । आत्मामें रहता तुष्ट कहाता स्थित-प्रज्ञ सो ॥ ५५ ॥ उद्विग्न दुःखमें ना हो सुखकी लालसा नहीं । गया राग भय क्रोध है स्थित-प्रज्ञ संयमी ॥ ५६ ॥ ६५ सांख्ययोग
यः सर्वत्रानभिस्नेह स्तत्त त्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५७॥ सर्वत्र सदैव एकसा । संपूर्ण चंद्र देता जैसा । सबको समान प्रकाश । न देख अधमोत्तम ॥ ९७ ॥ ऐसी अनवच्छिन्न समता । भूतमात्रमें हो सदयता । तथा अपरिवर्तित चित्त । सदा सर्वत्र ॥ ९८ ॥ भला पाकर नहीं रीझता । वैसे बुराईमें न खीजता । दोनोंमें एक-सा है रहता । अप्रभावित ॥ ९९ ॥ ऐसा जो हर्ष शोक रहित । सदा आत्म-बोधसे भरित । जान तू है वह प्रज्ञा युक्त । धनुर्धर ॥ ३०० ॥ यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८॥ अथवा कूर्मके समान । मोदमें फैलाता है तन । या इच्छावश आकुंचन । करता है जो ॥ १ ॥ इंद्रिया जिसके आधीन । उनका करती कथन । वही है स्थितप्रज्ञ जान । तू धनंजय ॥ २ ॥ विषया विनिवर्तते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परंदृष्ट्वा निवर्तते ॥५९॥
सर्वत्र जो अनासक्त पाता जब भला बुरा । न करे हर्ष या द्वेष है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥ ५७ ॥ लेता समेट संपूर्ण इंद्रियोंको विषयसे । जैसे कूर्म सभी अंग तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ५८ ॥ निराहार बलसे जो तजे विषय देहके । रस न छोड़ता चित्त जल्ता आत्म ज्ञानसे ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६