भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इसे युद्ध कहे कैसा। यह है स्वर्गरूप सा । या तब प्रताप ऐसा । उत्तर आया ॥ ९२ ॥ या तेरे गुणों पर हो लुब्ध । उत्कट भावसे करबद्ध । स्वयंवरार्थ होकर सिद्ध । आयी है कीर्ति ॥ ९३ ॥ क्षत्रियों को अतीव पुण्यसे । लडने मिलते युद्ध ऐसे । मिलती है चिंतामणि जैसे । राह चलतेको ॥ ९४ ॥ अथवा देते हुये जंभायी । अमृतबूंद टपक आयी । ऐसी है यह लडाई आयी । स्वाभाविक हो ॥ ९५ ॥ अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥ करके इसकी अवहेलना । व्यर्थका शोक करते बैठना । अपना घात आपही करना । यह है ऐसा ॥ ९६ ॥ पूर्वजोंका जो यश संचित । अपनेसे खोना है निश्चित । शस्त्र त्यजना हो शोकग्रस्त । रणमें यहां ॥ ९७ ॥ इससे नष्ट होगी तब कीर्तिं । विश्व गायेगा तेरी अपकीर्तिं । मिलेगी महापापकी थाथी । निश्चित तुझे ॥ ९८ ॥ वनिता जो भर्तार रहित । होती सर्वत्र अनादरित । वैसे है जीवनका सतत । बिन स्वधर्मके ॥ ९९ ॥ अथवा रण-भूमिका प्रेत । होता गिद्धसे क्षत विक्षत । नर वैसा स्वधर्म रहित । होता महादोषसे ॥ १०० ॥ अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥ ऐसा जो धर्म संग्राम टालेगा यदि तू यहां । पायेगा पाप दुष्कीर्ति तजके धर्म युद्ध को ॥ ३३ ॥ सदैव लोग गायेंगे तेरी दुष्कीर्ति विश्वमें । अकीर्ति मृत्युसे हीन मानी पुरुषके लिये ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४