भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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कौरवोंका हुआ अनुचित । अथवा तेरा ही हुआ घात । या मानो हो गया है युगांत । तो भी यहां ॥ ८१ ॥ स्वधर्मे यह रहता एक । सदा जो आचरणीय नेक । तुझे वह है कृपा पूर्वक । तारेगा ही ॥ ८२ ॥ अर्जुन तेरा जो चित्त । हुआ यदि द्रवीभूत । किंतु यह अनुचित । संग्राममें ॥ ८३ ॥ हुवा यदि गायका दूध । पथ्यमें हुआ इससे बाध । करेगा विषसा प्रमाद । नव ज्वरमें ॥ ८४ ॥ वैसे असमयमें अनुचित । इससे होगा हितका घात । इसलिये हो सावध चित । कार्यकर ऊठ ॥ ८५ ॥ व्याकुल है तू अकारण । कर स्वधर्मका आचरण । उससे होगा सब रक्षण । तीनों कालमें ॥ ८६ ॥ जैसे सरल पथपे चलना । उपाय है अपायसे बचना । या है दीप प्रकाशमें चलना । न लगे ठोकर ॥ ८७ ॥ वैसे सुन तू अर्जुन । करस्वधर्माचरण । सकल कामना पूर्ण । होती हैं ॥ ८८ ॥ देखो इससे अन्य नहीं । क्षत्रियकेलिये जो सही । रणके बिन कछु कहीं । उचित धर्म ॥ ८९ ॥ हो करके निष्कपट । लडना अति विकट । देखना क्या रही बाट । प्रत्यक्षमें यहां ॥ १९० ॥ यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥ स्वधर्माचरणकी अपूर्व स्वर्णसंधि— यह है युद्ध आजका । फल है तेरे दैवका । धरोहर है धर्मका । हुआ प्रकट ॥ ९१ ॥ हुवा प्राप्त अनायास स्वर्गका द्वार है खुला । भाग्य शाली क्षत्रियोंको मिलता धर्म-युद्ध है ॥ ३२ ॥ ५३ सांख्ययोग