भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यः सर्वत्रानभिस्नेह स्तत्त त्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५७॥ सर्वत्र सदैव एकसा । संपूर्ण चंद्र देता जैसा । सबको समान प्रकाश । न देख अधमोत्तम ॥ ९७ ॥ ऐसी अनवच्छिन्न समता । भूतमात्रमें हो सदयता । तथा अपरिवर्तित चित्त । सदा सर्वत्र ॥ ९८ ॥ भला पाकर नहीं रीझता । वैसे बुराईमें न खीजता । दोनोंमें एक-सा है रहता । अप्रभावित ॥ ९९ ॥ ऐसा जो हर्ष शोक रहित । सदा आत्म-बोधसे भरित । जान तू है वह प्रज्ञा युक्त । धनुर्धर ॥ ३०० ॥ यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८॥ अथवा कूर्मके समान । मोदमें फैलाता है तन । या इच्छावश आकुंचन । करता है जो ॥ १ ॥ इंद्रिया जिसके आधीन । उनका करती कथन । वही है स्थितप्रज्ञ जान । तू धनंजय ॥ २ ॥ विषया विनिवर्तते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परंदृष्ट्वा निवर्तते ॥५९॥

सर्वत्र जो अनासक्त पाता जब भला बुरा । न करे हर्ष या द्वेष है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥ ५७ ॥ लेता समेट संपूर्ण इंद्रियोंको विषयसे । जैसे कूर्म सभी अंग तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ५८ ॥ निराहार बलसे जो तजे विषय देहके । रस न छोड़ता चित्त जल्ता आत्म ज्ञानसे ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६