भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तब परब्रह्मका अवतरण । है जो षड्गुणाधिकरण । सुन इसे वहां नारायण । बोले ऐसा ॥ २९० ॥ भगवान उवाच प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५५॥ स्थितप्रज्ञके लक्षण— सुन तू अब अर्जुन । मनकी प्रौढ़ कामना । होती अति उलझन । आत्म सुखमें ॥ ९१ ॥ सदैव जो हैं नित्य तृप्त । अन्तःकरणमें भरित । किंतु विषयमें पतित । जिसके संगसे ॥ ९२ ॥ काम वह जब मूलतः मिटता । मन उसका आत्मतोषी हो जाता । तभी वह स्थितप्रज्ञ कहलाता । धनंजय ॥ ९३ ॥ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥ होते हैं जब दुख प्राप्त । तब न होता उद्विग्नचित्त । सुखमें भी वह हर्षित । होता नहीं ॥ ९४ ॥ होता अर्जुन उसका चित्त । सदा काम क्रोधसे रहित । तथा होता है भयसे मुक्त । परिपूर्ण वह ॥ ९५ ॥ ऐसा वह निरवधि । उसे जान स्थिर बुद्धि । सब त्यागके उपाधि । द्वंद्वातीत ॥ ९६ ॥ श्री भगवानने कहा मनकी कामना सारी छोडके अपनी वह । आत्मामें रहता तुष्ट कहाता स्थित-प्रज्ञ सो ॥ ५५ ॥ उद्विग्न दुःखमें ना हो सुखकी लालसा नहीं । गया राग भय क्रोध है स्थित-प्रज्ञ संयमी ॥ ५६ ॥ ६५ सांख्ययोग