भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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और है कुछ जानना। बीतेको अब स्मरना। ऐसा सब तू अर्जुन। भूलेगा तब ॥ ८२ ॥ श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥५३॥ बुद्धि जो इंद्रियोंके संगमें । फैलती है दशदिशाओंमें । होगी वही फिर आत्मरूपमें । स्थिर नित्य ॥ ८३ ॥ समाधि सुखमें केवल। बुद्धि होगी अति निश्चल । वहां पायेगा तू सकल । योगस्थिति ॥ ८४ ॥ अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥५४॥ स्थितप्रज्ञताकी जिज्ञासा— कहता है पार्थ हे कृष्ण। इसी बातको जानुं पूर्ण । कहो अब हो सकरुण । कृपानिधि ॥ ८५ ॥ कहा अच्युतने फिर । पूछ ले तू धनुर्धर । मनके कोई विचार । मुक्त भावसे ॥ ८६ ॥ बोला अर्जुन कृष्णसे । कहो बातें ये मुझसे । जानना उसको कैसे । स्थितप्रज्ञ है ॥ ८७ ॥ जो है स्थिरमति कहलाता । समाधि सुख नित भोगता । कैसा कहो वह जाना जाता । शार्ङ्गधर ॥ ८८ ॥ किस स्थितिमें वह रहता । कैसे वह बर्ताव करता । किस रूपमें वह रहता । लक्ष्मीपति ॥ ८९ ॥ सुनके उलझी बुद्धि तेरी पाकर निश्चय । समाधिमें स्थिर होगी पायेगा तब योग तू ॥ ५३ ॥ अर्जुनने कहा समाधिमें स्थिराथा जो रहता किस भांतिसे । बोले रहे फिरे कैसे स्थित-प्रज्ञ कहो मुझे ॥५४॥ ज्ञानेश्वरी ६४