ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरंदृष्ट्वा निवर्तते— अर्जुन ! तुझसे एक । कहूंगा ऐसा कौतुक । विषयोंके हैं साधक । करते नियम ॥ ३ ॥ संयम करते श्रोत्रादिक । किंतु छोड़ते रसना एक । घेरते धर रूप अनेक । तब विषय ॥ ४ ॥ ऊपर तोड़कर अंकुर । जड़में सदा जल देकर । फैलेगा वृक्ष जैसा अपार । नाश ऐसा ॥ ५ ॥ पीकर जल वह अधिक । फैलाता जैसा अंग अनेक । रसनासे विषय अनेक । फलते मनमें ॥ ६ ॥ टूटते अन्य इंद्रियोंके । विषय नहीं रसनाके । हैं जो आधार जीवनके । इसीलिये ॥ ७ ॥ अर्जुन इसका नियमन । होता है तब सहज जान । परब्रह्मानुभव महान् । होता जब ॥ ८ ॥ शरीरभाव भी मिटता । करण विषय भूलता । ब्रह्मभाव प्रतीत होता । अपनेमें ही ॥ ९ ॥ यततो ह्यपि कौंतेय पुरुषस्य विपश्चितः । इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरंति प्रसभं मनः ॥६०॥ इंद्रियोंकी प्रबंलता— वैसे तो सुन तू अर्जुन । न होती इंद्रियां स्वाधीन । साधक करते जतन । निरंतर ॥ ३१० ॥ अभ्यासका कर घर । यम नियमका द्वार । मनको पकड कर । रखते मुट्ठिमें ॥ ११ ॥ करते हैं इंद्रियां व्याकुल । साधकोंको भी जो हैं कुशल । मांत्रिकको जैसे है चुडैल । भृष्ट करती ॥ १२ ॥ ज्ञानियोंके मनको भी यत्नमें रहते हुये । हटाती वेगसे मत्त इंद्रियां बलवान जो ॥ ६० ॥ ६७ सांख्ययोग