ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषय भी होते हैं ऐसे । जो ऋद्धि-सिद्धिके रूपसे । जकडते हैं आ स्पर्शसे । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥ उनके संगमें जाता है मन । अभ्यासमें होकर बल हीन । बल है ऐसा इंद्रियोंका जान । तू धनंजय ॥ १४ ॥ तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीतमत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६१॥ रहो हृदयमें सदा अनुरक्त मेरा— इसीलिये तू सुन पार्थ । छोडके विषयोंमें आस्था । इनका दमन सर्वथा । । कर निरंतर ॥ १५॥ इसीको तू जान अर्जुन । योग निष्ठाका है कारण । विषयोंसे अंतःकरण । न होता लिप्त ॥ १६ ॥ अजी ! जो आत्म बोध युक्त । होकर रहता सतत । हृदयमें हो अनुरक्त । रहता मेरा ॥ १७॥ विषयीको आत्मसुख नहीं— किया बाह्य विषयोंका त्याग । अंदरसे रहा अनुराग । तब साद्यंत संसार भोग । करता वह ॥ १८ ॥ जैसा विषका लेश । लेनेसे होता विशेष । करता वह विनाश । जीवनका ॥ १९॥ वैसे विषयोंका अंश । मनमें रहके नाश । करता जान अशेष । विवेकको ॥ ३२० ॥ ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते । संगात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥६२॥ उनको युक्तिसे रोक रहना मत्परायण । जिसने इंद्रियां जीती है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥६१ ॥ करे जो विषय ध्यान उनकी लगती लत । लतसे फूटता काम कामसे क्रोध उद्भव ॥ ६२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८