ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात् स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ॥ ६३॥ करता यदि मन विषय मनन । नि संगका भी होता उससे रंजन । रंजनसे प्रकट होती मूर्तिमान । अभिलाषा तब ॥ २१ ॥ होता है जहां काम उत्पन्न । क्रोधका वहां जमा आसन । क्रोध संगमें मोहको मान । अपने आप ॥ २२ ॥ मोहसे घिरते ही व्यक्ति । नाश होती उसकी स्मृति । जैसे बवंडरमें ज्योति । बुझ जाती है ॥ २३ ॥ अथवा सायंकालमें निशा । ग्रसती जैसा सूर्य प्रकाश । वैसी ही स्मृति भ्रंशमें दशा । होती मनुष्यकी ॥ २४ ॥ अज्ञानांध तब केवल । उससे घिरे हैं सकल । होती वहां बुद्धि व्याकुल । हृदयमें पार्थ ॥ २५ ॥ जन्मांध जैसे घबड़ाहटमें । अकुलाता है भाग दौड़में । होता वैसा बुद्धिका संसारमें । धनुर्धर ॥ २६ ॥ जब ऐसा बुद्धि-भ्रंश होता । सर्वत्र उसका कुंठा होता । ज्ञानका वहां नाश होता । मूल रूपसे ॥ २७ ॥ चैतन्यके नाशसे जैसे । होती देहकी दशा वैसे । पुरुषकी बुद्धि-नाशसे । होती है जान ॥ २८ ॥ इसीलिये सुन अर्जुन । जैसे चिनगारी ईंधन । पड़ बढ़ती त्रिभुवन । जलाती जाती ॥ २९ ॥ वैसे विषयोंका ध्यान । जब करता है मन । उससे होता पतन । जान निश्चय ॥ ३३० ॥ फूटता क्रोधसे मोह मोहसे स्मृति लोप है । स्मृति लोप बुद्धि-नाश उसीमें आत्म-नाश है ॥ ६३ ॥ ६९ सांख्ययोग