भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥६४॥ आत्मत्व प्राप्त पुरुष भी इंद्रियोंके लाड करके क्लेश ही पायेगा-- तभी विषयोंको मनसे । त्यागना है जड़ मूलसे । रागद्वेष सहजतासे । नष्ट होंगे सब ॥ ३१ ॥ सुन अर्जुन बात और एक । होकर नष्ट रागद्वेषादिक । इंद्रियोंका रमना है बाधक । न होता विषयोंमें ॥ ३२ ॥ सूर्य जैसा आकाशगत । छूता किरणोंसे जगत । किंतु संग-दोषसे लिप्त । होता नहीं ॥ ३३ ॥ इंद्रियोंमें वैसे उदासीन । आत्मरसमें होके तल्लीन । औ' कामक्रोधादिसे विहीन । होकर रहता ॥ ३४ ॥ विषयोंमें भी है जो सतत । आत्म तत्वमें रहता रत । उसको होंगे विषय पार्थ । बाधक कैसे ॥ ३५ ॥ पानीमें यदि पानी डूबता । तथा आगसे अग्नि जलता । तभी विषयोंमें है डूबता । जो है पूर्ण ॥ ३६ ॥ अपनेमें आप केवल । होकर रहा जो निर्मल । उसकी प्रज्ञा है निश्चल । तथा निर्भ्रान्त ॥ ३७ ॥ प्रसादे सर्व दुःखानाम् हानिरस्योपजायते । प्रसन्न चेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥६५॥ पाता प्रसन्नता अखंडित । जिसका चित्त है सदोदित । वहां प्रवेश नहीं समस्त । भवदुःखोंका ॥ ३८ ॥ मिटा तो राग औ' द्वेष होती हैं इंद्रियां वश । प्रभुत्वसे इंद्रियोंके प्रसाद मिलता फिर ॥ ६४ ॥ प्रसादसे सभी दुःख होते हैं नाश सत्वर । प्रसादसे बुद्धिकी तो स्थिरता शीघ्र निश्चित ॥ ६५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७०