भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जैसे अमृतका निर्झर । बहाता जिसका उदर । भूख प्यासका क्या असर । उसपे होगा ॥ ३९ ॥ हृदय जब प्रसन्न होता है । तब दुःख वहां कैसे रहता है । सहज रूपसे मति रहती है । परमात्मामें ॥ ३४० ॥ जैसे निर्वातका दीप । न जाने सर्वथा कंप । स्थिर बुध्दिका स्वरूप । योगयुक्त वैसे ॥ ४१ ॥ नास्ति बुध्दिरयुक्तस्य न चा युक्तस्य भावना । न चाभावयतः शांतिरशांतस्य कुतः सुखम् ॥६६॥ मुक्तताका यह् मंथन । न करता जिसका मन । जकडा जाता वह् जान । विषयादिकोंमें ॥ ४२ ॥ उसमें स्थिर बुध्दि पार्थ । कुछ भी नहीं है सर्वथा । तथा स्थिरताकी जो आस्था । नहीं होगी ॥ ४३ ॥ निश्चलताकी भावना । चित्तमें न होती उत्पन्न । शांति होगी कैसी अर्जुन । उसको कभी ॥ ४४ ॥ नहीं जहां शांतिकी लगन । वहां न होता सुखका स्थान । पापियोंका जो ऐसा जीवन । वहां न देखता मोक्ष ॥ ४५ ॥ बीजको आगमें भूनकर । बोनेसे नहीं आता अंकुर । वैसा सुख नहीं पाता नर । है जो अशांत ॥ ४६ ॥ तभी अयुक्तपन मनका । वही सर्वस्व है दुःखका । कारण उसका इंद्रियोंका । भला दमन ॥ ४७ ॥ इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥६७॥ अयुक्तको नहीं बुध्दि उससे भावना नहीं । न भाव-हीनको शांति नहीं सुख अशांतको ॥ ६६ ॥ इंद्रियां दौड़ती स्वैर पीछे ही चलता मन । मानो प्रज्ञा बंधी नौका नदीमें वायुसे चली ॥ ६७ ॥ ७१ सांख्ययोग