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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

जैसे अमृतका निर्झर । बहाता जिसका उदर । भूख प्यासका क्या असर । उसपे होगा ॥ ३९ ॥ हृदय जब प्रसन्न होता है । तब दुःख वहां कैसे रहता है । सहज रूपसे मति रहती है । परमात्मामें ॥ ३४० ॥ जैसे निर्वातका दीप । न जाने सर्वथा कंप । स्थिर बुध्दिका स्वरूप । योगयुक्त वैसे ॥ ४१ ॥ नास्ति बुध्दिरयुक्तस्य न चा युक्तस्य भावना । न चाभावयतः शांतिरशांतस्य कुतः सुखम् ॥६६॥ मुक्तताका यह् मंथन । न करता जिसका मन । जकडा जाता वह् जान । विषयादिकोंमें ॥ ४२ ॥ उसमें स्थिर बुध्दि पार्थ । कुछ भी नहीं है सर्वथा । तथा स्थिरताकी जो आस्था । नहीं होगी ॥ ४३ ॥ निश्चलताकी भावना । चित्तमें न होती उत्पन्न । शांति होगी कैसी अर्जुन । उसको कभी ॥ ४४ ॥ नहीं जहां शांतिकी लगन । वहां न होता सुखका स्थान । पापियोंका जो ऐसा जीवन । वहां न देखता मोक्ष ॥ ४५ ॥ बीजको आगमें भूनकर । बोनेसे नहीं आता अंकुर । वैसा सुख नहीं पाता नर । है जो अशांत ॥ ४६ ॥ तभी अयुक्तपन मनका । वही सर्वस्व है दुःखका । कारण उसका इंद्रियोंका । भला दमन ॥ ४७ ॥ इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥६७॥ अयुक्तको नहीं बुध्दि उससे भावना नहीं । न भाव-हीनको शांति नहीं सुख अशांतको ॥ ६६ ॥ इंद्रियां दौड़ती स्वैर पीछे ही चलता मन । मानो प्रज्ञा बंधी नौका नदीमें वायुसे चली ॥ ६७ ॥ ७१ सांख्ययोग

जो जो इंद्रिय है करते । वही जो पुरुष करते । वे तरके भी न तरते । विषय सिंधु ॥ ४८ ॥ जैसे नांब लगी जो तीर । वही आंधीमें फंसकर । आती जैसी बीच भंवर । अपने आप ॥ ४९ ॥ वैसे आत्मत्व प्राप्त पुरुषके । दुलार करनेसे इंद्रियोंके । पायेगा वह क्लेश संसारके । अपने आप ॥ ३५० ॥ तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६८॥ इसलिये स्थितप्रज्ञ दक्ष रहता है— अपने आप यदि अर्जुन । किया है इंद्रियोंको आधीन । पाना कछु रहा नहीं जान । इससे अधिक ॥ ५१ ॥ कछुआ जैसे अपने फैलाता । अवयव जब वह चाहता । नहीं तो इच्छासे सिकोड़ लेता । अपनेमें आप ॥ ५२ ॥ इंद्रियां जिसकी अपनी होतीं । वह कहें जैसी हू बरततीं । जानो वह हुवा है रिथर मति । धनुर्धर तू ॥ ५३ ॥ अब और एक गहन । कहूंगा सुनो पहचान । जिसने पाया है अर्जुन । पूर्णत्वको ॥ ५४ ॥ यानिशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥६९॥ होते हैं जहां सब निद्रित । होता है वह वहां जाग्रत । जहां होते हैं सब जाग्रत । वह सोता है ॥ ५५ ॥ जिसने इंद्रियां सारीं सर्वथा है समेटलीं । स-निग्रह विषयोंसे तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ६८ ॥ रात जो सब भूतोंकी संयमी जागता वहां । जहां जगे सभी भूत मुनिकी रात है वह ॥ ६९॥ ज्ञानेश्वरी ७२

अध्याय ३: कर्मयोग

होता है वही निरुपाधि । उसे जान तू स्थिर-बुद्धि । वही होता है निरवधि । मुणीश्वर ॥ ५६ ॥ आपूर्यमाणं अचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशंति यद्वत् । तद्वत् कामा यं प्रविशंति सर्वे स शांतिमाप्नोति न कामकामी ॥७०॥ सभी सुख-समुद्र उसमें लीन-- अर्जुन और एक प्रकार । उसको जाननेका विचार । शांत रहता जैसा सागर । अखंडित ॥ ५७ ॥ सरिता ओघ यदि समस्त । करते हैं जल समर्पित । तो भी रहता जैसे सीमित । अपनी सीमामें ॥ ५८ ॥ अथवा ग्रीष्मकालमें सरिता । सुखालेती है प्रवाह सर्वथा । किंतु उसमें न्यून नहीं आता । समुद्र वैसाही ॥ ५९ ॥ वैसे ही पानेसे ऋध्दि सिद्धि । नहीं क्षोभती उसकी बुद्धि । न मिलनेसे उसकी बुध्दि । न होती उदास ॥ ३६० ॥ अथवा सूरजके समीप । प्रकाश लगाते क्या दीप । होता क्या, न लगानेसे दीप । अंधार वहां ॥ ६१ ॥ ऋध्दि सिद्धिका उसपर । न होता कुछ भी असर । हियमें होती निरंतर । शांति उसके ॥ ६२ ॥ मानता जो अपना वैभव महान । उसके सम्मुख तुच्छ इंद्र भुवन । वह करें क्या पर्ण-कुटिमें रंजन । भिल्लोंकी ॥ ६३ ॥ न भंग पाता भर भी सदैव समुद्र है नीर सभी पचाता । वैसे पचाते सब काम भोग वे शांति पाते नहीं भोग-लुब्ध ॥७०॥ ७३ सांख्ययोग (10)

अमृतको जो फीका मानता। वह क्या कांजी पीता बैठता। वैसा ही स्वानुभावी त्यागता। ऋध्दि सिध्दि ॥ ६४ ॥ पार्थ है यह नवल देख । तुच्छ है जहां स्वर्गका सुख । वहां ऋध्दि सिध्दिको क्या साख। रहती है ॥ ६५ ॥ विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारःस शान्तिमधिगच्छति ॥७१॥ ममता और अहंता त्यागमें शांति— ऐसा आत्म बोधमें तुष्ट । परमानंदमें है पुष्ट । वही है स्थित-प्रज्ञ श्रेष्ठ । जान तू ॥ ६६ ॥ अहंकारको जो मिटाकर । सब कामनाको त्याग कर । विचरता विश्वमें बनकर । विश्वमें ही ॥ ६७ ॥ एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति. स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥ यही ब्राह्मी स्थिति— है यह ब्राह्मी स्थिति निःसीम । अनुभवनेसे जो निष्काम । अनायास पाये पर-ब्रह्म । धनंजय ॥ ६८ ॥ चिद्रूपमें जब मिलता । देह-अंतकी व्याकुलता । नहीं वह अनुभवता । चितमें अपने ॥ ६९ ॥ वही है यह स्थिति । स्वमुखसे श्रीपति । कहते पार्थके प्रति । बोले संजय ॥ ३७० ॥ तजके कामना सारी फिर होकर निःस्पृह । अहंता ममता छूटी हुवा जो शांति रूप ही ॥ ७१ ॥ अर्जुन स्थिति है ब्राह्मी पाके न टलती वह । टिकती अंतमें भी जो ब्रह्म निर्वाण दायिनी ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४

सुनकर यह कृष्ण वचन । अर्जुन कहता मन ही मन । इस विचारसे है सिद्ध जान । अपना कार्य ॥ ७१ ॥ तीसरे अध्यायकी भूमिका— कर्म- मार्ग इससे संपूर्ण । होता सहज निराकरण । तब रहा युद्धका कारण । कहां औ' कैसे ॥ ७२ ॥ इस विचारसे अर्जुन । होकर संतुष्ट महान । पूछेगा भला-सा प्रश्न । संदेहसे ॥ ७३ ॥ वह प्रसंग अति सुंदर । सकल धर्मका है आगर । या विवेकामृतका सागर । सीमातीत ॥ ७४ ॥ है जो स्वयं सर्वज्ञ नाथ । कहेगा अब श्रीअनंत । वही है ज्ञानदेव बात । निवृत्तिदास ॥ ७५ ॥ गीता श्लोक ७२ ज्ञानेश्वरी ओवी ३७५. ॐ (10*)

३ कर्मयोग अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मताबुद्धिर्जनार्दन । तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ तो र्म करने क्यों कहता है ?— सुनो तब बोला अर्जुन । देव तूने कहा वचन । किया है उसका मनन । कमलापति ॥ १ ॥ वहां कर्म तथा कर्ता । देखनेसे नहीं रहता । ऐसा मत तेरा अनंत । यदि निश्चित है ॥ २ ॥ मुझे तब कैसा श्रीधर । कहता है तू युद्ध कर । यहां कर्ममें महा घोर । ढकलता कैसे ॥ ३ ॥ अजी तू ही कर्म अशेष । निषेध करता निःशेष । किंतु मुझसे यह हिंसक । कराता कैसे ॥ ४ ॥ सोचो यह हृषीकेश । मानता तू कर्म-लेश । हमसे तू ऐसी हिंसा । कराता है ॥ ५ ॥ अर्जुनने कहा कर्मसे बुद्धिको श्रेष्ठ मानता तू जनार्दन । तब क्यों कर्ममें घोर डालता मुझ केशव ॥ १ ॥

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥ सरल शब्दोंमें उपदेश दो— तू ही जब देव ! ऐसा कहता । अज्ञानी मैं कह क्या करता । मिट ही गयी अब मनो-वार्ता । विवेककी ॥ ६ ॥ ऐसा यदि तेरा उपदेश । रहा क्या दूसरा स्मृति-भ्रंश । हुआ अब संपूर्ण विनाश । आत्मबोधका ॥ ७ ॥ वैद्य पहल पथ्य कहता । फिरसे चुपके विष देता । फिर क्या है रोगीका बनता । कहो मुझे ॥ ८ ॥ भटकना जैसे अंधेको । मद्य पिलाना मर्कटको । वैसा उपदेश हमको । देता सुन्दर ॥ ९ ॥ पहले ही मैं हूं अजान । फिर मोहग्रस्त महान । विवेक मैंने यह मान । तुझसे पूछा ॥ १० ॥ देव ! है तेरी निराली बात । उपदेशसे चित्त भ्रमित । ऐसे करना है क्या उचित । अपनोंसे ॥ ११ ॥ हम हैं तन-मन जीवसे । करें अनुकरण सदासे । तथा तेरा करना जो ऐसे । मिटा सर्वस ॥ १२ ॥ ऐसा यदि तेरा उमदेश । उसमें कैसी हितकी आस । औ' मिटे ज्ञानार्जनकी आस । कहता अर्जुन ॥ १३ ॥ गई कुछ जाननेकी बात । मन भी हुआ अव्यस्थित । पहले था जो स्थिर चित्त । मेरा देव ॥ १४ ॥ वैसे है श्रीकृष्ण तेरा । चरित्र अंति गहरा । तू देखता चित्त मेरा । इस बहाने ॥ १५ ॥ अथवा तू हमें फंसाता । या गूढ तत्व है कहता । वह समझमें न आता । सोचनेसे ॥ १६ ॥ मिश्र-वचनसे बुद्धि करता मोह-युक्त तू। जिससे श्रेय पाऊं मैं कह तू एक निश्चित ॥ २ ॥ ७७ कर्मयोग

श्रीकृष्ण बात मेरी सुनना । गूढार्थ मुझसे न बोलना । सरल विवेक जो कहना । देश-भाषामें ॥ १७ ॥ मेरी मति है जड़ अत्यंत । तो भी समझं ऐसी ही बात । हरि तुझे बोलना सतत । निश्चयात्मक ॥ १८ ॥ रोगको है यदि जीतना । उस पर औषध देना । किंतु वह सुस्वादु होना । अति मधुर ॥ १९ ॥ देव तेरे जैसे सद्गुरु । इच्छाकी तृप्ति क्यों न करूं । यहां संकोच किसका धरूं । तू ही माय मेरी ॥ २० ॥ अजी ! कामधेनु दुहनेमें । आयी अपने ही सदनमें । तब भी कामना करनेमें । कृपणता क्यों ? ॥ २१ ॥ चिंतामणि करमें आया । वांछित जो मन भाया । भोगनेमें संकोच किया । ऐसा क्यों ॥ २२ ॥ अमृत-सागरके पास । आके न मिटाता है प्यास । आना तब उसके पास । व्यर्थ ही है ॥ २४ ॥ जन्मोंकी उपासनासे । श्रीहरि दैव योगसे । तू हुआ है अपनेसे । आधीन आज ॥ २५ ॥ तभी न मांगें क्यों सर्वस । सुकाल है यह परेश । आयी जन्मांतरकी आस । पूर्ण होनेको ॥ २६ ॥ सकल जीवन सफल । मिला पुण्य यशका फल । सिद्ध मनोरथ सकल । हुए मेरे ॥ २७ ॥ सकल मंगल धाम । अजी देवदेवोत्तम । हुआ आज पूर्ण काम । तू स्वाधीन है ॥ २८ ॥ माताके पास बालक जैसे । लगता है स्तनमें स्वेच्छासे । न देखे काल अकाल वैसे । भक्त वत्सल ॥ २९ ॥ वैसे देव तुझसे । पूछते हैं स्वेच्छासे । न जाने समय ऐसे । कृपानिधि ॥ ३० ॥ देव ! सर्वत्र जो हित । आचरणमें उचित । कह एक जो निश्चित । कहता पार्थ ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८

भगवान उवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥ अधिकार भेदसे उपदेश भिन्नता— इस बातसे अच्युत । कहता है हो विस्मित । अर्जुनका है ध्वनित । अभिप्रायसे ॥ ३२ ॥ अजी ! बुद्धि-योगकी बात । कहनेमें ही सांख्यमत । प्रकट किया स्वभावतः । अल्पमें ही ॥ ३३ ॥ उद्देश्य न वह जान कर । क्षुभित हुआ तेरा अंतर । कहूंगा मैं दोनों सत्वर । योग मार्ग ॥ ३४ ॥ सरल शब्दोंमें उपदेश दो— सुन तू वीर श्रेष्ठ । जनमें दोनों निष्ठा । मुझसे ही प्रकट । अनादि सिद्ध ॥ ३५ ॥ एक ज्ञान-योग कहलाता । अनुष्ठान जो सांख्य करता । मूल तत्वसे है तन्मयता । पाता है वह ॥ ३६ ॥ दूसरा कर्मयोग जान । जो साधक जन निपुण । प्राप्त करते वे निर्वाण । परमगति ॥ ३७ ॥ मार्ग है दोनों भिन्न । अन्तमें हैं समान । पक्वापक्व भोजन । तृप्ति एक ॥ ३८ ॥ या पूर्व-पश्चिमकी सरिता । दीखनेमें है अति भिन्नता । सागर संगमसे एकता । होती दोनोंमें ॥ ३९ ॥ वैसे हैं ये दोनों मत । एक हेतुसे प्रेरित । किंतु जैसे उपासित । योग्यतासे ॥ ४० ॥ श्रीभगवानने कहा जगमें दोहरी निष्ठा कही है पहले तुझे । ज्ञानसे सांख्य जो पाते योगी हैं कर्मसे यही ॥ ३ ॥ ७९ कर्मयोग

पंछी जैसे उड़कर । पाता है फल सत्वर । पायेगा क्या ऐसा नर । पक्षि की भाँति ॥ ४१ ॥ चढ़ेगा वह डाल डाल । देख करके काल बेल । धीरेसे पायेगा ही फल । निश्चित ॥ ४२ ॥ वैसे विहंगम गतिसे । आचरण कर ज्ञानसे । सांख्य अति तीव्र गतिसे । पाता मोक्ष ॥ ४३ ॥ वैसे योगी कर्माधार । विधिसे कर्म आचर । पूर्णत्व स-अवसर । पाता ही है ॥ ४४ ॥ न कर्मणामनारम्भात्रैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥ न कर कर्मारंभ उचित । बनना चाहे तो सिद्धवत । कर्म हीनको जान निश्चित । असंभव ॥ ४५ ॥ प्राप्त कर्म छोड़ना । फिर नैष्कर्म्य होना । व्यर्थ बोल अर्जुन । मूर्खताके ॥ ४६ ॥ वहां किनारे लगना । यहां नावको त्यजना । ऐसी बातोंका घडना । कैसे होगा ॥ ४७ ॥ इच्छा करना भोजनकी । किंतु पाक न करनेकी । सिद्ध पाक भी त्यजनेकी । होगी कैसी ॥ ४८ ॥ जब तक नहीं हुई निरिच्छिता । तब तक कर्मकी अनिवार्यता । आत्म तृप्तिसे मिटता स्वभावता । कर्म बंधन ॥ ४९ ॥ इसलिये तू सुन पार्थ । जिसे है नैष्कर्म्यमें आस्था । उसे उचित कर्म सर्वथा । नहीं त्याज्य ॥ ५० ॥ अपने करनेसे होता । तथा छोड़नेसे मिटता । इच्छा पर है क्या चलता । कभी कर्म ॥ ५१ ॥ टालके कर्म आरंभ नैष्कर्म्य मिलता नहीं । संन्यासकी क्रियासे ही न पाते पूर्ण सिद्धिको ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०

ऐसा बोलना जान व्यर्थका । हल करना उलझनका । त्यजनेसे न होता कर्मका । त्याग निश्चित ॥ ५२ ॥ न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥ कर्मातीत अवस्थामें कर्मत्याग असंभव— जब है प्रकृतिका अधिष्ठान । तब छोड़ना करना अज्ञान । चेष्टायें चलती हैं गुणाधीन । अपने आप ॥ ५३ ॥ विहित कर्म है जितना । ठान लिया यदि त्यागना । मिटेंगे क्या स्वभाव नाना । इंद्रियोंके ॥ ५४ ॥ सुनना छोड़ेंगे क्या कान । देखना छोड़ेंगे नयन । सूंघना भूलेगा क्या घ्राण । गंध जो ॥ ५५ ॥ अथवा प्राणापानकी गति । निर्विकल्प बनेगी क्या मति । तथा क्षुधा-तृषादिकी आर्ति । मिटेगी क्या ॥ ५६ ॥ मिटेगा क्या स्वप्नादि बोध । भूलेंगे क्या चलना पाद । तथा जन्म-मृत्युका नाद । मिटेगा क्या ॥ ५७ ॥ यह सब नहीं रुकता । इसीलिये कर्म रहता । कर्मका त्याग नहीं होता । देह धारिका ॥ ५८ ॥ कर्म होता है पराधीन । प्रकृति गुणसे निष्पन्न । चित्तका यह अभिमान । है व्यर्थका ॥ ५९ ॥ बैठा जब रथ पर । अति निश्चल होकर । किंतु चले पथ पर । परतंत्र हो ॥ ६० ॥ अथवा उड़ा हवासे । सूखा पत्ता ऊंचा जैसे । भ्रमता निश्चेष्टतासे । आकाशमें ॥ ६१ ॥ बिना कर्म कभी कोई न रहे क्षण-मात्र भी । प्रकृति गुणसे सारे बद्ध हो करते नित ॥ ५ ॥ ८१ कर्मयोग

वैसे प्रकृति आधार । कर्मेंद्रियोंके विकार । चले कर्म निरंतर । नैष्कर्म्यका ॥ ६२ ॥ जब तक नाता है प्रकृतिका । तब तक त्याग न होता कर्मका । ऐसा करूंगा कहनेवालों का । रहता है उठ ॥ ६३ ॥ कर्मेंद्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥ कर्म त्यागमें नैष्कर्म्यका दंभ— उचित कर्म जो छोड़ते । नैष्कर्म्य साधना चाहते । प्रकृति निरोध करते । कर्मेंद्रियोंकी ॥ ६४ ॥ उनका कर्म त्याग नहीं होता । कर्तव्य भाव मनमें रहता । वैसा केवल बनाव बनता । दरिद्र जो ॥ ६५ ॥ ऐसे वे रहते पार्थ । विषयासक्त सर्वथा । जानना यह तत्वता । विभ्रांत ॥ ६६ ॥ अब मेरी बात सुन । अवसर है अर्जुन । कहता नैष्कर्म्य चिन्ह । तुझसे मैं ॥ ६७ ॥ यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेंन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥ आत्मरत कर्मोंसे कर्म-मुक्त नैष्कर्मी है – होता जो अन्तरमें दृढ । परमात्म रूपमें गूढ । बाहर लौकिकमें रूढ । सबका सा ॥ ६८ ॥ इंद्रियोंको आज्ञा नहीं देता । विषयोंका भय न धरता । प्राप्त कर्म वह न छोड़ता । उचित जो ॥ ६९ ॥ रोक कर्मेंद्रियोंको तो चित्तमें स्मरता रहा । विषयोंको मह-मूढ मिथ्याचारी कहा उसे ॥ ६ ॥ मनसे इंद्रियोंको तो लगके कर्ममें नित । निःसंग रहता योगी माना वह विशेष है ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२

इंद्रियोंको वह कर्ममें । नहीं रोकता बंधनमें । किंतु उनकी धर्मियोंमें । उलझता नहीं ॥ ७० ॥ न होता कामनामें लिप्त । नहीं मोह मलमें सिक्त । सदा रहता है अलिप्त । पद्मपत्रसा ॥ ७१ ॥ सबके संगमें वह रहता । सब्रके समान वह दीखता । जैसे जलमें है आभास होता । भानुबिंबका ॥ ७२ ॥ जन सामान्यसा रहता । साधारण ही दीखता । वैसे निर्णय नहीं होता । कल्पनासे भी ॥ ७३ ॥ ऐसे चिन्होंसे चिन्हित । रहता है वह मुक्त । आशा पाशसे रहित । उसे जान ॥ ७४ ॥ वही है योगी कहलाता । विश्व-विशेष हो रहता । तभी मैं तुझसे कहता । बन वैसा ॥ ७५ ॥ मनका तू नियमन कर । निश्चल कर निज अन्तर । कर्मेंद्रियोंका व्यापार कर । सुखसे तब ॥ ७६ ॥ नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ ८ ॥ निरहंकार निष्काम कर्म कर - होना चाहे' यदि कर्मातीत । यह यहां असंभव बात । सोचो निषिद्धकर्ममें रत । रहे क्यों ॥ ७७ ॥ इसी लिये जो है उचित । तथा समय पर प्राप्त । वह कर्म, हेतु रहित । करते जाना ॥ ७८ ॥ पार्थ अन्य ही एक । न जाने तू कौतुक । ऐसा कर्म मोचक । सहज होता ॥ ७९ ॥ रहता जो कर्मानुगत । स्वधर्ममें सतत रत । जिससे है मोक्ष निश्चत । जान तू ॥ ८० ॥ नेमे हुये करो कर्म योग्य हैं करना इसे । तेरी शरीर यात्रा भी बिना कर्म चले नहीं ॥ ८ ॥ ८३ कर्मयोग

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥ स्वधर्म अनादि और अनिवार्य – स्वधर्म जो है अर्जुन । वही नित्य यज्ञ ज्ञान । करनेसे आचरण । नहीं पाप ॥ ८१ ॥ त्यजनेसे निज-धर्म । चिपकते हैं कुकर्म । यह बंधनका मर्म । सांसारिक ॥ ८२ ॥ तभी स्वधर्माचरण । नित्य यज्ञके समान । जिससे होता बंधन । कभी नहीं ॥ ८३ ॥ लोक है यह कर्ममें बद्ध । परतंत्र देहमें आबद्ध । क्यों कि हैं नित्य यज्ञ विरुद्ध । चलनेसे ॥ ८४ ॥ इस विषयमें अब पार्थ । कहता हूं तुझे एक कथा । विश्व आदिकी यह है संस्था । रची ब्रह्माने ॥ ८५ ॥ सहयज्ञाः प्रजाःसृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वम् एषवोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥ वह नित्य-याग सहित । सृजे भूत मात्र समस्त । किंतु ये यज्ञसे अज्ञात । सूक्ष्म होनेसे ॥ ८६ ॥ प्रार्थना जब की प्रजाने ब्रह्माकी । औ' याचना की उनसे आश्रयकी । कमल संभवने तब बात की । भूतमात्रसे ॥ ८७ ॥ वर्ण विशेषको हमने उचित । व्यवस्था की है स्वधर्मकी निश्चित । उस पर चलनेसे है खचित । इच्छा तृप्ति ॥ ८८ ॥ यज्ञार्थ कर्मको छोड लोकमें कर्म-बंधन । यज्ञार्थ ही कर कर्म अर्जुन मुक्त संग तू ॥ ९॥ प्रजाके साथ ही यज्ञ ब्रह्माने सृजके कहा । यज्ञोंसे ही बने श्रेष्ठ तुम्हारी कामधेनु ये ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ८४

न करना अनुष्ठान । न यात्रादि तीर्थस्थान औ' अन्य देह दंडन । करना नहीं ॥ ८९ ॥ न करे योगादि साधन । तथा सकाम आराधन । मंत्र तंत्र आदि विधान । अनावश्यक ॥ ९० ॥ देवताओंका पूजन । सर्वथा ही वर्ज मान । करो स्वधर्माचरण । अनायास ॥ ९१ ॥ सदा अहेतुक भावसे । पतिव्रता जैसे पतिसे । अनुसरना तुम वैसे । स्वधर्मको ॥ ९२ ॥ वैसा स्वधर्म रूप मख । यही नित्य सेव्य है एक । ऐसा सत्य-लोक नायक । कहने लगे ॥ ९३ ॥ नित जो स्वधर्म भजेगा । उसकी कामधेनु होगा । न प्रजाको वह त्यजेगा । यह निश्चित ॥ ९४ ॥ देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ इससे होगा समस्त । संतुष्ट होंगे दैवत । फिर तुम्हे वे ईप्सित । देंगे वर ॥ ९५ ॥ स्वधर्म पूजनसे नित । देव गण मिल समस्त । योग क्षेम सब निश्चित । देखेंगे तुम्हारा ॥ ९६ ॥ देवोंको तुम भजोगे । देव तुम्हें तोष देंगे । ऐसा परस्पर होगा । प्रेम वहां ॥ ९७ ॥ जहां जो करना चाहेगा । वह सहज सिद्ध होगा । वांछित जो वर मिलेगा । मानसका ॥ ९८ ॥ वाचा सिद्धि मिलेगी । आज्ञा धारक होंगी । तुमसे आज्ञा लेंगी । महा सिद्धियां ॥ ९९ ॥ देवोंको यज्ञसे तोषो तोषेंगे देव भी तुम्हें । अन्योन्य करके तुष्ट पावो परम श्रेयको ॥ ११ ॥ ८५ 'कर्मयोग'

जैसे ऋतुपतिका द्वार । वनश्रीसे ही निरंतर । लदा रहता फल भार । सौंदर्यमय ॥ १०० ॥ इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥ वैसे सब सुखके साथ । दैव ही जैसे मूर्तिमंत । खोज कर तुम्हारा पथ । आयेगा जान ॥ १ ॥ होंगे समस्त भोग भरित । वैसे ही सदा इच्छा रहित । होंगे यदि स्वधर्म निरत । रहोगे भाई ॥ २ ॥ किंतु सकल संपदा तजकर । तथा इंद्रिय मदमें डूब कर । विषय स्वादमें जो लुब्ध होकर । रहता है सदा ॥ ३ ॥ तजकर वह यज्ञ भाव । देते हैं जो यज्ञ-तुष्ट देव । रख ईश्वरमें भक्ति भाव । भजेगा नहीं ॥ ४ ॥ न अग्नि मुखमें हवन । न करेगा देवतार्चन । न प्राप्त समय भोजन । ब्राह्मणोंको ॥ ५ ॥ नहीं करेगा गुरु-भक्ति । तथा न आदर अतिथि । न रखेगा संतुष्ट जाति । अपनी भी ॥ ६ ॥ स्वधर्म-क्रिया रहित । संपन्नतामें प्रमत्त । ऐसा मात्र भोगासक्त । होगा वह ॥ ७ ॥ इसमें है आपदा बहुत । संपदा होगी उसकी हत । न भोग सकेगा वह प्राप्त । भोग भी कभी ॥ ८ ॥ शरीर है जिसका गतायुष । उसमें न होता चैतन्यवास । दैव हत घरमें कभी वास । न होता लक्ष्मीका ॥ ९ ॥ लोप होता है जब स्वधर्मका । टूटता तब आश्रय सुखका । मिटता बुझनेसे दीपकका । प्रकाश जैसे ॥ १० ॥ यज्ञ-तुष्ट तुम्हें देव देंगे इच्छित भोग जो । उनका न उन्हे देके खाता जो वह चोर है ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६

मिटती है जब निज-वृत्ति । न रहती स्वातंत्र्यकी बस्ती । सुनो प्रजाजन यह उक्ति । कहता है ब्रह्म ॥ ११ ॥ जो कोई स्वधर्म छोड़ेगा । उसको काल दंड देगा । चोर मानके हर लेगा । उसका सर्वस ॥ १२॥ जन्म देता सभी पापको । घेर लेते हैं जो उसको । रात्रि स-समय श्मशानको । जैसे भूत ॥ १३ ॥ दुःख ल्केश वहां त्रिभुवनके । पाप अनेकानेक प्रकारके । घर करते हैं दैन्य विश्वके । उसी स्थानमें ॥ १४ ॥ वह उन्मत्त ऐसे । कितने ही रोनेसे । कल्पांतमें भी उसे । नहीं मुक्ति ॥ १५ ॥ इसलिये निज धर्म न छोड़ना । इंद्रियोंको नहीं भड़कने देना । चतुरानने कहे ये वचन । प्रजा जनसे ॥ १६ ॥ छोड़ते ही जैसे जलचर । उसी क्षणम जाता है मर । वैसा ही स्वधर्म छोड़कर । होता नाश ॥ १७ ॥ इसलिये तुमको समस्त । अपनेलिये है जो उचित । स्वकर्ममें रहना उचित । कहा ब्रह्माने ॥ १८ ॥ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यंते सर्वकिल्बिषैः । भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥१३॥ तन त्यक्तेन-शेष प्रसाद सेवन — जो विहितक्रिया विधि । करे निर्हेतुक बुद्धि । जिससे प्राप्त समृद्धि । करता विनियोग ॥ १९ ॥ गुरु गोत्र अग्नि जो पूजता । स-समय द्विजको भजता । निमित्तादिकमें जो यजता । पितरुद्देशसे ॥ १२० ॥ यज्ञ क्रियामें जो उचित । आहुति देकर बचत । हुत शेष ही स्वभावतः । रहता है ॥ २१ ॥ खाके संत यज्ञ-शेष जलाते दोष हैं सब । पापी वे पाप खाते हैं पकाते अपने लिये ॥ १३ ॥ ८७ कर्मयोग्

अपने घरमें उसका सुखसे । आप सहित भोजन करनेसे । वह सुख भोग ही सब दोषोंसे । करेगा मुक्त ॥ २२ ॥ वह यज्ञ-शिष्ट भोग । सभी हरते हैं अध । जैसे नष्ट होते रोग । अमृत सिञ्चिसे ॥ २३ ॥ अथवा तत्व-निष्ठ जैसा । भ्रम रहित होता वैसा । यज्ञ शिष्ट भोग ही वैसा । होता दोष रहित ॥ २४ ॥ स्वधर्मसे जो किया उपार्जन । स्वधर्ममें व्यय कर सुजन । शेषका भोग करके अर्जुन । रहता तुष्ट ॥ २५ ॥ बिन उसके सुन तू पार्थ । आचरना नहीं अन्यथा । ऐसी है यह आदिकी कथा । कहता कृष्ण ॥ २६ ॥ जो हैं देहको ही आप मानते । विषय ही को है भोग्य जानते । बिन इसके नहीं समझते । दूसरा कुछ ॥ २७ ॥ जीवन है यज्ञोपकरण । न जानकर मोह कारण । भ्रमग्रस्त उदर भरण । करते अहंभावसे ॥ २८ ॥ जिव्हा चापल्यसे जो लोक । कराते रुचिकर पाक । सेवन करते पातक । पापी जन ॥ २९ ॥ जो है संपत्ति-मात्र संपूर्ण । यज्ञ द्रव्य होनेके कारण । करता स्वधर्म-यज्ञार्पण । आदि पुरुषमें ॥ १३० ॥ यज्ञ-शेष अन्न है ब्रह्म— यह छोड़ कर मूर्ख । अपने लिये ही देख । बनवाते हैं सुपाक । नानाविध ॥ ३१ ॥ जिससे यज्ञ सिद्ध होता है । परेशको संतोष होता है । यह सामान्य नहीं होता है । अन्न तू जान ॥ ३२ ॥ इसे न मानना तू साधारण । जीवन हेतु होनेके कारण । ब्रह्मरूप अन्न है यह जान । विश्वमें सर्वत्र ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८८

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥१४॥ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥१५॥ अन्नसे ही हैं भूत । बढ़ते हैं समस्त । फिर मेघ अन्नार्थ । बरसते हैं ॥ ३४ ॥ यज्ञसे पर्जन्यका जन्म । यज्ञको प्रसवता है कर्म । तथा कर्मका आदि है ब्रह्म । वेद रूप ॥ ३५ ॥ फिर वेदोंका परापर । प्रसवता है अक्षर । इसीलिये सचराचर । ब्रह्म-बद्ध ॥ ३६ ॥ किंतु कर्मकी है जो मूर्ति । यज्ञमें अधिष्ठित श्रुति । सुन तू हे सुभद्रापति । अखंडित ॥ ३७॥ एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥१६॥ पूर्व कर्म-फल भोगके लिये मनुष्य जन्म-- ऐसी है आदि परंपरा । संक्षेपमें धनुर्धरा । कही है तुझसे अध्वरा- । केलिये ॥ ३८ ॥ तभी मूलमें यह उचित । स्वधर्म रूप यज्ञ सुकृत । आचरण न करते मत्त । इस लोकमें ॥ ३९ ॥ अन्नसे जन्मते जीव वर्षासे अन्न संभव । यज्ञसे बरसे वर्षा कर्मसे यज्ञ उद्भव ॥ १४ ॥ ब्रह्मसे कर्म उत्पन्न ब्रह्म अक्षरसे बना । सर्वव्यापक जो ब्रह्म यज्ञमें रहता नित ॥ १५ ॥ ऐसा प्रेरक जो चक्र निभाता जगमें नहीं । इंद्रियासक्त है पापी खोता है व्यर्थ जीवन ॥ १६ ॥ ८९ कर्मयोग (12)

रचते वे ढेर पातकोंके । भार रूप जानो वे भूमिके । कुकर्म करते इंद्रियोंके । तोषार्थ जो ॥ १४० ॥ उनका जन्म कर्म सकल । अर्जुन है अति निष्फल । जैसे होता है अभ्र पटल । अकालका ॥ ४१ ॥ अथवा कंठ स्तन हैं अजके । वैसे जीवन है मान उनके । जिससे अनुष्ठान स्वधर्मके । घडते नहीं ॥ ४२ ॥ इसीलिये सुन अर्जुन । स्वधर्मको नहीं त्यजना । सर्व भावसे है भजना । यही एक ॥ ४३ ॥ शरीर हुवा यदि प्राप्त । वह पूर्व -कर्मानुगत । फिर कर्तव्य जो उचित । छोड़ना क्यों ॥ ४४ ॥ सुन तू यह धनुर्धर । प्राप्त कर यह शरीर । आलस्य करते गंवार । कर्ममें जो ॥ ४५ ॥ यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥१७॥ आत्मलीन ही कर्म मुक्त- वे रह कर देह धर्ममें । लिप्त नहीं होते हैं कर्ममें । रमते हैं जो आत्म रूपमें । अखंडित ॥ ४६ ॥ आत्मबोधमें जो मुदित । अपनेमें हुवा कृतार्थ । इसीलिये सहज मुक्त । कर्म संगसे ॥ ४७ ॥ नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥ आत्मामें ही रमता जो तृप्त हो आत्म भोगमें । आत्मामें ही सदा तुष्ट वह कर्तव्य मुक्त है ॥ १७ ॥ करे या न करे कर्म उसको ना प्रयोजन । न रहा उसका लोभ किसी भी प्राणिमें कहीं ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ९०