ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण बात मेरी सुनना । गूढार्थ मुझसे न बोलना । सरल विवेक जो कहना । देश-भाषामें ॥ १७ ॥ मेरी मति है जड़ अत्यंत । तो भी समझं ऐसी ही बात । हरि तुझे बोलना सतत । निश्चयात्मक ॥ १८ ॥ रोगको है यदि जीतना । उस पर औषध देना । किंतु वह सुस्वादु होना । अति मधुर ॥ १९ ॥ देव तेरे जैसे सद्गुरु । इच्छाकी तृप्ति क्यों न करूं । यहां संकोच किसका धरूं । तू ही माय मेरी ॥ २० ॥ अजी ! कामधेनु दुहनेमें । आयी अपने ही सदनमें । तब भी कामना करनेमें । कृपणता क्यों ? ॥ २१ ॥ चिंतामणि करमें आया । वांछित जो मन भाया । भोगनेमें संकोच किया । ऐसा क्यों ॥ २२ ॥ अमृत-सागरके पास । आके न मिटाता है प्यास । आना तब उसके पास । व्यर्थ ही है ॥ २४ ॥ जन्मोंकी उपासनासे । श्रीहरि दैव योगसे । तू हुआ है अपनेसे । आधीन आज ॥ २५ ॥ तभी न मांगें क्यों सर्वस । सुकाल है यह परेश । आयी जन्मांतरकी आस । पूर्ण होनेको ॥ २६ ॥ सकल जीवन सफल । मिला पुण्य यशका फल । सिद्ध मनोरथ सकल । हुए मेरे ॥ २७ ॥ सकल मंगल धाम । अजी देवदेवोत्तम । हुआ आज पूर्ण काम । तू स्वाधीन है ॥ २८ ॥ माताके पास बालक जैसे । लगता है स्तनमें स्वेच्छासे । न देखे काल अकाल वैसे । भक्त वत्सल ॥ २९ ॥ वैसे देव तुझसे । पूछते हैं स्वेच्छासे । न जाने समय ऐसे । कृपानिधि ॥ ३० ॥ देव ! सर्वत्र जो हित । आचरणमें उचित । कह एक जो निश्चित । कहता पार्थ ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८