ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान उवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥ अधिकार भेदसे उपदेश भिन्नता— इस बातसे अच्युत । कहता है हो विस्मित । अर्जुनका है ध्वनित । अभिप्रायसे ॥ ३२ ॥ अजी ! बुद्धि-योगकी बात । कहनेमें ही सांख्यमत । प्रकट किया स्वभावतः । अल्पमें ही ॥ ३३ ॥ उद्देश्य न वह जान कर । क्षुभित हुआ तेरा अंतर । कहूंगा मैं दोनों सत्वर । योग मार्ग ॥ ३४ ॥ सरल शब्दोंमें उपदेश दो— सुन तू वीर श्रेष्ठ । जनमें दोनों निष्ठा । मुझसे ही प्रकट । अनादि सिद्ध ॥ ३५ ॥ एक ज्ञान-योग कहलाता । अनुष्ठान जो सांख्य करता । मूल तत्वसे है तन्मयता । पाता है वह ॥ ३६ ॥ दूसरा कर्मयोग जान । जो साधक जन निपुण । प्राप्त करते वे निर्वाण । परमगति ॥ ३७ ॥ मार्ग है दोनों भिन्न । अन्तमें हैं समान । पक्वापक्व भोजन । तृप्ति एक ॥ ३८ ॥ या पूर्व-पश्चिमकी सरिता । दीखनेमें है अति भिन्नता । सागर संगमसे एकता । होती दोनोंमें ॥ ३९ ॥ वैसे हैं ये दोनों मत । एक हेतुसे प्रेरित । किंतु जैसे उपासित । योग्यतासे ॥ ४० ॥ श्रीभगवानने कहा जगमें दोहरी निष्ठा कही है पहले तुझे । ज्ञानसे सांख्य जो पाते योगी हैं कर्मसे यही ॥ ३ ॥ ७९ कर्मयोग