भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥ सरल शब्दोंमें उपदेश दो— तू ही जब देव ! ऐसा कहता । अज्ञानी मैं कह क्या करता । मिट ही गयी अब मनो-वार्ता । विवेककी ॥ ६ ॥ ऐसा यदि तेरा उपदेश । रहा क्या दूसरा स्मृति-भ्रंश । हुआ अब संपूर्ण विनाश । आत्मबोधका ॥ ७ ॥ वैद्य पहल पथ्य कहता । फिरसे चुपके विष देता । फिर क्या है रोगीका बनता । कहो मुझे ॥ ८ ॥ भटकना जैसे अंधेको । मद्य पिलाना मर्कटको । वैसा उपदेश हमको । देता सुन्दर ॥ ९ ॥ पहले ही मैं हूं अजान । फिर मोहग्रस्त महान । विवेक मैंने यह मान । तुझसे पूछा ॥ १० ॥ देव ! है तेरी निराली बात । उपदेशसे चित्त भ्रमित । ऐसे करना है क्या उचित । अपनोंसे ॥ ११ ॥ हम हैं तन-मन जीवसे । करें अनुकरण सदासे । तथा तेरा करना जो ऐसे । मिटा सर्वस ॥ १२ ॥ ऐसा यदि तेरा उमदेश । उसमें कैसी हितकी आस । औ' मिटे ज्ञानार्जनकी आस । कहता अर्जुन ॥ १३ ॥ गई कुछ जाननेकी बात । मन भी हुआ अव्यस्थित । पहले था जो स्थिर चित्त । मेरा देव ॥ १४ ॥ वैसे है श्रीकृष्ण तेरा । चरित्र अंति गहरा । तू देखता चित्त मेरा । इस बहाने ॥ १५ ॥ अथवा तू हमें फंसाता । या गूढ तत्व है कहता । वह समझमें न आता । सोचनेसे ॥ १६ ॥ मिश्र-वचनसे बुद्धि करता मोह-युक्त तू। जिससे श्रेय पाऊं मैं कह तू एक निश्चित ॥ २ ॥ ७७ कर्मयोग