ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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३ कर्मयोग अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मताबुद्धिर्जनार्दन । तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ तो र्म करने क्यों कहता है ?— सुनो तब बोला अर्जुन । देव तूने कहा वचन । किया है उसका मनन । कमलापति ॥ १ ॥ वहां कर्म तथा कर्ता । देखनेसे नहीं रहता । ऐसा मत तेरा अनंत । यदि निश्चित है ॥ २ ॥ मुझे तब कैसा श्रीधर । कहता है तू युद्ध कर । यहां कर्ममें महा घोर । ढकलता कैसे ॥ ३ ॥ अजी तू ही कर्म अशेष । निषेध करता निःशेष । किंतु मुझसे यह हिंसक । कराता कैसे ॥ ४ ॥ सोचो यह हृषीकेश । मानता तू कर्म-लेश । हमसे तू ऐसी हिंसा । कराता है ॥ ५ ॥ अर्जुनने कहा कर्मसे बुद्धिको श्रेष्ठ मानता तू जनार्दन । तब क्यों कर्ममें घोर डालता मुझ केशव ॥ १ ॥