ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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सुनकर यह कृष्ण वचन । अर्जुन कहता मन ही मन । इस विचारसे है सिद्ध जान । अपना कार्य ॥ ७१ ॥ तीसरे अध्यायकी भूमिका— कर्म- मार्ग इससे संपूर्ण । होता सहज निराकरण । तब रहा युद्धका कारण । कहां औ' कैसे ॥ ७२ ॥ इस विचारसे अर्जुन । होकर संतुष्ट महान । पूछेगा भला-सा प्रश्न । संदेहसे ॥ ७३ ॥ वह प्रसंग अति सुंदर । सकल धर्मका है आगर । या विवेकामृतका सागर । सीमातीत ॥ ७४ ॥ है जो स्वयं सर्वज्ञ नाथ । कहेगा अब श्रीअनंत । वही है ज्ञानदेव बात । निवृत्तिदास ॥ ७५ ॥ गीता श्लोक ७२ ज्ञानेश्वरी ओवी ३७५. ॐ (10*)