ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपने घरमें उसका सुखसे । आप सहित भोजन करनेसे । वह सुख भोग ही सब दोषोंसे । करेगा मुक्त ॥ २२ ॥ वह यज्ञ-शिष्ट भोग । सभी हरते हैं अध । जैसे नष्ट होते रोग । अमृत सिञ्चिसे ॥ २३ ॥ अथवा तत्व-निष्ठ जैसा । भ्रम रहित होता वैसा । यज्ञ शिष्ट भोग ही वैसा । होता दोष रहित ॥ २४ ॥ स्वधर्मसे जो किया उपार्जन । स्वधर्ममें व्यय कर सुजन । शेषका भोग करके अर्जुन । रहता तुष्ट ॥ २५ ॥ बिन उसके सुन तू पार्थ । आचरना नहीं अन्यथा । ऐसी है यह आदिकी कथा । कहता कृष्ण ॥ २६ ॥ जो हैं देहको ही आप मानते । विषय ही को है भोग्य जानते । बिन इसके नहीं समझते । दूसरा कुछ ॥ २७ ॥ जीवन है यज्ञोपकरण । न जानकर मोह कारण । भ्रमग्रस्त उदर भरण । करते अहंभावसे ॥ २८ ॥ जिव्हा चापल्यसे जो लोक । कराते रुचिकर पाक । सेवन करते पातक । पापी जन ॥ २९ ॥ जो है संपत्ति-मात्र संपूर्ण । यज्ञ द्रव्य होनेके कारण । करता स्वधर्म-यज्ञार्पण । आदि पुरुषमें ॥ १३० ॥ यज्ञ-शेष अन्न है ब्रह्म— यह छोड़ कर मूर्ख । अपने लिये ही देख । बनवाते हैं सुपाक । नानाविध ॥ ३१ ॥ जिससे यज्ञ सिद्ध होता है । परेशको संतोष होता है । यह सामान्य नहीं होता है । अन्न तू जान ॥ ३२ ॥ इसे न मानना तू साधारण । जीवन हेतु होनेके कारण । ब्रह्मरूप अन्न है यह जान । विश्वमें सर्वत्र ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८८