भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 155

मिटती है जब निज-वृत्ति । न रहती स्वातंत्र्यकी बस्ती । सुनो प्रजाजन यह उक्ति । कहता है ब्रह्म ॥ ११ ॥ जो कोई स्वधर्म छोड़ेगा । उसको काल दंड देगा । चोर मानके हर लेगा । उसका सर्वस ॥ १२॥ जन्म देता सभी पापको । घेर लेते हैं जो उसको । रात्रि स-समय श्मशानको । जैसे भूत ॥ १३ ॥ दुःख ल्केश वहां त्रिभुवनके । पाप अनेकानेक प्रकारके । घर करते हैं दैन्य विश्वके । उसी स्थानमें ॥ १४ ॥ वह उन्मत्त ऐसे । कितने ही रोनेसे । कल्पांतमें भी उसे । नहीं मुक्ति ॥ १५ ॥ इसलिये निज धर्म न छोड़ना । इंद्रियोंको नहीं भड़कने देना । चतुरानने कहे ये वचन । प्रजा जनसे ॥ १६ ॥ छोड़ते ही जैसे जलचर । उसी क्षणम जाता है मर । वैसा ही स्वधर्म छोड़कर । होता नाश ॥ १७ ॥ इसलिये तुमको समस्त । अपनेलिये है जो उचित । स्वकर्ममें रहना उचित । कहा ब्रह्माने ॥ १८ ॥ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यंते सर्वकिल्बिषैः । भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥१३॥ तन त्यक्तेन-शेष प्रसाद सेवन — जो विहितक्रिया विधि । करे निर्हेतुक बुद्धि । जिससे प्राप्त समृद्धि । करता विनियोग ॥ १९ ॥ गुरु गोत्र अग्नि जो पूजता । स-समय द्विजको भजता । निमित्तादिकमें जो यजता । पितरुद्देशसे ॥ १२० ॥ यज्ञ क्रियामें जो उचित । आहुति देकर बचत । हुत शेष ही स्वभावतः । रहता है ॥ २१ ॥ खाके संत यज्ञ-शेष जलाते दोष हैं सब । पापी वे पाप खाते हैं पकाते अपने लिये ॥ १३ ॥ ८७ कर्मयोग्