भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥ स्वधर्म अनादि और अनिवार्य – स्वधर्म जो है अर्जुन । वही नित्य यज्ञ ज्ञान । करनेसे आचरण । नहीं पाप ॥ ८१ ॥ त्यजनेसे निज-धर्म । चिपकते हैं कुकर्म । यह बंधनका मर्म । सांसारिक ॥ ८२ ॥ तभी स्वधर्माचरण । नित्य यज्ञके समान । जिससे होता बंधन । कभी नहीं ॥ ८३ ॥ लोक है यह कर्ममें बद्ध । परतंत्र देहमें आबद्ध । क्यों कि हैं नित्य यज्ञ विरुद्ध । चलनेसे ॥ ८४ ॥ इस विषयमें अब पार्थ । कहता हूं तुझे एक कथा । विश्व आदिकी यह है संस्था । रची ब्रह्माने ॥ ८५ ॥ सहयज्ञाः प्रजाःसृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वम् एषवोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥ वह नित्य-याग सहित । सृजे भूत मात्र समस्त । किंतु ये यज्ञसे अज्ञात । सूक्ष्म होनेसे ॥ ८६ ॥ प्रार्थना जब की प्रजाने ब्रह्माकी । औ' याचना की उनसे आश्रयकी । कमल संभवने तब बात की । भूतमात्रसे ॥ ८७ ॥ वर्ण विशेषको हमने उचित । व्यवस्था की है स्वधर्मकी निश्चित । उस पर चलनेसे है खचित । इच्छा तृप्ति ॥ ८८ ॥ यज्ञार्थ कर्मको छोड लोकमें कर्म-बंधन । यज्ञार्थ ही कर कर्म अर्जुन मुक्त संग तू ॥ ९॥ प्रजाके साथ ही यज्ञ ब्रह्माने सृजके कहा । यज्ञोंसे ही बने श्रेष्ठ तुम्हारी कामधेनु ये ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ८४