भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

न करना अनुष्ठान । न यात्रादि तीर्थस्थान औ' अन्य देह दंडन । करना नहीं ॥ ८९ ॥ न करे योगादि साधन । तथा सकाम आराधन । मंत्र तंत्र आदि विधान । अनावश्यक ॥ ९० ॥ देवताओंका पूजन । सर्वथा ही वर्ज मान । करो स्वधर्माचरण । अनायास ॥ ९१ ॥ सदा अहेतुक भावसे । पतिव्रता जैसे पतिसे । अनुसरना तुम वैसे । स्वधर्मको ॥ ९२ ॥ वैसा स्वधर्म रूप मख । यही नित्य सेव्य है एक । ऐसा सत्य-लोक नायक । कहने लगे ॥ ९३ ॥ नित जो स्वधर्म भजेगा । उसकी कामधेनु होगा । न प्रजाको वह त्यजेगा । यह निश्चित ॥ ९४ ॥ देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ इससे होगा समस्त । संतुष्ट होंगे दैवत । फिर तुम्हे वे ईप्सित । देंगे वर ॥ ९५ ॥ स्वधर्म पूजनसे नित । देव गण मिल समस्त । योग क्षेम सब निश्चित । देखेंगे तुम्हारा ॥ ९६ ॥ देवोंको तुम भजोगे । देव तुम्हें तोष देंगे । ऐसा परस्पर होगा । प्रेम वहां ॥ ९७ ॥ जहां जो करना चाहेगा । वह सहज सिद्ध होगा । वांछित जो वर मिलेगा । मानसका ॥ ९८ ॥ वाचा सिद्धि मिलेगी । आज्ञा धारक होंगी । तुमसे आज्ञा लेंगी । महा सिद्धियां ॥ ९९ ॥ देवोंको यज्ञसे तोषो तोषेंगे देव भी तुम्हें । अन्योन्य करके तुष्ट पावो परम श्रेयको ॥ ११ ॥ ८५ 'कर्मयोग'