ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइंद्रियोंको वह कर्ममें । नहीं रोकता बंधनमें । किंतु उनकी धर्मियोंमें । उलझता नहीं ॥ ७० ॥ न होता कामनामें लिप्त । नहीं मोह मलमें सिक्त । सदा रहता है अलिप्त । पद्मपत्रसा ॥ ७१ ॥ सबके संगमें वह रहता । सब्रके समान वह दीखता । जैसे जलमें है आभास होता । भानुबिंबका ॥ ७२ ॥ जन सामान्यसा रहता । साधारण ही दीखता । वैसे निर्णय नहीं होता । कल्पनासे भी ॥ ७३ ॥ ऐसे चिन्होंसे चिन्हित । रहता है वह मुक्त । आशा पाशसे रहित । उसे जान ॥ ७४ ॥ वही है योगी कहलाता । विश्व-विशेष हो रहता । तभी मैं तुझसे कहता । बन वैसा ॥ ७५ ॥ मनका तू नियमन कर । निश्चल कर निज अन्तर । कर्मेंद्रियोंका व्यापार कर । सुखसे तब ॥ ७६ ॥ नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ ८ ॥ निरहंकार निष्काम कर्म कर - होना चाहे' यदि कर्मातीत । यह यहां असंभव बात । सोचो निषिद्धकर्ममें रत । रहे क्यों ॥ ७७ ॥ इसी लिये जो है उचित । तथा समय पर प्राप्त । वह कर्म, हेतु रहित । करते जाना ॥ ७८ ॥ पार्थ अन्य ही एक । न जाने तू कौतुक । ऐसा कर्म मोचक । सहज होता ॥ ७९ ॥ रहता जो कर्मानुगत । स्वधर्ममें सतत रत । जिससे है मोक्ष निश्चत । जान तू ॥ ८० ॥ नेमे हुये करो कर्म योग्य हैं करना इसे । तेरी शरीर यात्रा भी बिना कर्म चले नहीं ॥ ८ ॥ ८३ कर्मयोग