ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
प्राप्त प्रकाशको छोड़ना । अंधकूपमें फिर जाना । उससे है क्या लाभ होना । कहो देव ॥ ३९ ॥ आगको सम्मुख देख कर । गये न उसको लाघकर । क्षणमें वह लपटेकर । जला देगा ॥ ४० ॥ वैसे दोष असाधारण । घेरते हैं हमको पूर्ण । जानकर भी आचरण । करना कैसे ॥ ४१ ॥ पूछ कर इतना बोले पार्थ । सुनो देव इसका मतितार्थ । कहूंगा इस पापका अनर्थ । अब तुझसे ही ॥ ४२ ॥ कुलक्षये प्रणश्यंति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥ जेसे लकडीका घर्षण । उपजाता अग्नि महान । उससे जल जाता इंधन । प्रज्वल होके ॥ ४३ ॥ कुलमें वैसे परस्पर । वध किया तो स-मत्सर । उससे महादोष घोर । कुलघातका होगा ॥ ४४ ॥ अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः । स्त्रीषुदुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४१ ॥ इससे है ऐसा पाप । करें कुल-धर्म लोप । बढ़ता अधर्म व्याप । कुलमें ही ॥ ४५ ॥ इससे सारासार विचार । किसके कैसे क्या है आचार । मिट जाते हैं मूल आधार । विधि-निषेधके ॥ ४६ ॥ कुलके क्षयसे नाश कुल-धर्म सनातन । अधर्म फैलता सारा कुलके धर्म-नाशसे ॥ ४० ॥ अधर्म फैल जानेसे भ्रष्ट होती कुल-स्त्रियां । स्त्रियोंके भ्रष्ट होनेसे होता है वर्ण-संकर ॥ ४१ ॥ २७ अर्जुनविषादयोग
बुझाकर हाथका दीप । तममें चलनेसे आप । टकराये अपने आप । स्वाभाविक ॥ ४७ ॥ वैसा कुलक्षय जब होता । कुलमें आद्य-धर्म मिटता । कहो तब वहां क्या होता । पापके बिन ॥ ४८ ॥ छूटते हैं तब यम औ' नियम । टूटता मन-इंद्रियोंका संयम । घडता है व्यभिचारका कुकर्म । कुलस्त्रियोंसे ॥ ४९ ॥ उत्तममें अधमका संस्कार होता । इस भांति वर्ण अवर्णमें घुलता । तब है मूल सहित उखड जाता । संस्कृति धर्म ॥ ५० ॥ जैसे चौराहेके बलि पर । उडते हैं काग चहूं ओर । वैसे हैं दोष घुसते घोर । सत्कुलोंमें ॥ ५१ ॥ संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतंति पितरो ह्येषां लुप्त पिंडोदक क्रियाः ॥ ४२ ॥ फिर उस पूर्ण कुलको । तथा उस कुलघातिको । नरक मिला दोनोंको । इसको जान ॥ ५२ ॥ वंश विस्तार ही समस्त । होता जाता है जो पतित । गिरते पूर्वज स्वर्गस्थ । इससे सभी ॥ ५३ ॥ लोप होते जहां नित्य-कर्म । फिर कैसे नैमित्तिक धर्म । कहां रहे तब श्राध्द कर्म । किसके लिये ॥ ५४ ॥ नखाग्रमें डसनेसे साप । शिखाग्रतक विषका व्याप । वैसे आब्रह्म डूबता आप । समूचा कुल ॥ ५५ ॥ दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यंते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥ इससे नर्कमें जाता कुलघ्नों सह है कुल । पितरोंका अधःपात होता है श्राद्ध लोपसे ॥ ४२ ॥ दोषसे है कुलघ्नोंके होता है वर्ण-संकर । डूबते जातिके धर्म कुल धर्म सनातन ॥ ४३ ॥ ज्ञानेश्वरी २८
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुमः ॥ ४४ । अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हंतुं स्वजनमुद्यताः ॥४५॥ सुन प्रभुजी वचन एक । यहां घडता महापातक । जिस संग दोषसे लौकिक । पाता है भ्रांति ॥ ५६ ॥ जैसे है अपने घरको । लगी आग सब गांवको । निगलती है सर्वस्वको । जला करके ॥ ५७ ॥ वैसे ही उस कुल संगतिसे । दूसरे जनके बरतनेसे । उनके ऐसे हीन संसर्गसे । फैलते हैं दोष ॥ ५८ ॥ ऐसे नाना दोषोंका सकल । भांडार होता है ऐसा कुल । कहता पार्थ उसे केवल । नरक भोग घोर ॥ ५९ ॥ उस स्थानमें हुआ पतन । न होता कल्पांतमें उत्थान । कुलक्षयका पाप महान । अर्जुन कहता ॥ ६० ॥ अजी सुनके यह कानसे । घिन नहीं की तूने चितसे । कठोर किया हिय वज्र-से । कृष्ण तूने ॥ ६१ ॥ अपेक्षा है क्यों राज्य औ' सुख । जिसके लिये वह क्षणिक । जानकर भी यह ये दोष । नहीं त्यजना क्या ? ॥ ६२ ॥ आये यहां अपने कुलके श्रेष्ठ । हमने देखा शत्रु दृष्टिसे भृष्ट । नहीं क्या यह महादोष अनिष्ट । किया हमने ॥ ६३ ॥
जिनके कुलके धर्म डूबते उनको नित । होता नरकमें वास सुनते हैं यही हम ॥ ४४ ॥ कैसा यह महापाप करने जा रहे हम । मारना स्वजनोंको भी राज्यके सुख लोभसे ॥ ४५ ॥
२९ अर्जुनविषादयोग
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥ इस पर भी क्या है जीना । उससे भला चुप होना । शस्त्र छोडकर सहना । इनके तीर ॥ ६५ ॥ इससे जो कुछ होगा । मरनेमें भला होगा । यह पाप नहीं होगा । कभी मुझसे ॥ ६६ ॥ ऐसा देखकर सकल । अर्जुनने अपना कुल । कहा तब राज्य केवल । है नरकवास ॥ ६७ ॥ संजय उवाच एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः ॥ ४७ ॥ उस समयमें ऐसे । अर्जुन बोला कृष्णसे । संजय कहे राजासे । सुनियेजी ॥ ६८ ॥ अति उद्वेगसे ऐसे फिर । खिन्न मन गद्गद होकर । कूद कर आया पृथ्वी पर । रथसे वह ॥ ६९ ॥ राज कुंवर ऐसा पदच्युत । होकर के सर्वथा उपरत । या जैसे रवि हो राहुग्रस्त । हुआ हतप्रभ ॥ २७० ॥ अथवा महासिद्धिके भ्रममें । तापस उलझा मोहजालमें । तथा फंस कामना भंवरमें । हुआ है दीन ॥ ७१ ॥ इससे तजके शस्त्र रहना शांत होकर । मारेंगे फिर शस्त्रोंसे रणमें मुझे कौरव ॥ ४६ ॥ संजयने कहा रणमें कहके ऐसा शोकाकुल धनंजय । डाल कर सभी शस्त्र रथमें बैठ ही गया ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०
तैसा वह धनुर्धर । दुःखावेगसे जर्जर । रथको था जो सुंदर । दिया छोड ॥ ७२ ॥ तथा छोड तीर कमान । करते अश्रुपात नयन । राजन् सुनो यह कथन । बोला संजय ॥ ७३ ॥ दूसरे अध्यायकी प्रस्तावना — इस पर वैकुंठ नाथ । देखके खेद-मूर्ती पार्थ । किस भांतिका परमार्थ । कहेगा भला ॥ ७४ ॥ सविस्तर करेगा वर्णन । सकौतुक कहेगा कथन । कहेगा ज्ञानदेव वचन । निवृत्तिदास ॥ ७५ ॥ गीता श्लोक ४७ ज्ञानेश्वरी ओवी २४७. ॐ
२ सांख्य योग संजय उवाच तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥ अर्जुनकी मनोदशा संजयने कहा राजासे । पार्थने साश्रु नयनसे । अति शोकाकुल होनेसे । किया रुदन ॥ १ ॥ स्वकुल देखकर समस्त । स्नेह उपजा अत्यद्भुत । उससे द्रवित हुवा चित्त । इस प्रकार ॥ २ ॥ जलमें घुलता जैसे नून । अथवा हिलता वातसे घन । ऐसे वह दृढ अन्तःकरण । हुवा द्रवित ॥ ३ ॥ मोहाधीन होनेसे वह ऐसा । दिखाया जैसा मुरझाया-सा । कीचमें फंसा हुआ-सा जैसा । राजहंस ॥ ४ ॥ इस भांति वह पांडुकुमार । महामोहमें हो अति जर्जर । खड़ा देख उसे श्रीशार्ंगधर । बोले ऐसा ॥ ५ ॥ संजयने कहा ऐसा जो करुणाग्रस्त अधीर अश्रु-पूरित । करता था जभी शोक उससे कृष्णने कहा ॥ १ ॥
भगवान उवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥ क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥ कृष्णका उपदेश— कहे हरि सोचलो तुम अर्जुन । शोक करने योग्य क्या यह स्थान । तूं कौन है क्यों आया है यह जान । औ' करता क्या है ? ॥ ६ ॥ तुझे हुआ क्या है ? । क्या न्यून आया है ? । औ' करना क्या है ? । खेद क्यों ? ॥ ७ ॥ कभी न सोचना तू असंगत । न छोड़ना कभी धैर्य उदात्त । भागे तुझसे अ-यशकी बात । कोसों दूर ॥ ८ ॥ तू है शौर्य-वृत्तिका स्थान । क्षत्रियोंमें अति महान । तेरी कीर्ति-कथाका गान । त्रिभुवनमें ॥ ९ ॥ तूने जीता रणमें शिवको । मिटाया निवात कवचोंको । तथा हराया है गंधर्वोंको । पराक्रमसे ॥ १० ॥ देखनेसे यह तेरे सम्मुख । दीखते हैं बौने ये तीनों लोक । ऐसा है पौरुषका लौकिक । अर्जुन तेरे ॥ ११ ॥ ऐसा तू इस स्थान पर । वीर-वृत्तिको छोड़कर । दीन-सा अधोमुख होकर । रोता रहा है ॥ १२ ॥ कैसे विषम वेलामें सूझा पाप यह तुझे । न सोहता बड़ोंको जो देता दुष्कीर्ति दुर्गति ॥ २ ॥ न हो निर्वीर्य तू पार्थ तुझे न शोभता यह । अपनी दुबली वृत्ति छोडके उठ तू अब ॥ ३ ॥ (3) ३३ सांख्ययोग
सोचकर देख तू अर्जुन । किस करुणासे उदासीन । कहो अंधेरेमें कैसे भानु । ढका आज ॥ १३ ॥ डरता क्या मेघसे पवन । है क्या अमृतको भी मरण । निगलता आगको ईंधन । सोचले तू ॥ १४ ॥ या नमकसे क्या पानी पिघलेगा । अन्य स्पर्शसे कालकूट मरेगा । अथवा महाशेषको निगलेगा । मंडूक अल्प ॥ १५ ॥ सिंहसे भिडे क्या जंबूक । ऐसा हुवा क्या अलौकिक । दिखाया है सच कौतुक । तूने आज ॥ १६ ॥ इसलिये सुन अर्जुन । न होने दो चितको दीन । धैर्य दो मनको तत्क्षण । सावध होके ॥ १७ ॥ छोड़ दो यह अज्ञान । उठालो तीर कमान । रणमें किसका कौन । कारुण्य कैसे ॥ १८ ॥ तू है बड़ा जानकार । रणमें दया विचार । करना ऐसा अपार । उचित है क्या ॥ १९ ॥ इससे कीर्तिका नाश । परलोक अप भ्रंश । कहता जगन्निवास । अर्जुनसे ॥ २० ॥ इसीलिये शोक न कर । मनमें तू धीरज धर । तज दे तू पांडुकुमार । इस शोकको ॥ २१ ॥ तुझे नहीं यह उचित । इसमें अकीर्ति बहुत । अब भी तू अपना हित । सोचले ठीक ॥ २२ ॥ संग्राम समयमें ऐसे । करुणासे हित हो कैसे । आप्त हुये क्या ये अभीसे । कहो मुझे ॥ २३ ॥ पहलेसे क्या जानता नहीं । संग्राम है कुल-जनसे ही । करता है यह अ-कारण ही । शोक तू पार्थ ॥ २४ ॥ यह संघर्ष नहीं आजका । यह चला है जन्म कालका । आज ही क्यों ऐसा करुणाका । पुलक उठा ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४
अब ही क्या है हुआ ऐसा । आया यह तरस कैसा । अर्जुन यह विचित्र-सा । किया अनुचित ॥ २६ ॥ इस मोहसे ऐसा होगा । नाम जो था वह मिटेगा । परलोक साथ जायेगा । लौकिकके ॥ २७ ॥ शिथिलता ऐसी हृदयकी । कारण होगी जो अहितकी । जानो संग्राममें पतनकी । क्षत्रियोंके ॥ २८ ॥ ऐसा वह कृपावंत । सिखाता है जो सतत । सुन यह पांडुसुत । बोले ऐसा ॥ २९ ॥ अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हा वरिसूदन ॥ ४ ॥ अर्जुनका प्रत्युत्तर— देव सुनोजी इतना । कारण नहीं बोलना । अपनेमें ही सोचना । यह युद्ध है क्या ॥ ३० ॥ युद्ध नहीं यह अपराध । करना है कुलका उच्छेद । करना पडा यह प्रमाद । हमको यहां ॥ ३१ ॥ माता पिताका वंदन । देना उन्हे समाधान । छोड़ करना हनंन । उचित है क्या ॥ ३२ ॥ सन्त-वृंदका करे वंदन । हो सके तो करना पूजन । छोड़ सुनाना निंदा वचन । उचित है क्या ? ॥ ३३ ॥ हमारे कुल-गुरु ये ऐसे । वंदनीय हमें नियमसे । हमें पूज्य भीष्म द्रोण वैसे । सदा सर्वत्र ॥ ३४ ॥ जिनका वैर न करता है मन । स्वप्नमें भी यह असंभव जान । उनका करना प्रत्यक्ष हनन । कैसे देव ॥ ३५ ॥ रणमें मैं लडूं कैसे विरुद्ध भीष्म-द्रोणके कैसे मारूं इन्हे बाण हमें ये पूजनीय हैं ॥४॥ ३५ सांख्ययोग
अजी जलने दो ऐसा जीवन । सबका हुआ क्या अंतःकरण । वधमें क्या क्षात्रत्व- अभिमान । गुरुजनोंके ॥ ३६ ॥ पार्थका गुरु है यह द्रोण । दिया धनुर्विद्याका शिक्षण । है क्या उसकी यह दक्षिणा । वध करना ॥ ३७ ॥ जिसकी कृपासे मिला वर । उसीसे मनमें अभिचार । ऐसां बनुं क्या मैं भस्मासुर । कहता अर्जुन ॥ ३८ ॥ गुरुनहत्वा हि महानुभावान श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुंजीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान ॥ ५ ॥ देख गंभीर होता सागर । वह भी है ऊपर ऊपर । न क्षोभता हृदय सागर । द्रोणका कभी ॥ ३९ ॥ अपार यह गगन । उसका भी होगा भान । अगाध अति गहन । है द्रोण हृदय ॥ ४० ॥ अमृत भी बिगडेगा । वज्र भी टूट जायेगा । किंतु दोष न आयेगा । इनके मनमें ॥ ४१ ॥ ममता होती है माताकी । ख्याति है इस बातकी । किंतु मूर्ति है ममताकी । द्रोणाचार्य ॥ ४२ ॥ ये हैं कारुण्यके आगर । सकल गुणोंके सागर । विद्या सिंधु हैं ये अपार । कहता पार्थ ॥ ४३ ॥ ऐसे हैं ये महान महत । हमसे हैं अति कृपावंत । अब कहो क्या करना घात । असंभव यह ॥ ४४ ॥ न मारके पूज्य आचार्य श्रेष्ठ जीना भला है भिक्षान्नसे ही । हितेच्छुओंके वधसे ये भोग किस भांति भोगें जो रक्त सिक्त ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६
ऐसोंको रणमें मारना । फिर राज्य सुख भोगना । इसका विचार करना । हे असंभव ॥ ४५ ॥ दूभर है राज्य भोग भोगना । इंद्रपद भी ग्रहण करना । इससे अधिक भला है जीना । भिक्षान्नसे ही ॥ ४६ ॥ न तो देश-त्याग कर जाना । गिरी-कंदरामें जा बसना । करमें शस्त्र नहीं धरना । इनके सम्मुख ॥ ४७ ॥ पैने शस्त्रोंसे मर्म-स्थान । करना इनका भेदन । फिर इनके खूनमें सान । पाना भोगैश्वर्य ॥ ४८ ॥ रक्त-सिक्त वे ऐसे । भोग भोगना कैसे । न जंचे मुझे ऐसे । वचन तेरे ॥ ४९ ॥ दीन अर्जुनकी अनन्य शरणता— उस समयमें अर्जुन । कहता है कृष्ण तू सुन । किंतु वह न देता कान । सुन करके भी ॥ ५० ॥ यह जानकर चौंका अर्जुन । फिरसे बोला अपना वचन । देता नहीं तू देव अवधान । मेरी बात पर ॥ ५१ ॥ न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ जो विचार मेरे मनमें । बोला मैं वह इस स्थानमें । अब है भला जो करनेमें । जाने वह तू ही ॥ ५२ ॥ होगी हमारी जय या उन्हींकी किसमें भलायी यही न जानूं । हत्यासे जिनके जीना न चाहूं वही खडे हैं युद्धार्थ डटके ॥ ६ ॥ ३७ सांख्ययोग
किंतु जिनसे बैर करना । मृत्यु सम है यह कल्पना । लेकर खडे युद्ध-भावना । वे इस रणमें ॥ ५३ ॥ अब क्या ऐसोंका वध करना । अथवा इन्हे छोड़कर जाना । इन दोनोंमें हमें क्या करना । यह हम न जानते ॥ ५४ ॥ कार्पण्य दोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥ कौन बात करना यहां उचित । वह विचारही नहीं स्फुरित । इस मोहसे ग्रस्त है मम चित्त । अकुलाहटसे ॥ ५५ ॥ आंखों पर जब धुंद पडता । दृष्टिका तेज तब भ्रंश होता । पासका भी कछु नहीं दीखता । वस्तुमात्र ॥ ५६ ॥ मेरा ऐसा ही हुआ है । भ्रांतिने मन लीला है । निज-हित किसमें है । वही न दीखता ॥ ५७ ॥ देव ! विचार कर देखना । जिसमें हित है वह कहना । तू है प्रिय सखा ही अपना । तथा सर्वस्व ॥ ५८ ॥ जैसे तू गुरु बंधु पिता । तू हमारा इष्ट देवता । तू ही है रक्षण करता । सदा सर्वत्र ॥ ५९ ॥ कभी शिष्यका अनादर । न होता है गुरुके घर । जैसे सरिताको सागर । त्यजे कैसे ॥ ६० ॥ अथवा आपत्यको माता । छोड़ती कर निष्ठुरता । किसके बल वह जीता । कह तू कृष्ण ॥ ६१ ॥ दीनातासे नष्ट हुयी स्व-वृत्ति घिरा मोहसे है स्वधर्म-ज्ञान । कैसे मेरा श्रेय होगा कहोजी पगमें झुका हूं ले शिष्यभाव ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३८
सर्वोपरि तू हैं ईश वैसे । हमारा जीवनाधार जैसे । असहमत मेरी बातसे । अब जो कही थी ॥ ६२ ॥ तो करना क्या उचित । यहां है धर्म-सम्मत । कहो मुझे तू त्वरित । पुरुषोत्तम ॥ ६३ ॥ न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात् यच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥ हरि-कृपाका वर्णन— देखकर यह कुल सकल । हृदय हुआ है शोक विव्हल । सुनकरके वह तेरे बोल । होगा शांत ॥ ६४ ॥ मिलेगा यह पृथ्वीतल । या महेंद्र पद सकल । मन है जो मोह विव्हल । शांत न होगा ॥ ६५ ॥ भूना हुआ बीज जैसे । अच्छे खेतमें बोनेसे । औ' खाद पानी देनेसे । नहीं अंकुरता ॥ ६६ ॥ यदि आयुष्य भरा हो किसीका । उपयोग न होता औषधका । वहां उपाय परमामृतका । एकमात्र ॥ ६७ ॥ वैसे राज्य-भोग समृद्धि । न दें संजीवन जीवबुद्धि । अनुग्रह ही है कृपानिधि । तव कारुण्यका ॥ ६८ ॥ ऐसा बोला है अर्जुन । जो था मोह-मुक्त क्षण । मोह-उर्मिसे तत्क्षण । हुआ व्याप्त ॥ ६९ ॥ यहां मिलेगा बिना शत्रु राज्य वैसे ही इंद्रासन स्वर्गमें भी । तोभी न होगा यह शोक शांत मेरे सभी इंद्रिय सोखता जो ॥ ८ ॥ ३९ सांख्ययोग
मुझे लगता यह नहीं मो-लहर । यह है असंगत कोई अन्य प्रकार । इसपर पड़ा काल-सर्पका असर । महामोहकें ॥ ७० ॥ मर्म-स्थान जो हृदय कमल । उसपे कारुण्यका सम काल । दंश किया है महा-मोह व्याल । चढ़ता विष लहर ॥ ७१ ॥ इसके प्रभावको जानकर । जिसकी कृपादृष्टि ही उतार । दौड़ा है श्रीहरी करुणाकर । सपेरा बनके ॥ ७२ ॥ व्याकुल वह पांडुकुमार । समीप उसके जादूगर । रक्षा करेगा वह सत्वर । कृपा-लीलासे ॥ ७३ ॥ इसीलिये वह पार्थ । जो है मोहफणिग्रस्त । जानकर यह बात । कही मैंने ॥ ७४ ॥ वहां खड़ाथा धनुर्धर । मोहसे व्याकुल होकर । जैसे बादलोंमें भास्कर । निस्तेज होता ॥ ७५ ॥ वैसा खड़ा वह पांडुकुमार । दुःखावेगसे होकर जर्जर । जैसे ग्रीष्मकालमें गिरिवर । होता दावानल ग्रस्त ॥ ७६ ॥ इसलिये सहज सुनील । कृपामृतसे जो है सजल । अनुकूल हुआ श्रीगोपाल । महामेघ हो ॥ ७७ ॥ द्युति है वहां सुदर्शनकी । झलक वही विद्युल्लताकी । सजी हुई गंभीर वाणीकी । गर्जना-सी ॥ ७८ ॥ अब होगी वह वर्षा उदार । शांत होगा अर्जुन गिरिवर । फूटेगा ज्ञानका नव अंकुर । उसी स्थानपे ॥ ७९ ॥ सुनो यह कथा गहन । जिससे शांत होता मन । ज्ञानदेवका है बचन । जो निवृत्तिदास ॥ ८० ॥ संजय उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप । न योत्स्य इति गोविंदमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥ ऐसा अर्जुन जो वीर बोलके कृष्णसे यह अंतमें मैं न जूझूंगा कहके शांत हो गया ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०
अहंता छंदन— संजय ऐसा बोला । राजा ! अर्जुन बोला । पुनः हो शोकाकुल । यह बात ॥ ८१ ॥ धनंजय बोला श्रीकृष्णसे । अब न कहो कुछ मुझसे । न लडूंगा सर्वथा इनसे । निश्चित यह ॥ ८२ ॥ ऐसा कहकर अर्जुन । बैठा रहा हो मौन । देख कर यह श्रीकृष्ण । हुआ चकित ॥ ८३ ॥ तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ॥ १० ॥ फिर कहता मन ही मन । क्या करता है यह अर्जुन । न जानता यह अनजान । क्या करना अब ॥ ८४ ॥ अब होगा कैसे इसको ज्ञान । कैसे आयेगा धीरजका भान । करता है श्रीकृष्ण अनुमान । मांत्रिकसा ॥ ८५ ॥ अथवा देख असाध्य-व्याधी । अमृत सम दिव्य औषधि । योजता है वैद्य निरवधि । निदान करके ॥ ८६ ॥ करता श्रीहरि विवेचन । दोनों सेनाओंके मध्यस्थान । जिससे होगा मुक्त अर्जुन । महामोहसे ॥ ८७ ॥ उस निश्चित हेतुसे । हरिने कहा क्रोधसे । माताके क्रोधमें जैसे । रहता स्नेह ॥ ८८ ॥ औषधके तीतापनके अंदर । होता है जैसे अमृतका असर । वह गुण रूपसे ही निरंतर । दीखता वैसे ॥ ८९ ॥ वैसे ऊपरसे कठोर । अंदर जो अति मधुर । ऐसे वाक्य शार्गधर । बोला पार्थसे ॥ ९० ॥ पार्थसे यों हृषीकेश हंसके कहने लगे । खडा जो शोकमें डूबा वहीं उभयं सैन्यमें ॥ १० ॥ (6) ४१ सांख्ययोग
भगवान उवाच अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचंति पंडिताः ॥ ११ ॥ फिर अर्जुनसे कहता है। हमने अचरज देखा है। आज तुमने यहां किया है। मेरे समक्ष ॥ ९१ ॥ बनता बड़ा जानकार । न छोड़ता मूर्ख विचार । औ' कहता नीति विचार । सिखाना चाहुं ॥ ९२ ॥ जन्मांधका पागलपन । करता है जैसा थैमान । वैसा तेरा श्यानापन । दौडता चहूँ ओर ॥ ९३ ॥ अपनी बात न जानता । तो भी कौरवोंकी सोचता । देखकर विस्मय होता । मुझे अतिशय ॥ ९४ ॥ मुझे कह तू जरा अर्जुन । तुझपे है स्थित त्रिभुवन । अनादि यह विश्व-निर्माण । असत्य क्या ? ॥ ९५ ॥ सर्व समर्थ है यहां एक । उससे निर्माण होते लोक । कहना जगतका तू देख । व्यर्थ है क्या ? ॥ ९६ ॥ औ' ऐसा हुआ है क्या सांप्रत । जन्म मृत्यु तुझसे निर्मित । नाश होंगे ये तेरे ही हाथ । तेरे करनेसे ॥ ९७ ॥ भ्रमसे तू अहंकृति मानता । यदि इनका घात न करता । तो यह सैन्य क्या अमर होता । चिरजीवि-सा ॥ ९८ ॥ अथवा तू है एक घातक । तथा अन्य सभी हैं मृतक । चित्तमें ऐसा ही भ्रम एक । नहीं आने दे ॥ ९९ ॥ अनादि सिद्ध है यह पूर्ण । होना जाना स्वभाव कारण । सोचनेका तुझे क्या कारण । है इसमें ॥ १०० ॥ श्री भगवानने कहा करता तू वृथा शोक कहता ज्ञान भी फिर । ज्ञानी न करता शोक गतागत विचारका ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२
अज्ञानवश कुछ न जानता । जो सोचना वह नहीं सोचता । फिर भी बडी नीति है कहता । हमको ही ॥ १ ॥ होते हैं जो विवेकी । न सोचते दोनोंकी । आना जाना भ्रांतिकी । मानकर ॥२ ॥ न त्वेवाहं जातु नाऽऽसं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥ आत्म लक्ष्य— कहता हूं बात एक । यहां हम तुम देख । तथा भूपति अनेक । सारे जन ॥ ३ ॥ नित्य ऐसे ही रहेंगे । या निश्चित क्षय होंगे । यह भ्रांति छोड देंगे । दोनों व्यर्थ ॥ ४ ॥ यह जन्म तथा नाश । दीखता है भ्रमवश । तत्वतः है अविनाश । वह वस्तु ॥ ५ ॥ जैसे पवन जल हिलाता । उससे हिलोर जो उठता । उसको कहें क्या जनमता । कह तू पार्थ ॥ ६ ॥ वायुका वही स्फुरण गया । हिलोर भी वहां बैठगया । तब कहें क्या है मर गया । सोचकर देख ॥ ७ ॥ देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहांतरप्राप्तिः धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥ सुनो शरीर है एक । वयसे भेद अनेक । यह प्रत्यक्ष ही देख । प्रमाण तू ॥ ८ ॥ मैं तू तथैव ये राजे पहले थे सभी यहां । वैसे ही हम जो सारे होंगे भविष्यमें यहीं ॥ १२ ॥ देहीको देहमें आता बाल्य तारुण्य औ' जरा । वैसा ही है नया देह न डिगे धीर जो कभी ॥ १३ ॥ ४३ सांख्ययोग
होता है प्रथम कौमार्य । बदलता उसे तारुण्य । उससे नहीं होता लय । शरीरका ॥ ९ ॥ इस चैतन्यके भी ऐसे । बदलते शरीर वैसे । जो यह जानता है उसे । न मोह न दुःख ॥ १० ॥ मात्रास्पर्शास्तु कौंतेय शीतोष्ण सुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ न जाननेका है यह कारण । जो है इंद्रियोंका आधीनपन । यह खींचता है अंतःकरण । इससे है भ्रम ॥ ११ ॥ इंद्रियां विषय सेवन करतीं । जिससे हर्ष शोक हैं उपजातीं । तथा अंतरंगको रस है देतीं । संसर्गसे अपने ॥ १२ ॥ विषयोंमें नहीं रहती । सदैव एकसी ही स्थिति । कभी दुःखकी है दीखती । कभी सुखकी ॥ १३ ॥ देखो है यह शब्दकी व्याप्ति । कहते हैं निंदा तथा स्तुति । उपजाते हर्ष शोक अति । श्रवणद्वारसे ॥ १४ ॥ मृदु और कठिन । स्पर्शके हैं दो गुण । त्वचा दे संग कारण । हर्ष शोक ॥ १५ ॥ सुरूप और कुरूप । रूपके हैं ये स्वरूप । नेत्रोंसे देते अमाप । सुख औ' दुःख ॥ १६ ॥ सुगंध औ' दुर्गंध । ये हैं गंधके भेद । दें विषाद औ' मोद । घ्राणके संग ॥ १७ ॥ ऐसा ही द्विविध रस । उपजाता प्रीति त्रास । तभी यह अपभ्रंश । विषय संगका ॥ १८ ॥ होनेसे इंद्रियोंके आधीन । भोगना शीत तथा उष्ण । जो हैं सुख दुखके कारण । अपनेको ॥ १९ ॥ शीतोष्ण विषय-स्पर्श फेंकते सुख दुःखमें । यही तू झेल ले सारा आते जाते अनित्य ये ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४
विषयोंके बिना है नहीं । रम्य कछु मिलता नहीं । स्वभाव जैसा हुवा यही । इंद्रियोंका ॥ १२० ॥ ये विषय भी हैं कैसे । रोहिणीके जल जैसे । स्वप्नके गजराज से । आभास रूप ॥ २१ ॥ अनित्य इन्हे जानकर । इनका कर अनादर । कभी इनका नहीं कर । संग तू पार्थ ॥ २२ ॥ यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥ विषय ये जिन्हे नहीं जकड़ते । उन्हे सुख दुःख दोनों नहीं होते । तथा गर्भवास संग नहीं होते । उनको कभी ॥ २३ ॥ वे हैं नित्य रूप पार्थ । जानो है तुम सर्वथा । जो कभी इंद्रियार्थ । हुये नहीं ॥ २४ ॥ नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥ सन्तोंको ही आत्मदर्शनकी शक्यता— पार्थ अब कुछ एक । कहूंगा सुन तू नेक । जिससे तू परलोक । जानेगा सब ॥ २५ ॥ इस उपाधिमें गुप्त । चैतन्य है सर्वगत । वह तत्वज्ञ जो संत । स्वीकारते हैं ॥ २६ ॥ सलीलमें पय जैसे । एक हो रहे हैं वैसे । किंतु राज-हंस उसे । जाने भिन्न ॥ २७ ॥ इनकी न चले बात सम जो सुख दुःखमें । ऐसा ही धीर होता है मोक्ष लाभार्थ योग्य जो ॥ १५ ॥ असत्यको न अस्तित्व सत्यका नाश भी नहीं । जानते यह तत्वज्ञ दोनोंको इस भांतिसे ॥ १६ ॥ ४५ सांख्ययोग
अथवा है अग्नि मुखसे मल । जलाके करते स्वर्ण निर्मल । निकाल लेते उसीको केवल । बुद्धिमान ॥ २८ ॥ अथवा ज्ञान मथनीसे । दधि मथन करनेसे । दीखता नवनीत जैसे । अन्तमें जो ॥ २९ ॥ रहता भूसा नाज मिलकर । उसे देखनेसे फटककर । नाज रहता है स्व स्थानपर । भूसा उड़ जाता ॥ १३० ॥ सोचनेसे है छूट जाता । प्रपंच यह स्वभावता । रहता है तत्व तत्वता । ज्ञानियोंको ॥ ३१ ॥ जिससे अनित्यमें नहीं । आस्तिक्य बुद्धि होती कहीं । यह निष्कर्ष दोनोंमें ही । देखा है सदा ॥ ३२ ॥ अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति ॥१७॥ अंतर्यामीका घात नहीं होता- सरासर विचार कर । जान तू भ्रांति है असार । स्वभावसे ही जो है सार । नित्य जान ॥ ३३ ॥ लोकत्रयका है आकार । जिसका है यह विस्तार । वहां वर्ण नाम आकार । नहीं चिन्ह ॥ ३४ ॥ वह है सर्वदा सर्वगत । जन्म मरणके है अतीत । करनेसे भी उसका घात । कभी होता नहीं ॥ ॥ ३५ ॥ अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥ जिससे है भरा सारा जान तू वह अक्षय । नहीं हो सकता नाश उस अव्यय तत्वका ॥ १७ ॥ विनाशी देह हैं सारे सदा ही उसमें कहा । नित्य निःसीम है आत्मा इससे जूझ तू यहां ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६