ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयोंके बिना है नहीं । रम्य कछु मिलता नहीं । स्वभाव जैसा हुवा यही । इंद्रियोंका ॥ १२० ॥ ये विषय भी हैं कैसे । रोहिणीके जल जैसे । स्वप्नके गजराज से । आभास रूप ॥ २१ ॥ अनित्य इन्हे जानकर । इनका कर अनादर । कभी इनका नहीं कर । संग तू पार्थ ॥ २२ ॥ यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥ विषय ये जिन्हे नहीं जकड़ते । उन्हे सुख दुःख दोनों नहीं होते । तथा गर्भवास संग नहीं होते । उनको कभी ॥ २३ ॥ वे हैं नित्य रूप पार्थ । जानो है तुम सर्वथा । जो कभी इंद्रियार्थ । हुये नहीं ॥ २४ ॥ नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥ सन्तोंको ही आत्मदर्शनकी शक्यता— पार्थ अब कुछ एक । कहूंगा सुन तू नेक । जिससे तू परलोक । जानेगा सब ॥ २५ ॥ इस उपाधिमें गुप्त । चैतन्य है सर्वगत । वह तत्वज्ञ जो संत । स्वीकारते हैं ॥ २६ ॥ सलीलमें पय जैसे । एक हो रहे हैं वैसे । किंतु राज-हंस उसे । जाने भिन्न ॥ २७ ॥ इनकी न चले बात सम जो सुख दुःखमें । ऐसा ही धीर होता है मोक्ष लाभार्थ योग्य जो ॥ १५ ॥ असत्यको न अस्तित्व सत्यका नाश भी नहीं । जानते यह तत्वज्ञ दोनोंको इस भांतिसे ॥ १६ ॥ ४५ सांख्ययोग