ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोता है प्रथम कौमार्य । बदलता उसे तारुण्य । उससे नहीं होता लय । शरीरका ॥ ९ ॥ इस चैतन्यके भी ऐसे । बदलते शरीर वैसे । जो यह जानता है उसे । न मोह न दुःख ॥ १० ॥ मात्रास्पर्शास्तु कौंतेय शीतोष्ण सुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ न जाननेका है यह कारण । जो है इंद्रियोंका आधीनपन । यह खींचता है अंतःकरण । इससे है भ्रम ॥ ११ ॥ इंद्रियां विषय सेवन करतीं । जिससे हर्ष शोक हैं उपजातीं । तथा अंतरंगको रस है देतीं । संसर्गसे अपने ॥ १२ ॥ विषयोंमें नहीं रहती । सदैव एकसी ही स्थिति । कभी दुःखकी है दीखती । कभी सुखकी ॥ १३ ॥ देखो है यह शब्दकी व्याप्ति । कहते हैं निंदा तथा स्तुति । उपजाते हर्ष शोक अति । श्रवणद्वारसे ॥ १४ ॥ मृदु और कठिन । स्पर्शके हैं दो गुण । त्वचा दे संग कारण । हर्ष शोक ॥ १५ ॥ सुरूप और कुरूप । रूपके हैं ये स्वरूप । नेत्रोंसे देते अमाप । सुख औ' दुःख ॥ १६ ॥ सुगंध औ' दुर्गंध । ये हैं गंधके भेद । दें विषाद औ' मोद । घ्राणके संग ॥ १७ ॥ ऐसा ही द्विविध रस । उपजाता प्रीति त्रास । तभी यह अपभ्रंश । विषय संगका ॥ १८ ॥ होनेसे इंद्रियोंके आधीन । भोगना शीत तथा उष्ण । जो हैं सुख दुखके कारण । अपनेको ॥ १९ ॥ शीतोष्ण विषय-स्पर्श फेंकते सुख दुःखमें । यही तू झेल ले सारा आते जाते अनित्य ये ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४