ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राप्त प्रकाशको छोड़ना । अंधकूपमें फिर जाना । उससे है क्या लाभ होना । कहो देव ॥ ३९ ॥ आगको सम्मुख देख कर । गये न उसको लाघकर । क्षणमें वह लपटेकर । जला देगा ॥ ४० ॥ वैसे दोष असाधारण । घेरते हैं हमको पूर्ण । जानकर भी आचरण । करना कैसे ॥ ४१ ॥ पूछ कर इतना बोले पार्थ । सुनो देव इसका मतितार्थ । कहूंगा इस पापका अनर्थ । अब तुझसे ही ॥ ४२ ॥ कुलक्षये प्रणश्यंति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥ जेसे लकडीका घर्षण । उपजाता अग्नि महान । उससे जल जाता इंधन । प्रज्वल होके ॥ ४३ ॥ कुलमें वैसे परस्पर । वध किया तो स-मत्सर । उससे महादोष घोर । कुलघातका होगा ॥ ४४ ॥ अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः । स्त्रीषुदुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४१ ॥ इससे है ऐसा पाप । करें कुल-धर्म लोप । बढ़ता अधर्म व्याप । कुलमें ही ॥ ४५ ॥ इससे सारासार विचार । किसके कैसे क्या है आचार । मिट जाते हैं मूल आधार । विधि-निषेधके ॥ ४६ ॥ कुलके क्षयसे नाश कुल-धर्म सनातन । अधर्म फैलता सारा कुलके धर्म-नाशसे ॥ ४० ॥ अधर्म फैल जानेसे भ्रष्ट होती कुल-स्त्रियां । स्त्रियोंके भ्रष्ट होनेसे होता है वर्ण-संकर ॥ ४१ ॥ २७ अर्जुनविषादयोग