भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जैसे वस्तु अनेक मिलते । वैसे पारस नहीं मिलते । अमृत-बिंदु हैं मिलते । दैव योगसे ॥ २४० ॥ वैसी दुर्लभ है सद्बुध्दि । जिसे परमात्म ही अवधि । जैसे भागीरथीको उदधि । निरंतर ॥ ४१ ॥ नहीं जिसे ईश्वरके बिन । कोई अन्य है अवलंबन । वही एक सद्बुध्दि है जान । इस जगतमें ॥ ४२ ॥ अन्य जो है सब दुर्मति । पाती है अनेक विकृति । वहां निरंतर सुमति । रमते हैं ॥ ४३ ॥ वेदवादविदोंके वाग्जालमें नहीं आओ— इसीलिये सुन उन्हे पार्थ । स्वर्ग संसार नर्ककी वार्ता । न कभी आत्म-सुख सर्वथा । मिलता देखने भी ॥ ४४ ॥ यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥ वेदके आधारसे हैं बोलते । केवल कर्म-प्रतिष्ठा करते । किंतु आसक्ति हैं नित धरते । कर्म फलोंमें ॥ ४५ ॥ संसारमें जनम लेकर । यज्ञ यागादि कर्मको कर । भोगो स्वर्ग सुख मनोहर । कहते ऐसे ॥ ४६ ॥ यहां बिन इसके नहीं । अन्य सुख सर्वथा कहीं । अजी ! ऐसे बोलते यही । दुर्बुद्ध लोग ॥ ४७ ॥ कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥ देखो कामनासे अभिभूत । होकरके कर्म-आचरित । केवल वे भोगमें दे चित्त । अपना सारा ॥ ४८ ॥ अनाडी व्यर्थकी बात कहते हैं फुलाकर । वेदके करते वाद कहते अन्य ना कछु ॥ ४२ ॥ जन्म लेके करो कर्म पावोगे भोग वैभव । लो कर्म फल स्वादिष्ट कहते स्वर्ग कामुक । ४३ ॥ ५९ सांख्ययोग