ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो है बुद्धि युक्त । सुनो वह पार्थ । कर्म-बंध मुक्त । रहता सदा ॥ ३१ ॥ वज्र कवच पहननेसे । शस्त्रोंकी वर्षांमें भी है जैसे । शरीर रहता है उससे । अचुंबित ॥ ३२ ॥ नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥ ईश्वरार्पित बुद्धिसे अनासक्त कर्म — मिटता नहीं जिससे लौकिक । सहज मिलता पारलौकिक । चल आया पूर्वानुक्रम देख । शुद्ध रूपसे ॥ ३३ ॥ कर्माधारसे बरतना । कर्म फलको न देखना । मंत्रज्ञको मुक्त रहना । भूत बाधासे ॥ ३४ ॥ उस पर जो सुबुद्धि । अपनेको निरवधि । मिलने पर उपाधि । नहीं लगती ॥ ३५ ॥ न जा वहां पुण्य-पाप । जो है अति सूक्ष्म निष्कंप । औ' गुणत्रयादिका लेप । चढता नहीं ॥ ३६ ॥ अर्जुन ऐसा यदि पुण्यवश । हुआ हृदयमें बुद्धि प्रकाश । होगा उससे ही अशेष नाश । संसारका भय ॥ ३७ ॥ व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥ जैसे छोटीसी दीप-ज्योति । तेजसे प्रकाशती अति । वैसे न मानता सुमति । अल्पसी कभी ॥ ३८ ॥ सुन तू पार्थ अनेक प्रकार । चाहते हैं बुद्धि विचार शूर । किंतु है दुर्लभ सचराचर । सद्वासना ॥ ३९ ॥ चूकता जो न आरंभ न बने विपरीत भी । अल्प भी यह धर्मांश तारता भयसे महा ॥ ४० ॥ बुद्धि एकाग्र होती है इसमें दृढ होकर । अनंत बहु शाखाकी बुद्धि निश्चय हीनकी ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८ (8)