ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वधर्मका है आचरण । करता दोष निवारण । चित्तभ्रम किस कारण । जो है पाप ॥ २२ ॥ डूबेगा क्या कोई नांवसे । अड़े क्या कोई पथसे । सही न चलने आनेसे । होगा ये सब ॥ २३ ॥ अमृत-पान भी मारेगा । विष-सह यदि पीयेगा । स्वधर्म भी दोष लायेगा । सहेतुक जो ॥ २४ ॥ इसीलिये तुझको पार्थ । निरहेतुक हो सर्वथा । लडनेमें क्षात्र-धर्मार्थ । नहीं पाप ॥ २५ ॥ सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥ सम-बुद्धिसे लड — संतोष न मानना सुखमें । विषाद न मानना दुखमें । तथा लाभालाभ भी मनमें । नहीं धरना ॥ २६ ॥ यहां जो विषय भी होगा । या सर्वथा तन जायेगा । न सोचना आगे क्या होगा । पहलेसे ही ॥ २७ ॥ उचित जो अपना । स्वधर्म सो करना । प्राप्तव्यको भोगना । शांत भावसे ॥ २८ ॥ ऐसे होनेसे तू सम चित्त । होगा सहज ही पाप-मुक्त । इसलिये हो तू युद्ध रत । निश्चिंत भावसे ॥ २९ ॥ एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोंगे त्विमां शृणु । बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥ बुद्धियोगका वज्र कवच — सांख्य स्थिति यह संक्षिप्त । किया तुझको निरूपित । तभी होकरके निभ्रांत । लडना अब ॥ २३० ॥ हानि लाभ सुख दुःख सम हो हार जीतमें । फिर युद्धार्थ हो सिद्ध न होगा पाप लिप्त तू ॥ ३८ ॥ सांख्य बुद्धि यही जान सुन तू योग बुद्धि भी । तोडेगा उससे सारे जगमें कर्म बंधन ॥ ३९ ॥ (४) ५७ सांख्ययोग