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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1081

परा संवित् छत्तीसके परेका तत्त्व है जैसे उपनिषदका ब्रह्म है । जगत्—सदैव बदलते रहनेवाला जन्म-मरणसे अथवा आवागमनमें बद्ध सभी पदार्थ जगत शब्दके अंतर्गत आते हैं । इस जगतके विषयमें अनेक दार्शनिकोंने अनेक बातें कही हैं । ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें इस जगतकी उत्पत्तिकी जो कथा कही है वह विश्व-साहित्यमें इस विषय का सर्व प्रथम विचार है । उसमें लिखा है "जब कुछ भी नहीं था तब "वह" था । उसके मनमें जो काम निर्माण हुवा उससे इसकी उत्पत्ति हुई !" दूसरे एक सूक्तमें है । "उसके तपसे ऋत सत्य निर्माण हुवा । उसके बाद रात-महारात्र-निर्माण हुई । उसके बाद लहरनेवाला समुद्र निर्माण हुवा । उसके बाद सूर्य, चंद्र, अहोरात्र, और प्राणि निर्माण हुए ।" इन्ही विचारोंको अलग अलग ढंगसे उपनिषदोंमें लिया है । उसके बादके दार्शनिकोंने (१) सांख्योंके अनुसार "प्रकृति-पुरुषके संयोगसे इस जगतकी उत्पत्ति हुई !" (२) चार्वाकके अनुसार "पंचमहाभूतोंके आकस्मिक संयोगसे इसकी उत्पत्ति हुई (३) न्यायदर्शनके अनुसार "परमाणुकी सहायतासे ईश्वर इस जगतकी रचना करता है !" (४) वैशेषिक "परमाणुसंयोगसे जगदुत्पत्ति" मानते हैं । (५) मीमांसा दर्शन "जगतको अनादि अनंत" मानकर प्राणियोंको जन्म मरणके आधीन मानता है । (६) वेदांती "ईश्वर ही अपनेमेंसे आप इसे निर्माण करता है!" ऐसे कहते हैं। (७) जैन, मीमांकों की भांति इसे "अनाद्यनंत" मानते हैं । इसी भांति अन्य सभी धर्मोंमें जगतकी उत्पत्तिके विचार तथा कथा, मिलती हैं । जंगली परंपरागत लोगोंने भी अपने ढंगसे इसका विचार किया है और अपने विचारोंको कहानीके रूपमें कहते आये हैं । पुराणोंमें भी इसकी विविध कहानियां हैं । जप—जीभ, होठ आदिकी हलचल करनेके पहले चिंतनद्वारा किसी शब्दको पुनः पुनः उच्चार करना - हृदयमें-जप कहलाता है । जप एक अनुष्ठान है । जपका हिसाब रखना आवश्यक है । यह संकल्पपूर्वक किया जानेवाला अनुष्ठान है । जपके तीन प्रकार हैं । (१) वाचिक - मंत्रका स्पष्ट - सुनाई दें ऐसा - उच्चार करके जप करना । (२) उपांशु - मंत्र देवता पर ध्यान केंद्रित करके गुनगुनाकर मंत्रोच्चार करना (३) मान - मंत्रार्थमें ध्यान केंद्रित करके केवल हृदयमें उसका उच्चार करना । अलग अलग प्रकारके जपानुष्ठानके अलग अलग नियम हैं । इसका न्यास, ध्यान, तर्पण, यज्ञादि भी होते हैं । किंतु नामस्मरणका विधिविधान नहीं होता । वह सतत चिंतन करना होता है । जालंधरबंध—योगमें बंधोंका महत्त्वपूर्ण स्थान है । विशेषतया प्राणायामके समय जो तीन बंध कहे हैं-मूलबंध जालंधरबंध और उडियान बंध-इनका अत्यंत महत्त्व है । बिना इन तीन बंधोंके प्राणायाम पूर्ण नहीं होता अथवा प्राणायामका पूर्ण फल नहीं मिल सकता । ज्ञानेश्वरीके छठे अध्यायके दो सौ सातके छंदमें इसकी क्रियाका विवेचन किया है । प्राणायामके समय मूलबंध युक्त पूरक करनेके बाद कुंभक करते समय अपनी ढुड्डी गले-सीनेके ऊपर गलेके नीचे वाले गद्देमें-चिपकाकर रखना । सर्वांगासन तथा हलासनमें भी १५५ परिशिष्ट ५