भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यह बंध होता है । इससे मस्तिष्कके अनेक ज्ञानतंतुजाल पर तनाव आता है। इससे अपने शरीरमें होनेवाले चयापचयपर नियंत्रण होने लगता है। शरीर पोषण क्रिया पर भी अपना स्वामित्व आता है। जालंधर बंधसे नीलकंठमणी तथा उपनीलकंठमणि पर तनाव आनेसे उस ओर शुद्ध रक्त दौड़ता है। इससे, गलेकी वह ग्रंथी दीर्घकालतक लचीली रह सकती है। यही ग्रंथी है जो तारुण्यको चिरकाल रख सकती है। इससे, पीछे मेरुदंडमें भी तनाव आता है। शरीरशुद्धि, मनपर प्रभुत्व, तथा चिर तारुण्यकी दृष्टिसे इस बंधका महत्त्व कहा गया है। जितेंद्रिय—जिन्होंने इंद्रियोंको जीत लिया है वह। भारतीय तत्त्व-ज्ञानके अनुसार इंद्रियां घोड़ेकी भांति हैं। मन उसका लगाम है। बुद्धिके हाथमें वह लगाम होता है। सामान्यतया जानवर जैसे अपने चारेके पीछे दौड़ता है वैसे इंद्रियां अपने अपने विषयके पीछे दौड़ती हैं। अडियल घोडा जैसे गाडी लेकर अपने मनमाने चलता है वैसे । किंतु बुद्धिमान मनुष्य, मनको बुद्धिके आधीन रखता है, इंद्रियां मनसे कसी हुई रहती हैं। बुद्धिके आधीन बुद्धिकी, आज्ञामें, मनके द्वारा जो इंद्रियोंको अपने आधीन रखता है उसको जितेंद्रिय कहते हैं। जीव—विशिष्ट मर्यादाके अंदर रहनेवाला विश्व चैतन्यका अंश । मानवी अंतःकरणमें पडा हुवा परमात्माका प्रतिबिंब ! जीव विश्व चैतन्यका ही एक अंश है किंतु विशिष्ट मर्यादांमें शरीर संयुक्त रहनेसे, अंतःकरणसे अविभक्त रहनेसे अपनेको पृथक् मानता है। यही उसकी अज्ञान दशा है । इसीके कारण शरीरमें चेतना रहती है। यह मानवमें परमात्माकी विभूति है। गीतामें इसीको क्षेत्रज्ञ कहा है। वस्तुतः यह सर्वव्यापी है। स्थिर है, अचल है, सनातन है किंतु अंतःकरणसे अविच्छिन्न रहनेसे अपना स्वभावज्ञान भूलता है। जब इसे यह स्वभावज्ञान होता है तब मुक्तावस्थामें रहता है। तत्त्व—अलग अलग दर्शनोंमें तत्त्वोंकी संख्या अलग अलग है। तत्त्वका वस्तु, वस्तु- स्थिति, यथार्थ स्वरूप, मूलघटक, ब्रह्म, मन, शरीर, देवता आदि शब्दोंके अर्थमें यह शब्द आता है। वेदांतमें "केवल ब्रह्म ही एकमेव तत्त्व है।" आद्य शंकराचार्य तत्त्व शब्दका अर्थ करते समय कहते है । तत् यह सर्वनाम है। सर्वनामका विश्वके प्रत्येक वस्तुको लग सकनेवाला नाम ! ब्रह्म व्यापक होनेसे सबमें व्याप्त है। इस लिए उसे-ब्रह्मको-तत् कहते हैं। उस तत् को त्वं प्रत्यय आकर तत्त्व अर्थात् "ब्रह्म-स्वरूप" ऐसा शब्द बना है। शून्य वादी बौद्ध शून्य ही एकमेव तत्त्व मानते है। ज्ञानेश्वरीमें तत्त्वका अर्थ आत्म तत्त्व है। परब्रह्म है ! तत्त्वज्ञान—मानवी जीवन, उसके साथ ही साथ विश्व, तथा मानवी जीवनके साथ विश्वके संबंधोंका अर्थ करके, प्रत्येक मानवी अनुभवका कार्यकारण संबंध बताते हुए, अर्थ करनेवाली मूलभूत कल्पनाओंकी तर्क-बद्धताकी सुसूत्र व्यवस्था करके दिखाना तत्त्वज्ञानका कार्य है। विकसित मनुष्य=मानवी समाजद्वारा-निर्माण की गयी उसकी संस्कृति तथा सभ्यताका, दूसरे शब्दोंमें कहना हो तो, उसकी सामाजिक संस्थाओंका, अथवा नीति नियम और जीवन परंपराओंका सार तत्त्वज्ञानमें समाया हुवा रहता है। किसी समाजके तत्त्वज्ञानमें जब कोई अदल होता ज्ञानेश्वरी १३६