ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1083, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै तब उस समाजका जीवन-मूल्य ही बदल जाता है। किसी भी व्यक्ति, संस्था, समाज अथवा राष्ट्रके पास जब अपना ऐसा कोई तत्त्वज्ञान होता है तब वह व्यक्ति अथवा समाज या राष्ट्र अपने कानून, नियम, संस्थाएँ साहित्य, कला आदिके लिये स्वप्रकाशित प्रेरणाका स्रोत पा सकता है। अपनी जीवन पद्धतिका विकास कर सकता है और जीवनमें पग पग पर जानेवाली समस्याओंसे निपटनेके लिये किये जानेवाले व्यक्तिगत और सामूहिक पराक्रमको उस तत्त्वज्ञानकी कसौटी पर कस कर देख सकता है, जान सकता है कि इसका मूल्य क्या है ! तत्त्वज्ञान मानवी जीवनके विकासके लिये आवश्यक वह "आंतरिक कवच है" जो सभी प्रकारके बाह्य आक्रमणोंसे संरक्षण प्रदान करके उसे अंतिम समय तक जुझुत्सु बना रखता है। वैदिक संस्कृतिके वातावरणमें भारतीय तत्त्वज्ञानका जन्म हुआ । उपनिषद् भारतीय तत्त्वज्ञानकी प्रौढ़ावस्था है। उपनिषदकालके अनेक गंभीर और महान सिद्धांतोंके बीज वेद मंत्रोंमें मिलते हैं। उपनिषदोंमें जीवन-विकासके लिये आवश्यक तत्त्वज्ञान कहते हुए उसीके आधारभूत अथवा अंगभूत नीतिशास्त्र आदि कहा गया है। उपनिषदोंमें मनुष्यके प्रत्येक सूक्ष्मातिसूक्ष्म अनुभवोंको अत्यंत महत्त्व पूर्ण स्थान दिया गया है। उपनिषदोंमें श्रद्धाके लिए अत्यंत महत्त्वका स्थान है यद्यपि तर्कका विरोध नहीं है। उपनिषदमें विचारोंकी ऊंचाई दिखानेवाली कई उछालें हैं। उसमें "तत्त्वमसि" एक ऊंची उडान है। विश्व-विचारके क्षेत्रमें यह एक ऊंची सी ऊंची उडान है। वैसे ही "पूर्ण है वह, पूर्ण है यह पूर्णसे निष्पन्न होता पूर्ण...! भी एक ऊंची उडान है। जिसके आधारपर जीवनके अनेक सिद्धांत बिठाये गये हैं। भारतीय तत्त्वज्ञान=अपनेकों ब्रह्मका रूप मान कर-विश्वका केंद्रबिंदु बन कर सोचनेको सिखाता है। यह विचारके साथ अनुभवके क्षेत्रमें भी एक उडान है। यही वेदांतकी आत्मा है। गीता उपनिषदोंका निचोड है और ज्ञानेश्वरी गीताका विशदीकरण । ज्ञानेश्वरीमें सारे विश्वको आत्माका स्फुरण मान कर विश्व और विश्वात्माका समरसैक्य दर्शाया है। साथ ही इसको अनुभव करनेका तरीका भी, जो अत्यंत महत्त्वका है। तप—शांत भावसे द्वंद्वोंको सहन करना तप है ! तपकर तपाना तप है । तपसे पाप-क्षालन होता है। जैसे सोना तपनेके पहले शुद्ध नहीं होता वैसे बिना तपके जीवन निर्मल नहीं होता। बिना तपके कोई "महान् निर्माण" नहीं होता । तप जीवनका सार है। तपसे जीवन खिलता है। तप प्रत्येक वर्ण और आश्रमका आधार है। धर्म सूत्रोंने पाप-क्षालनके लिये तपकी आवश्यकता कही है तो उपनिषदोंने ब्रह्म-प्राप्तिके लिये तपकी आवश्यकता कही है। अथर्ववेदमें कहा है "जिस मनुष्यके साथ तपका जितना अधिक संचय है उतना वह अधिक महान होता है।" उपनिषदोंमें "तपसे ब्रह्मका ज्ञान होता है क्यों कि तप ही ब्रह्म है।" ऐसे तपकी महत्ता कही है। गीतामें "श्रद्धापूर्वक तथा फलकी अपेक्षा किये बिना किया जानेवाले तपको सात्विक तप कहा है! भारतीय जीवन परंपरामें तपका अत्यंत महत्त्व है। भारतीय साहित्यमें तपकी महत्ता करनेवाले अनेक वचन हैं। ब्राह्मण ग्रंथ कहते हैं "तप अग्नि है।" "तप दीक्षा है!" "तपसे लोक विजय होता है। इस लिये तपाचरण कर!" मनुस्मृतिमें कहा गया है "जो कुछ दुष्प्राप्य है, दुर्गम है, वह सब तपसे मिलता है। कोई भी तपका अतिक्रमण नहीं कर सकता !" (10) १३७ परिशिष्ट ५