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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1084

तप भारतीय संस्कृतीकी आधार शिल्प है। तपसे चिंतन और जीवन शक्तिमान है। सरस होता है। उज्ज्वल होता है ! तपसे ज्ञान प्राप्ति तथा ज्ञान-वृद्धि होती है। भागवतमें लिखा है “ तपसे ब्रह्मदेवको सृष्टि निर्माण करनेकी शक्ति मिली ।” तपके अनेक प्रकार कहे गये हैं। किंतु तपका अर्थ देहदंडन नहीं। निसर्गदत्त शक्तियोंका हनन नहीं। किंतु उसको सुस्थित रखना, समभागसे रखना। उद्विग्न न होने देना। महान उद्देश्यसे, निष्काम भावसे शांत होकर द्वंद्वोंका अतिक्रमण करते हुए तन मन वचनसे ध्येय-निष्ठ रहना ही तप है। ऐसा तप ही ऋत है, ऐसा तप ही सत्य है, ऐसा तप ही जीवनसर्वस्व है। इससे ब्रह्म-महानता प्राप्त होती है। तापत्रय—तापका अर्थ है दुःख। क्लेश, कष्ट। यह तीन प्रकारके होते हैं। बाह्य सृष्टिके आघातसे, शीतोष्णादि संयोगसे जो दुःख भोगने होते हैं वे आधिभौतिक दुःख हैं। जैसे रोग, वृद्धावस्थाके दुःख आदि,। देवताके क्रोधसे, अथवा निसर्गकी अवकृपासे जो दुःख भुगतने होते हैं वह आधिदैविक हैं। जैसे अतिवृष्टि अनावृष्टि, आग लगकर, चोरी डाकेसे दुःख भुगतने पड़ते हैं वे और मरणोत्तर पापपुण्यादि भुगतना, आंतरिक ताप अनुताप, वियोगादि सहना आध्यात्मिक दुःख है। इन तीनों प्रकारके दुःखोंको मिलकर तापत्रय कहा जाता है। त्रिग्रंथि अथवा तीन गांठें—हठयोगमें छ चक्रोंके साथ उनकी ग्रंथियोंका उल्लेख है। लिंगमूलमें जो मूलाधारचक्र है— लिंगमध्यमें भी कहा गया है— उसके पास जो ग्रंथि है उसको ब्रह्मग्रंथि कहा गया है। इस चक्रकी देवता ब्रह्मा है। यह पृथ्वीतत्त्वका चक्र है। यह अधोमुख होता है। कुंडलिनी शक्ति निद्रावस्थामें यहीं पड़ी रहती है। दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान। इसकी शक्ति है डाकिनी। देवता-ग्रंथि विष्णु। यह विष्णुगांठ कहलाती है। यह जलतत्त्वका चक्र है। इसे कामभूमि भी कहा गया है। सामान्य जीवका मन यहां जीवात्म-रूपसे अधिष्ठित होता है। इसलिये इसे स्वाधिष्ठान चक्र कहा गया है। इस चक्रके छ दल षड् विकारोंके द्योतक माने गये हैं।— षड् विकार—( १) काम (२) क्रोध (३) लोभ (४) मोह (५) मद (६) मत्सर। नाभिस्थानमें जो मणिपूरनामका चक्र है उसकी अधिष्ठान देवता अथवा गांठको रुद्रग्रंथि कहा जाता है। यह तेजस् तत्त्वकी गांठ है। इसकी शक्ति लाकिनी कहलाती है। इस चक्रके दस दल होते हैं। इन तीन चक्रोंकी ग्रंथियोंको त्रिग्रंथि अथवा तीन गांठें कहा गया है। इन तीन ग्रंथियोंको तीन तृष्णाएँ पुत्रेषणा, वित्तेषणा, लोकेषणाका आधार माना जाता है। संन्यास लेते समय इन तीन तृष्णाओंका त्याग करना पड़ता है। इन तीन तृष्णाओंको बंध माना गया है। इन तीन तृष्णाओंसे मुक्तिको ग्रंथिभेद माना गया है। ब्रह्मग्रंथिके भेदनसे कामादि दुष्प्रवृत्तियों पर विजय मिलती है। विष्णुग्रंथिके भेदसे वैष्णवी माया भोग ऐश्वर्य वैभवादिकी अपेक्षापर विजय पायी जाती है। रुद्रग्रंथिके भेदसे प्रतिष्ठादि पर विजय पायी जाती है। हठयोगमें इन तीन ग्रंथियोंके भेदका अत्यंत महत्त्व कहा गया है। पूर्णत्वकी प्राप्तिके लिये इन चक्रोंका भेद होना आवश्यक है। यह हठयोग परंपरा है। इसके साथ ही साथ ज्ञानेश्वरीके कुछ विद्वान तीन गांठे इसका अर्थ करते समय सत्व, रज, तम इन तीन गुणोंके बंधन ऐसा भी कहते हैं। ज्ञानेश्वरी · १६८