भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1085, कुल 1172 में से

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त्रिपुटी—जिसमेंसे एकको अलग करनेसे दूसरे जो दो हैं उसका मिलना असंभव है ऐसे एक दूसरेसे संबंधित - अन्योन्याश्रयी - तीन वस्तुओंको त्रिपुटि कहा गया है । जैसे :- कर्ता कर्म क्रिया । ज्ञेय ज्ञाता ज्ञान । ध्येय ध्याता ध्यान । दृश्य, द्रष्टा दर्शन । भोग्य, भोक्ता भोग । ब्रह्म माया जीव । परमात्मा आत्मा जगत् । इन तीनोंका विलय ही सच्चिदानंदस्वरूपप्राप्ति है । त्रिबंध अथवा तीन बंध—हठयोगमें अनेक प्रकारकी मुद्राएँ तथा बंध कहे गये हैं । इनमें मूलबंध, जालंधरबंध तथा उड्डियानबंध ऐसे तीन बंध कहे गये हैं। इन तीनों बंधके विषयमें उन नामोंसे अलग कहा गया है। किंतु कहीं कहीं यह शब्द आया है इसलिये इस शब्दकी व्याख्या की गयी है। इन तीन बंधोसे युक्त जो प्राणायाम किया जाता है उसको त्रिबंध साधना कहा जाता है। तीर्थ-स्थान—पवित्र-स्थान, जल-स्थान, ऋषियोंका आश्रय-स्थान, जल तथा गुरु सेवन स्थळ ऐसा तीर्थ शब्दका अर्थ है। साथ साथ जिसके कारणसे सब पापसे तर जाते हैं उसको तीर्थ कहा गया है। अलग अलग पुराणोंमें तीर्थ शब्दका अलग अलग अर्थ दिया है। स्कंदपुराणमें "जहां श्रेष्ठ ऋषि मुनियोंने आश्रय लिया, जो देवोंका निवास-स्थान है उसको तीर्थ कहते हैं।" कहा गया तो ऋग्वेदमें सरस्वती, शरयू, गंगा, सिंधु, आदि २० नदियोंके स्थानको तीर्थ कहा गया है। सरस्वतीको श्रेष्ठ वाणी तथा विचार देनेवाली कहा गया है। सभी नदियां, उनके उगमस्थान, संगमस्थान, बडे बडे तालाब, ऋषियोंके आश्रमस्थान, पर्वत-शिखर, आदि स्फूर्तिप्रद स्थानोंको तीर्थ-स्थान कहा गया है। हिमालयके सभी स्थानोंको तीर्थ-स्थान माना गया है। पद्मपुराणमें युगभेदसे तीर्थ स्थानोंका महत्व कहा गया है। कृतयुगमें पुष्कर तीर्थ, त्रेतामें नैमिषारण्य, द्वापारमें कुरु-क्षेत्र तो कलियुगके लिये गंगा तीर्थ कहा गया है। फिर अलग अलग संप्रदायके लोग अलग अलग स्थानोंको तीर्थ-स्थान मानते है। पुराणोंमें तीर्थके अनेक प्रकार कहे गये है। जैसे- (१) धर्मतीर्थ-जहां धर्मपालनमें प्रेरणा मिलती है। (२) अर्थतीर्थ=नदीके किनारे और संगमस्थान पर व्यापारादि बडे पैमाने पर चलता है (३) कामतीर्थ-जहां विविधप्रकारकी कलाओंकी उपासना होती है। (४) मोक्षतीर्थ-विद्या, ज्ञान, तप आदि जहां सिखाया जाता है। जहां अध्यात्म केंद्र है ऐसा स्थान । जहां इन सबका समन्वय हुवा है उसको महापुरी कहा गया है। जैसे काशी, प्रयाग, मथुरा, उज्जयिनी, कांची आदि । तुरीयावस्था या तुर्यावस्था—तुरीय, वेदांतकी एक संज्ञा है। अज्ञान और उससे आवृत्त ढकागया चैतन्यके आधारभूत अनावृत, न ढका हुवा शुद्धचैतन्यका नाम तुरीय है। व्यष्टीकी जागृति स्वप्न तथा सुषुप्ति - निद्रावस्था - अवस्थामें आत्माको विश्व, तैजस् तथा प्राज्ञ ऐसी संज्ञा है। तथा विशाल विश्वकी दृष्टिसे वही विराट या वैश्वानर, हिरण्यगर्भ अथवा प्राण, तथा ईश्वर ऐसी संज्ञा है। आत्माकी इन तीनों अवस्थाओंसि भिन्न तथा इन तीनोंके मूलमें जो शुद्ध आत्मतत्त्व है उसे तुरीय कहा गया है। जैसे कि नींद लगनेसे प्रथम सोते अथवा नींदमेंसे जगते समय एक क्षण भर ऐसा रहता है कि तब अहंकार आदि विकारोंका भान नहीं रहता। वैसे ही ज्ञाता और ज्ञेयका लय हुवा रहता है। केवल - शुद्ध - ज्ञानरूप इस अवस्थाको तुरीयावस्था ३३९ परिशिष्ट ५

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