ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहते हैं। इस अवस्था में प्रपंचका उपशम हुवा रहता है। सतत इस स्थितिमें रहना तुरीयावस्थामें रहना अथवा सहजावस्थामें रहना है ! इसको उन्मनी अवस्था भी कहते हैं। दक्षिणायन — जिस समय सूर्यका उदयास्त दक्षिणकी ओर सरकता है ऐसा समय । सामान्यतया कर्कसंक्रांतिके बाद मकरसंक्रांति तकका काल दक्षिणायन माना जाता है। (कर्क संक्रांति आषाढमें आती है और मकर संक्रांति पूसमें) इस कालको पितृयान भी कहते हैं। पितृयानका अर्थ पितरोंको पितृलोकतक ले जानेवाले मार्ग। पितृयानका मार्ग स्वर्गतक होने पर भी मोक्ष तक नहीं माना जाता। योगी लोग देहपातके लिये उत्तरायणका काल पसंद करते हैं। दशोपनिषद् — उपनिषद्का अर्थ पास बैठना। संस्कृतमें ऐसा ही और एक शब्द है उपासना। इसका अर्थ भी पास बैठना है। किंतु उपनिषदमें गुरुके पास बैठना है तो उपासनामें देवताके पास बैठना है। गुरुके पास बैठकर गुरुकी भांति हो जाना उपनिषद् है तो देवताके पास बैठ कर देवताकी भांति हो जाना उपासना है। उपनिषद् गुरु-शिष्योंका हार्दिक संवाद है। यह अत्यंत प्राचीन कालसे चला आया है। उपनिषदोंकी संख्या अनंत होगी। किंतु जो संवाद लिपिबद्ध हो कर आज उपलब्ध हो सकते हैं उनकी संख्या २०० के करीब है। इसमें कुछ अति प्राचीन है। कुछ प्राचीन है। कुछ अर्वाचीन है। संभवतः ई. पू. १८००-२००० से ई. सं. १२०० तक इन उपनिषदोंका काल रहा होगा। इन सब उपनिषदोंमें १४ उपनिषद् महत्त्वके प्राचीन माने जाते हैं। इनमें भी १० अत्यंत महत्त्वके हैं। इसलिये ज्ञानेश्वरने उनको "सकल मति प्रकाश श्रीगणेश" का मुकुटप्राय माना है। वे १० उपनिषद् हैं- (१) ईश (२) केन (३) कठ (४) प्रश्न (५) मुंडक (६) मांडूक्य (७) तैत्तिरीय (८) ऐतरेय (९) छांदोग्य (१०) बृहदारण्यक. इन उपनिषदोंमें ब्रह्म, सृष्टिरचनाक्रम, ब्रह्मप्राप्ति, तथा ब्रह्मप्राप्तिकी साधनाकी विस्तृत चर्चा है। दान — दान वैदिक अर्थशास्त्रका महत्त्वपूर्ण अंग है। वैदिक अर्थशास्त्र केवल धनसंग्रहका अर्थशास्त्र नहीं है किंतु धन कैसा संग्रह करना चाहिए और उसका व्यय कैसा करना चाहिए यह भी कहता है। दान और यज्ञ संपत्तिकी सम-विभाजन व्यवस्था है। दान शब्दकी कई परिभाषाएँ हैं किंतु सबमें "न्यायसे कमाये हुए धनका" विशेषण है। "न्यायसे कमाये हुए धन धान्य पशु आदिका गरजू लोगोंके लिये देना दान है।" दान देनेके लिये दो शर्ते हैं। (१) न्यायसे कमाया हुवा धन (२) दान सत्पात्रको और श्रद्धासे दें। दान चार प्रकारके होते हैं। (१) नित्य (२) नैमित्तिक (३) काम्य (४) विमल। (१) बिना किसी फलाशासे, नित्य नियमित रूपसे, सत्पात्रमें अपनी योग्यताके अनुसार कुछ न कुछ देते रहना। (२) पाप नाश अथवा पुण्य प्राप्तिके उद्देशसे ग्रहण, अमावास्या, तीर्थयात्रामें, आदि विशिष्ट स्थल और कालमें उद्देशपूर्वक दिया गया दान। (३) संततिकी आशासे, संपत्तिकी आशासे, विजय अथवा यश आदिकी आशासे - समारोहपूर्वक दिया जानेवाला दान काम्यदान है। (४) विमल यह सर्वश्रेष्ठ दान है। बिना ज्ञानेश्वरी ११०.