ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1087, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिसी फलाशासे, निष्काम भावसे, ईश्वरार्पण भावसे, सत्पात्र तथा सत्कार्यके लिये दिया गया दान विमल दान है । साथ साथ जब कभी समाज पर विपत्ति आती है, जैसे शत्रुका आक्रमण होता है, अकाल पड़ता है, कोयी रोगादि फैलते हैं ऐसी विपत्तिमें विपत्तिनिवारणार्थ - समाजकी विपत्ति निवारणार्थ अपनेको चाम्य, चांदी, सोना आदिसे तुलवाकर अपने सम - भार दिया जानेवाला तुलादान । यह विपत्तिसे मारे समाज या व्यक्तिको दिया जानेवाला दान है। अथवा किसी सदुद्देशसे, सत्कार्यके लिये दिया जानेवाला दान है। जैसे मंदिर आदि बांधनेके लिये विद्यालय चलानेके लिये, अन्नछत्र चलानेके लिये आदि । इसके अलावा कुछ महादान हैं। जैसे स्वर्ण दान, गजदान, भूमिदान आदि, इन सबमें अन्नदान और ज्ञानदान महत्त्वके कहे गये हैं। दानके साथ दक्षिणाकी व्यवस्था है । दक्षिणा दानवस्तुकी जो कीमत होती है उससे तिहाई होनी चाहिए। वैसे ही दान लेनेवाला विद्वान हो, सुसंस्कृत हो, सत्प्रवृत्त हो, तपस्वी हो । दानकी वस्तु अथवा दक्षिणाका दुरुपयोग न करें। नहीं तो दान लेनेवाला यदि कुपात्र होता है तो अपने साथ दान देनेवालेको भी अधोगति ले जाता है । ऋग्वेद आश्वासन देता है “दानसे किसीकी संपत्ति कम नहीं होती ।” ऋग्वेदमें दानके विषयमें कई सूक्त हैं। उनमें दान देनेवाले राजाओं और लेनेवाले ऋषियोंके नाम हैं। दानका वर्णन है। राजाओंके विषयमें राजाओंको दिग्विजयके बाद दान देना अनिवार्य है। दान और यज्ञ समाजमें संपत्तिका सम-विभाजनकी व्यवस्था है ही साथ साथ वित्तसत्ता दुर्जनोंके हाथमें न जानेकी दक्षता भी है। क्यों कि दुर्जनोंके हाथमें वित्तसत्ता जाना समाजके लिये खतरनाक है । इसीलिये अन्यान्य शास्त्रकारोंने कैसे धन कमाना चाहिए अपने धनका कितना हिस्सा दानमें देना चाहिए, दान लेनेवाला कैसे होना चाहिए आदि बातों पर विचारपूर्वक अपना मत दिया है। सामान्यतया अपने उत्पन्नका छठा भाग दानमें देनेके लिये कहा गया है। इसके साथ “धन न्यायसे कमाया गया है!” “दान श्रद्धा पूर्वक दिया गया हो!” “सत्पात्रको दिया गया हो!” आदि बातों पर बहुत कटाक्ष किया गया है। “जिसे दान दिया जाता है उस. ओर तुच्छता भाव न हो!” “दिया हुवा दान कभी नहीं लौटाया जाय!” “दानका वचन पवित्र वचन है। उसका पालन होना ही चाहिए!” आदिका भी आदेश है। जैन धर्मशास्त्रोंमें भी दानके (१) पात्र (२) करुणा (३) सम (४) अन्वय ऐसे चार प्रकार कहे गये हैं। सत्पात्रको दिया गया दान “पात्र” है। दुःखियोंको दिया गया दान करुणा हैं अपने सम साथियोंको दिया गया दान “सम” है। तथा अपनी संपत्ति किसी उत्तराधिकारीको सौंपना अन्वय है! इसके अलावा अन्नदान औषधदान, गृहदान, ज्ञानदान, मुनियोंके लिये आवश्यक उपकरणादिका दान, आदि कई प्रकारके दान कहे गये हैं। जूआ, चोरी, आदि पापमार्गसे कमाया हुवा धन देने और लेने वालेको दुःखदायक होता है ऐसा भी कहा गया है। इन सब बातोंके साथ ही साथ दानीको कितना दानमें देना चाहिए इसका भी विवेचन किया गया है। इस विषय पर अलग अलग शास्त्रकारोंने अलग अलग मत दिये हैं। कुछ शास्त्रकारोंने एक तिहाई उत्पन्न, दानादिमें देनेको कहा है तो कुछने एक बटा छ दानमें देनेको कहा है। किंतु सबने दानके कारण परपरिवारको किसी भी प्रकारके कष्ट न हो इस लिये सावध रहनेको कहा है। परिवारकी सभी आवश्यकताओंकी पूर्ति होनेके बाद राजाका राजधन देनेके बाद जो रहता है वही दान करनेका विधान है। जैसे दान देनेवालोंको नियम कहे गये हैं वैस ही दान लेने- वालेके लिये भी कुछ नियम हैं। दान लेनेवालोंको भी कुछ आशाएँ दी गयी हैं। अयोग्य व्यक्तिसे १४१ परिशिष्ट ५