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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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दान न लें। अधार्मिक राजासे दान न लें। अश्रद्धासे तुच्छतापूर्वक या दबावमें आकर दिया हुआ दान न लें ! अविद्वान् ब्राह्मणको कोई महादान नहीं लेना चाहिए ! प्राचीन कालसे व्यक्ति तथा समाजमें आनेवाली अपूर्णताको दूर करनेके लिये दानका विधान कहा गया है। पाराशरस्मृतिमें "जिसको किसी बातकी आवश्यकता है उसके घरमें जाकर वह वस्तु देना!" उत्तमतम दान कहा गया है। कई लोग इतने दुर्बल होते हैं कि मांगने के लिये बाहर जाना उनके लिये असंभव होता है। ऐसे लोगोंको उनके घरमें जाकर ही दान देना चाहिए । शास्त्रकारोंने ज्यादा हो या कम "नित्यका दान" आवश्यक और महत्व का माना है। दान एक सामाजिक कर्तव्य है। जिस समाजके धनिक लोग अपना यह सामाजिक कर्तव्य करते हैं उस समाजमें समाधान रहता है । सामाजिक संताप सामूहिक दान भावनाके अभावका द्योतक है। इसीलिये प्राचीन शास्त्रोंके मर्मज्ञ इस युगके महर्षि विनोबाजीने सामूहिक रूपसे भूदान, संपत्तिदान, श्रमदान आदिकी प्रतिष्ठा की है। विनोबाजीकी ग्रामदानकी कल्पना विश्वइतिहासको दी गयी एक महान् देन है। यह उनकी प्रतिभाका-जो स्वयं प्रकाशित है—सुंदरतम उदाहरण है। यह प्राचीन ऋषियोंके दानकी कल्पनाका पूर्ण विकसित रूप है। दीक्षा—किसी महान् कार्यके प्रारंभमें, उसके लिये योग्य हो, अधिकारी हो, इस दृष्टिसे संस्कार संपन्न अधिकार प्राप्त करनेकी क्रिया। किसी भी यज्ञके प्रथम यजमानको क्षौरादि करके, मंत्रोंके साथ कुछ कर्म करके, यज्ञ दीक्षा लेनी होती है। इस कर्मके बाद ही उस यजमानको "दीक्षित हुआ" ऐसा कहा जाता है। वैसे ही आध्यात्मिक साधनामें, योग-साधनामें गुरुसे शिष्यको अनेक प्रकारसे दीक्षा दी जाती है। आध्यात्मिक क्षेत्रमें दीक्षाका अर्थः— देती जो विमल ज्ञान नाशती कर्म वासना । कहते हैं उसे दीक्षा तंत्रज्ञ मुनि सिद्ध जो ॥ ऐसे किया है। आगमोक्त साधनामें दीक्षाको अत्यंत महत्त्व दिया गया है। बिना गुरुदीक्षाके इस मार्गमें प्रवेश नहीं मिल सकता । दीक्षा गुरुका भावात्मक कार्य है । दीक्षासे गुरु-शिष्य चित्त-संयोग होता है । दीक्षाएँ अनेक प्रकारकी होती है । सामान्यतः दोन प्रकारकी दीक्षाएँ मानी जाती हैं । (१) सामान्य दीक्षा जो विशेष दीक्षाके लिए भूमिका तैयार करती है । इस दीक्षामें दीक्षित होनेके बाद ही साधक साधनामें व्रतस्थ होता है। उसको यम-दमादि साधनाके नियमोंका पालन करना पड़ता है। इस दीक्षामें गुरु शिष्यके मस्तक पर आशीर्वावरूप शुभ हस्त रखता है। इस प्रकारकी दीक्षाके प्रभावसे अनेक प्रकारके पापांकुर नष्ट होते हैं। हृदयमें श्रद्धा भक्तिका उदय होता है। इससे गुरु-सेवा, देव-पूजादिका अधिकार मिलता है। इसके बाद (२) यथार्थ दीक्षा दी जा सकती है। आगम-शास्त्रानुसार-भुक्ति और मुक्ति समान सिद्धियाँ हैं । आगम शास्त्रको ही "भुक्ति मुक्ति वर प्रद" कहा गया है। इसमें भुक्तिकी भोगकी साधना सकाम, और मुक्तिकी साधना निष्काम माना गया है। गुरु साधकका अधिकार देख कर सबीज अथवा निर्बीज मंत्र दीक्षा देता है। सबीज दीक्षा अत्यंत सामर्थ्यवान होती है जिससे साधकको अत्यंत कष्ट उठाने पड़ते हैं। इसमें अनेक प्रकारके संकट और खतरे भी होते हैं। इसलिये निर्बल लोगोंको सबीज दीक्षा नहीं दी जाती निर्बलका अर्थ शरीरसे अथवा मनसे भी हो सकता है। सामान्य निर्बल लोगोंको निर्बीज मंत्र दीक्षा दी जाती है। ऐसी दीक्षामें अनेक प्रकार हैं। दीक्षाके सभी मुख्य तथा उपमुख्य प्रकारोंको लेकर ज्ञानेश्वरी १५२