ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५ से अधिक प्रकार हैं। दीक्षा आध्यात्मिक साधनाके क्षेत्रमें अत्यंत महत्त्वका भाग है। सामान्य दीक्षा मानो अच्छा बीज है। अच्छे किसानको, अच्छा बीज मिलने पर भी उसको बोना, उसके पहले खेत तैयार करना, बोनेके बाद भी जंतु, कीडे मकोडोंसे उसकी रक्षा करना, समय पर पानी खाद आदि देनेका काम रहताही है। वह सब ठीक समय पर होता है तो अच्छी फसल आती है। किंतु यथार्थ दीक्षा आगकी चिनगारी है। जहां पडी वहांका कूडा कर्कटकर राख होना निश्चित है। ऐसी दीक्षाको शक्तिपात भी कहते हैं। गुरु अपनी शक्तिसे शिष्यका व्यक्तित्वही बदल देता है। यह एक प्रकारसे व्यक्तित्व परिवर्तन है। जैसे तुरंत दीपसे दीप जलता है या बटन दबाते ही बिजलीका प्रवाह प्रारंभ होता है वैसे ही यह दीक्षा। क्षण भरमें व्यक्तित्व परिवर्तन होता है। वास्तविक अर्थमें यही दीक्षा है ! यह आत्मसंस्काररूप अंतर्दीक्षा है। दीक्षा मिली और सिद्धीका परम पावन दर्शन हुआ ! ऐसी दीक्षामें गुरु क्षणभरमें अपनी ही नहीं अपनी गुरु परंपराकी सारी शक्तियां शिष्यको ऐसे सौंप देता है जैसे पिता मरते समय अपनी परंपरागत सारी संपत्तिका उत्तरदायित्व अपने पुत्रको सौंप देता है। ऐसी दीक्षा पानेके लिये शिष्यको जन्मजन्मांतरसे वास्तविक शिष्य संस्कारोंसे संपन्न होना पड़ता है। इसका संकेत गीताके छठे अध्यायके अंतमें मिलता है। दुःख—सुखके बिना दुःख या दुःखके बिना सुखका अनुभव आना असंभव है। क्यों कि यह सापेक्षिक द्वंद्व है। दुःख शब्दकी व्याख्या करते समय न्यायशास्त्र कहता है। साक्षा-पीडा- देनेवाला जो है वह दुःख है। पीडा दुःखका लक्षण है। अनेक दर्शनकारोंने दुःखकी अनेक व्याख्यायें की हैं। किसीने "प्रतिकूल वेदनाको दुःख," कहा है तो किसीने "अधर्म मूलक उत्पन्न प्रतिकूलताको दुःख" कहा है। और सांख्योंने "बुद्धि तत्त्वके विशिष्ट परिणामको दुःख" कहा है। मनुस्मृति कहती है "परवशता दुःख है।" नीतिशास्त्र दुःखको अधर्मका परिणाम मानता है। दीनता, तथा मुखमालिन्य दुःखका परिणाम है। दुःख तीन प्रकारका होता है। (१) आध्यात्मिक (२) आधिभौतिक (३) आधिदैविक। आध्यात्मिक दुःखमें भी शारीरिक और मानसिक ऐसे दो प्रकार हैं। शारीरिक दुःखका कारण कफ वात पित्तकी विषमता है तो मानसिक दुःख काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन षड्विकारोंके कारण होते हैं। आधिभौतिक और आधिदैविक दुःख बाह्य उपचारोंसे दूर होनेवाले हैं। आधिभौतिक दुःख मनुष्य, पशु, पक्षी, कृमि कीटक आदि निर्माण करते हैं तो आधिदैविक दुःख भूत, पिशाच, निसर्गादि उत्पन्न करते हैं। मन ही दुःखका ग्रहण करता है। प्रत्येक जीवको दुःख होता ही है। इंद्रिय, इंद्रिय विषय, तथा विषय प्रत्यक्ष दुःखका कारण है। पारतंत्र्य, रोग, अपमान, शत्रु, प्रतिकूल गृह-परिवार, निर्धनता, दुष्टकी सेवा, आदि दुःखकी अनेक बातें हो सकतीं हैं। भगवान बुद्धही जीवनमें आनेवाले दुःखोंको अपने तत्त्वज्ञानका केंद्र बना कर सोचनेवाले पहले महापुरुष हैं। दुःखका सर्वव्यापी अस्तित्व, उसके सार्वत्रिक कारण, संपूर्ण दुःख निरसनकी शक्यता, तथा दुःखनिरसनका मार्ग यह बुद्धके कहे श्रेष्ठ प्रकारके चार सत्य हैं। भगवान बुद्ध कहते हैं "जन्म, जरा, रोग, मृत्यु, अनिष्ट संयोग, इष्टवियोग, इच्छाघात आदि बातें दुःखमय हैं।" दुःखका कारण है तृष्णा। इसलिये तृष्णा - त्याग करनेसे दुःखमुक्ति मिलेगी यह भगवान बुद्धका कहना है । "जीवन दुःखोंसे भरा है" यह बात उपनिषद् तथा सांख्य, भगवान बुद्धके पहलेसे कहते आये हैं। प्रापंचिक सुख तथा सुखसाधन यह क्षणिक होनेसे उसका अंतिम परिणाम दुःख ही है। इसलिये "परमसत्य" को छोड़ कर और सब दुःखका ही कारण है। ११३ परिशिष्ट ५