भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1091

हमारी यह देह पंचभूतात्मक है वैसे ही पंचकोशोंसे बनी है। यह स्थूल देह अन्नमयकोशसे बनी है। इस देह पर अभिमान करनेवाले जीवको विश्व कहते हैं। इस शरीरकी सब ज्ञानेंद्रियां बुद्धिशक्ति और कर्मेंद्रियां क्रियाशक्तिसे चलती हैं। ये दोनो शक्तियां समान भावसे अंतःकरणमें रहती हैं। सभी इंद्रियां स्थूल देहके आश्रयसे रहती हैं ऐसा दीखनेपर भी, वास्तवमें ये स्थूल देहका अंश नहीं होती। लिंगदेह जब शरीर छोड़कर जाता है तब ये इंद्रियां स्थूलदेहमें नहीं रहतीं। स्थूलदेहको ही आत्माका भोगायतन कहते हैं। इसी शरीरके सहारे आत्मा पूर्व-कर्मको भुगतता है। बिना देह-संबंधके जीवका कर्तृत्व और भोक्तृत्व व्यर्थ है। स्थूल देहसे मुक्त आत्मा ही कर्ता अथवा भोक्ता हो सकता है। अविद्याके कारण जीवको देहाभिमान होता है। ज्ञानसे अविद्याका क्षय होनेकेबाद यह देहाभिमान नहीं रहता। पांच कर्मेंद्रिय, पांच ज्ञानेंद्रिय, पंच प्राण मन और बुद्धि इन सत्रह तत्त्वोंसे सूक्ष्म देह होता है। प्राणमय कोश, मनोमय कोश तथा विज्ञानमय कोशसे यह बनता है। इस सूक्ष्म देहको लिंग- देह भी कहते हैं। यह लिंगदेह तेजसूका अंश होता है। काष्ठोंमें जैसे अग्नि होता है वैसे यह लिंगदेह होता है। स्थूल देहमें लिंगदेहका तेज व्याप्त होता है। किसीका लिंगदेह विशुद्ध नहीं होता। यह संस्कार और वासनाओंके बोझसे दबा रहता है। मृत्युके समय जो भाव बलवत्तर होते हैं वे अपने पूर्ववर्ती भावोंको अपनेमें मिला लेते हैं। इसलिए मृत्यु समयके संस्कारके अनुसार अगले जन्मकी गति मिलती है। इस लिंगदेहाभिमानी जीवको तेजस् कहते हैं। और ऐसे सभी लिंगदेहोंपर अभिमान करनेवाले तत्त्वको हिरण्यगर्भ । इसी लिंगदेहके पीछे, उसके आश्रयरूप कारण देह होता है। कारणदेहको अनादि अविद्या कहा गया है। यही अविद्या स्थूल और सूक्ष्मदेहका कारण है। ज्ञानसे वह नष्ट होती है इसलिये उसको देह कहा गया है। इस पर अभिमान रखनेवाले जीवको प्राज्ञ कहा गया है। सभी कारण देहोंपर अभिमान रखनेवाला तत्त्व, मायोपाधिक देवता, ईश्वर कहलाता है। कारण देह पंचकोशोंमेंसे आनंदमयकोशका है। ब्रह्म विद्याके प्रभावसे जब तक यह कारणदेह नष्ट नहीं किया जाता तब तक मुक्ति नहीं मिलती। इन सभी देहोंको विकार रहित करना ही देहसिद्धि कहलाती है। भारतके प्राचीन ग्रंथोंमें इस देह सिद्धिके अनेक प्रकार कहे गये हैं। प्राचीन रसायन शास्त्रियोंने अठारह संस्कारोंसे संस्कृत पारदसे देह सिद्धिकी बात कही है तो पांतजल ऋषिने भूतजयसे देह सिद्धिकी प्रक्रिया कही है। गोरखनाथ और तांत्रिक बौद्धोंने भी देह सिद्धिकी अनेक बातें कही हैं। प्राचीन ग्रंथोंमें शुक्राचार्य, जालंदरनाथ, गोविंदभगवत्पादाचार्य आदि पुरुषोंको देहसिद्धि हुई थी ऐसा कहा गया है। मनुष्य देहसिद्धि होनेके बाद नित्य कौमार्यावस्थामें रहता है। न उन्हे वृद्धावस्था घेरती है न कोई विकार छूता है। प्राचीन ग्रंथोंमें ऐसे ही लोगोंको चिरजीवी कहा है। अश्वत्थामा, बली, व्यास, हनूमान, विभीषण, कृप, परशुराम, मार्कांडेय, इन लोगोंकों चिरजीवी कहा गया है। कल्पांतमें इन चिरजीवियोंके शरीर नष्ट होते हैं। अर्वाचीन कालके कुछ महायोगियोंने आत्माकी भांति शरीर भी अमर हो सकनेकी बात कही है। सारा विश्व सोम-कलासे उत्पन्न होता है और अग्नि उसका भक्षण करता है। सोमकला जब अग्नीसे भी प्रबल होती है तब देह कल्पांत तक टिकते हैं। सोमपानसे सोमकला प्रबल होती है ऐसी बात वेदमें भी कही गयी है। १४५ परिशिष्ट ५