ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1092, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंअमरत्व प्राप्त होने पर भी देहतत्व पर संपूर्ण स्वामित्व प्राप्त करनेके प्रथम देहातीत जीवन्मुक्ता- वस्था पाना असंभव है । इसके लिए शरीरभावका त्याग करके सहज भावमें रहना आवश्यक है । सामान्यतया कुछ संतोंने देहकी निंदा करते हुए यह रक्त और मांसका पिंड है, अस्थियोंका पंजर है, मलमूत्रकी खान है, आदि कहा है किंतु यजुर्वेदमें कहा है । सात ऋषि रहते शरीरमें रक्षा करते हैं अप्रमाद हो । सात ऋषि हैं ये जल प्रवाह जाते निद्रिस्यके स्थान तक जो ॥ निद्रिस्यकी रक्षा करते हैं दो देव इस देह यज्ञ शालाकी ॥ इस मंत्रका अर्थ करते समय वेदाचार्योंने कहा है दो आंखें, दो कान, नाकके दो रंध्र, एक मुख ये ही सप्त ऋषि हैं। ये सदैव ज्ञानग्रहण करते हैं इसलिये ऋषि हैं । ये ही ज्ञानग्रहणके देह-यज्ञशाला-की रक्षा करते हैं। जागृतावस्थामें ये सातों बहिर्मुख होते हैं और निद्रावस्थामें अंतर्मुख होते हैं । इनकी इस अंतर्मुखताके कारण निद्रित शरीरको आनंद मिलता है । निद्रावस्थामें भी जो दो देव इसकी रक्षा करते हैं ऐसा कहा है वे दो देव हैं प्राण और अपान ! यदि वे दो निद्रित हो गये तो देह समाप्त होगा ! इसी प्रकार अथर्ववेदमें भी कहा है । आठ चक्र नव-द्वारकी यह काया देवोंकी अयोध्या नगरी । इसमें है सुवर्णमय कोष वही तेजसे भरा स्वर्ग-लोक । उस सुवर्णमय कोशका है जो तीन पर तीनका आधार । इसमें रहता है आत्मयक्ष इसे जानता वह ब्रह्म ज्ञानी ॥ आठ चक्र=(१) मूलाधारचक्र (२) विशुद्ध (३) मणिपूर (४) स्वाधिष्ठान (५) अनाहत (६) आज्ञाचक्र (७) सहस्रारचक्र (८) ब्रह्मरंध्र । नवद्वार=दो आंखे, दो कान, नाकके दो रंध्र, एक मुख, एक गुदद्वार, एक मूत्रद्वार । तथा इसके आधारभूत देवता कानके देवता दिशा, आंखका सूर्य, मुखका अग्नि, हृदयका चंद्रमा इस प्रकार शरीरके आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, एक इंद्र, एक प्रजापति ऐसे ३३ देवता हैं । इसीलिये यह स्वर्ग लोक है । इसीलिये संतोने भी इसको “अस्थिपंजर रक्तमांसका पिंड, मलमूत्रकी खान” आदि कहने पर भी “चौरासी लाख फेरे फिर कर सुंदर नरतनु पाया” कह कर इसकी महती गायी है । मानवदेह पंच भूतात्मक है, नश्वर, नाश होनेवाला है, इस पर भरोसा नहीं कर सकते फिर भी सारे साधनोंका एक मात्र यही आधार है । इहलोक अथवा परलोकके ध्येयकी प्राप्तिके एक मात्र साधन यही है । बिना इसके सारा निरर्थक है । सारे देहमें मानव देह उत्तम है । इसीमें पुरुषोत्तम बसा है । यह कह कर संत इसका सदुपयोग करनेके लिये कहते हैं । हमारे पुराने ग्रंथोंमें कहा है :— मनुष्यत्व मुमुक्षुत्व तथा सज्जन साथ जो । देवानुग्रहसे प्राप्त ये तीन सिद्धि दुर्लभ ॥ यह जो देह मिला है वह पाप पुण्य करनेके लिये नहीं किंतु पाप पुण्यका अतिक्रमण करके जैसा वह (ब्रह्म) पूर्ण है ऐसा यह भी (देह भी) पूर्ण है इसका अनुभव करने के लिये है । इस पूर्णत्वका अनुभव ही इसकी कृतार्थता है । ज्ञानेश्वरी १७६