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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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देहभाव-देहाहंता देहतादात्म्य—देह ही मैं हूं इस भावनासे रहना। देहसे एकरूप होकर अस्वाभिक सुखदुःखादि द्वंद्वोंसे उलझे रहना। जीव इसका दृष्टा है। साक्षी है। स्वामी है। किंतु संस्कार वश वह देह ही मैं हूं ऐसे मान कर रहता है। इस भावको देहतादात्म्य कहा जाता है। यही देहाहंता है। आत्मानारम विवेकसे यह नष्ट होता है और मैं देहसे भिन्न हूँ इसका बोध होता है। यही सहजभाव है। द्वंद्व-द्वंद्वबंध—वस्तुतः जो सत्य नहीं है ऐसे भासमान परस्पर विरोधी अनुभव। इसका आधार द्वैत है। यह सारे द्वंद्व परस्पर विरुद्ध जोडी जोडीसे भासते हैं। इससे मनुष्य स्वभाव, अथवा अपनी सहजावस्था भूल जाता है। उस द्वंद्वोंमें बंध जाता है। इन द्वंद्वोंसे परे जाना ही सहजावस्थामें लीन होना है। द्वंद्वातिक्रमण चिर आनंद है। ये द्वंद्व हैं-जैसे जड, चेतन, पुरुष-प्रकृति, प्रपंच-परमार्थ, प्रकाश-अंधकार, राग-द्वेष, सुख-दुःख, शीत-उष्ण, धर्म, अधर्म, पाप पुण्य, ज्ञान अज्ञान, लाभ-हानि, निंदा-स्तुति, मान-अपमान, जय-पराजय, शत्रु, मित्र सज्जन-दुर्जन, सत्-असत् आशा-निराशा, शाप-आशीर्वाद प्रवृत्ति-निवृत्ति, त्याग-भोग, हिंसा-अहिंसा, हर्ष, शोक प्रेम-वैर, नीति, अनीति, शुभ-अशुभ, सम-विषम, विधि-निषेध नित्य-अनित्य, व्यष्टि- समष्टि, विवेक-अविवेक, विचार-विकार, जन्म-मरण, बंध-मोक्ष उत्क्रांति, अपक्रांति, पुरोगामी प्रतिगामि, मंगल-अमंगल, नया-जुना, अपेक्षा उपेक्षा, जीवन-मरण, विकास-विनाश आदि आदि। ये द्वंद्व सदैव सापेक्ष अथवा साहचर्यसे रहते हैं। यह देहभावके कारण होते हैं। आत्मभावमें ये लय हो जाते हैं। इस स्थितिको द्वंद्वातीत अवस्था कहते हैं। द्वैत—जीव, जगत तथा परमात्मानें भेद भाव है। जीव जगत यह सत्य है। दीखने- वाली सभी भिन्नताएं, विविधताएं सत्य हैं। (१) जीव- शिव भेद; (२) जीव-जीवमें भेद (३) जीव-जडमें भेद (४) जड-जडमें भेद (५) और जड तथा परमात्मानें भेद ये पांच प्रकारके भेद-द्वैत- सत्य हैं। विश्वकी इस विविधताको सत्य माननेवाला विचार द्वैत है। धर्म—जैसे आजकलके विद्वान, अंग्रेजी रिलिजन शब्दके अर्थमें भारतीय धर्म शब्दका प्रयोग करते हैं वैसे धर्म शब्दका अर्थ नहीं है। अंग्रजी रिलिजन शब्द धर्म शब्दका अर्थ नहीं दे सकता। 'धर्म शब्द संस्कृतके जिस धातुसे बना है उससे तो जो लोगोंको धारण करता है, उठाता है अथवा पुण्यारमाओंसे जो धारण किया जाता है वह धर्म है किंतु यह शब्द इतने प्राचीन कालसे चला आया है, इससे विद्वान विचारकोने इस पर इतना अधिक लिखा है कि धर्मका अर्थ और भाव एक सागरकी तरह लहरें मारता जाता है। साथ ही साथ भारतीय जनजीवनमें वह इतना ओतप्रोत हो गया है कि आधुनिक विदेशी आधार विचारोंके तज्ञ किंतु भारतीय जीवन परंपरासे बिलकुल अनभिज्ञ, तथाकथित, स्वयंभामन्य, पुरोगामी लोगोंके लाख कहने पर भी जनजीवन पर उनके कहनेका कोई गहरा और स्थायी प्रभाव नहीं पडता। भले ही प्रलोभन और धमकियोंके सम्मुख, उनका भावावेग कुछ दब जाता है और नित नये दंभको जन्म देता है। धर्म उतना उथला भाव नहीं है कि कुछ तथाकथित युग-निर्माताओंकी लेखनीके एक फटकारसे जन-जीवनसे उठ जाय। वह वैदिक कालसे भारतीय जन-जीवनमें घरकर गया है। उनके १४७ परिशिष्ट ५