भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1094

श्वास निश्वास और हृदयकी धडकनके साथ समरस हो गया है। ऋग्वेदमें कमसे कम ५६ से अधिक बार यह शब्द आया है और जीवनके कई अंगोंका आधार बन गया है। एक जगह ऋग्वेदमें गाया गया है— इससे सारे दिव्य लोकोंके साथ भूलोक व्याप्त है ॥ इसके लिये देवोंने भी स्तवन रच दिये हैं ॥ इसके नियमोंसे भूम्याकाश संभले हुए हैं ॥ न कभी इसका क्षय होता है न इसकी उर्वरता घटती है। इसके बाद उपनिषदकाल तक अनेक परिवर्तन होने पर भी उपनिषद कहते हैं "धर्म चर !" और गीता "स्वधर्मे निधनं श्रेयः" कहती है। और जैमिनी अपने सूत्रमें "उपदेशसे, आज्ञासे, या विधिसे ज्ञान होनेवाला श्रेयस्कर क्रिया ही धर्म" कहता है तो महाभारतमें भगवान व्यास कहते हैं "जो विश्वको धारण करता है वह धर्म है। धर्म प्रजाको धारण करता है जो धारण सह है वह धर्म है!" उसके साथ अणुवादी वैशेषिक "जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस होता है वह धर्म" कहता है। अभ्युदय और निःश्रेयसका अर्थ लौकिक उत्कर्ष और पारलौकिक सुख है। वैशेषिक अणुवादी दर्शनकार हैं। उनके मतसे धर्म कोई बाह्य आचार नहीं है किंतु मानव पर होनेवाला शुभ संस्कार है। वैशेषिक दर्शनके अनुसार निःश्रेयस जीवनका उच्चतम सुख है। अर्थात धर्म निम्नसे-अभ्युदय-उच्चतम सुख तक जीवन पर शुभ संस्कार करनेवाला साधन है। सुख और धर्मसे संबंध जोडकर दिखानेवाले ऐसे अनेक वाक्य मिल सकते हैं। दक्ष स्मृतिमें तो— चाहते सुख सभी लोग धर्मसे उत्पन्न है सुख। इससे धर्म कर्म नित्य करना अवश्य यत्नसे ॥ वैसे ही मनुस्मृतिमें— अधर्म प्रसवता है दुःख ही देहधारिको। तथा प्रसवता धर्म सुख संयोग अक्षय ॥ कहा है। इसीलिये धर्म साधनाको ही पुरुषार्थ कहा गया है। अधर्मसे प्राप्त होनेवाले निम्न तर सुखोंको त्याज्य माना गया है। निम्नसे उच्च, उच्चसे उच्चतर और उच्चतरसे उच्चतम सुख प्राप्तिका प्रयास करना ही पुरुषार्थ है। एक व्यक्तिके अधर्मसे समाजको भी दुःख अनुभव करना पड सकता है एक मनुष्य अपने निम्न तर सुखकी अपेक्षासे समाजका अहित कर सकता है इसलिए "अधर्म प्रवृत्ति के संकोचके लिये" दंड भयकी आवश्यकता भी अनुभव की गयी है। साथ साथ उच्चतर सुखोंका विचार करते हुए "सुखका अर्थ वासनाका अभाव, जब सुखानुभव होता है तब कोई वासना नहीं होती ! ऐसा कहकर वासनाके अभावके कारण बताये हैं। (१) वासनापूर्ति (२) या वासनाका उत्पन्न ही नहीं होना (३) चित्तकाग्रतासे वासना विलोपसे वही सुख मिलेगा जो वासना पूर्तिसे । यह दार्शनिकोंका मंतव्य है। इसलिये उन्होने वासना विलोपका शास्त्र ही बना दिया है। वासनाविलोपसे जो कर्म होंगे वे परार्थ भावसे होंगे। समाजके परस्पर सहाय्यार्थ होंगे। ज्ञानेश्वरी १७८