ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहां “व्यक्तिगत स्वार्थ या व्यक्तिगत वासना पूर्तिके भाव नहीं होंगे !” वासना विलोपसे होनेवाले कर्म ही निष्काम कर्म होंगे। वासना विलोपसे होनेवाले कर्म ही “सच्चे अर्थमें” समाज हितके कर्म होंगे। जो कर्म व्यक्तिके वासना पूर्तिके कर्म हैं उससे समाज हितकी गुंजाइश कमसे कम होती है। इसीलिए अभ्युदयके साथ-भौतिक वैभवके साथ-निःश्रेयस, वासना विलोपकी आवश्यकता है। निःश्रेयसके अभावमें केवल अभ्युदय, व्यक्तिगत वासना पूर्तिके सुखका साधन बननेसे, परार्थ अथवा समाजहितके सभी कार्य केवलमात्र दंभ बन कर रह जायेंगे। तभी महात्मा गांधी जैसे आधुनिक विचारकों ने “बिना धर्मकी राजनीति प्रजाके गलेमें फांसी !” कहा था। यहां धर्मका अर्थ निःश्रेयस अथवा वासना विलोपका अभाव है। भारतीय विचारकों ने, इसी दृष्टिसे जीवनमें विविध परंपराओंका जो निर्माण और प्रचलन किया वह “धर्म” नामसे प्रचलित हुआ ! इस धर्मप्रथाओंमें कहे जानेवाले मंत्र सदैव इसके पीछे जो उद्देश्य हैं उस ओर इंगित कहते हैं। उदाहरणके लिये-अथर्ववेदका यह मंत्र देख सकते हैं:— व्रत चलायें पुत्र पिताका मातासे हो वह सम चित्त । पत्नी बोले मृदु सुख वाणी गृह बने सदा शांति धाम । न करे द्वेष भाई भाईका तथा भगिनि भी कभी कहीं ॥ सहायक बनो परस्पर सम व्रत हो मंगल वाणी ॥ वर्णव्यवस्थाके उद्देश्यमें भी “परस्पर सहायता” है। परस्पर पूरक होकर समाज हित साधना धर्मका एकमेव उद्देश्य है। यज्ञ और दान राजा-प्रजा, गुरु-शिष्य, स्वामी-सेवक, पति-पत्नी, पिता-पुत्र आदिके परस्पर संबंधोंका जो सुंदर विवेचन देखनेको मिलता है वह आश्चर्य जनक है। यह सारा निःश्रेयस प्रधान है। “परस्पर पूरक भावनाका धर्म सिद्धांत” अत्यंत मौलिक और महत्वपूर्ण है। वह सामूहिक शांति समाधानका साधन है। दूसरेके सुखकी अवहेलना करके अपने सुखका विचार करना अधर्म है। दूसरेके सम्मानकी अवहेलना करके अपने सम्मानका विचार करना अधर्म है। इसीलिए “सर्वे सुखिना संतु” की प्रार्थना है। महाभारतमें एक स्थान पर धर्मका रूप समझाते हुए कहा है— सर्व हित रत जो है सबका रहता मित्र । मन कर्मवचनसे जानता है वही धर्म ॥ परस्पर हितका विचार करके महाभारतमें धर्म अधर्म जाननेकी जो उत्तम कसौटी कही है वह आज भी आदर्श कही जा सकती है- “अपने लिये जो अच्छा नहीं लगता, दुःखकारक लगता है ऐसा बर्ताव दूसरोंके साथ नहीं करना चाहिए। यही धर्मका सार-तत्व है। जो इसके विरुद्ध व्यवहार करता है वह “वासनामूलक” करता है !” इसी व्यवहारको अध्यात्मवादी “आत्मौ- पम्यबुद्धि” कहते हैं। ऋग्वेद कालसे लेकर आज तक धर्माधर्मका पर्याप्त विवेचन किया गया है। समय समय पर जो घटनायें होती हैं उससे निर्माण होनेवाली समस्याओंको सुलझाते समय भी-यह धर्म यह अधर्म ऐसा बता कर अधर्मका विरोध किया हुआ मिलता है। ऐसे प्रसंग असामान्य प्रसंग हैं। वे सबके सामने नहीं आते। इसलिये सर्व सामान्य लोगोंकी दृष्टिसे “नित्य आत्म-सुखकी चाह, अन्य सुखके विषयमें विरक्ति, भूतमात्रोंमें करुणा, करुणामय परोपकार भाव, परस्पर सहाय १४९ परिशिष्ट ५