ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1096, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंभावनाका विकास, कमसे कम हिंसा, सुखस्वरूपका ज्ञान, सबके सुखपर दृष्टि, सत्प्रवृत्त उद्योग, तथा सिद्धि असिद्धिमें सम भावना इनको धर्मके अंग माने हैं तो किसीने-संतोष, क्षमा, मनःसंयम, अशौच, अंतर्बाह्य पावित्र्य, इंद्रिय-निग्रह, तत्वजिज्ञासू बुद्धि, आत्मज्ञान, सत्य, अक्रोध इन दस गुणोंको धर्मके लक्षण माना है। इसके साथ किसीने दान, निषिद्ध विचारोंका विस्मरण, चित्तकी स्थिरता-वासना विलोपकी साधना-आदि अन्य कुछ गुण कहे हैं। बौद्ध धर्ममें इन गुणोंके साथ अनिंदा, —जो वर्तमान युगमें युग-धर्म है-संयम, हित-मित आहार विहार, चित्तका क्षय-वासना विलोप-भी धर्मके लक्षण माने गये हैं। ये सारे गुण समाज-विकासके लिये अथवा समाजके सामूहिक हितके लिये आवश्यक हैं। बिना इन गुणोंके समाजके सामूहिक हितके लिये आवश्यक "परस्पर सहायताके भाव" की वृद्धि नहीं हो सकती। सबल, शक्तिशाली समाज संघटित नहीं हो सकता। सशक्त समाजका निर्माण नहीं हो सकता। इसलिये धर्मका अर्थ "सशक्त समाज निर्माणके लिये आवश्यक गुणोंका व्यक्तिगत और सामूहिक विकास है।" और अधर्मका अर्थ "सशक्त समाज निर्माणके लिये आवश्यक गुणोंका ह्रास अथवा हनन।" इसीलिये समय समय पर शक्तिशाली नेताओंने "डंडेसे भी" अधर्मका विरोध किया है। इसका नमूना जरासंध कृष्ण संवादमें मिलता है। कृष्ण जरासंधसे कहता है- "हे राजश्रेष्ठ ! कोई भी राजा अन्य सज्जन राजाओंकी हिंसा कैसा कर सकेगा ? तू वह करने जा रहा है। यदि समर्थ इसका विरोध नहीं करेगा तो "तुम्हारा पाप उस समर्थके सिरपर पडेगा !" हम धर्मोचरणी हैं। धर्मका रक्षण करनेमें समर्थ हैं। इसलिये तुम्हारे अधर्मका विरोध करने आये हैं!" भगवान कृष्णसे लेकर महात्मा गांधीतककी यह धर्मपरंपरा है। शस्त्र बल संपन्न भगवान श्रीकृष्णने जरासंधके अधर्म निवारणके लिये उसको युद्धका आव्हान दिया और निःशस्त्र महात्मा गांधीने "धर्महीन अंग्रेजी राज्यके विरुद्ध सामूहिक सत्याग्रहका युद्ध छेड़ा! और घोषणा की धर्म रहित राज्य प्रजाके गलेमें फांसी है !" भारतमें कईबार ऋषियोंने भी यह काम किया है। महात्मा गांधीजीने ऋषिपरंपराका सबल नेतृत्व किया ! ऋषियोंने सदाचारी राजाको प्रेरणा देकर उनसे अधर्मका विरोध किया तो महात्मा गांधीने समग्र जनताको प्रेरणा देकर अधर्मी राज्यका विरोध किया। क्यों कि धर्मानुशासन हो। धर्मानुशासनको महात्मा गांधीजीने रामराज कहा। धर्म किसीकी ओरसे किसी पर थोपी गयी वस्तु या अफीमकी गोली नहीं किंतु मानवी हृदय ही धर्मका उगमस्थान है। मानव कुलने व्यक्तिगत तथा सामूहिक उत्थानके प्रयाससे धर्म भावना, धर्मानुशासन, तथा धार्मिक आचार विचारोंका विकास किया है। धर्म "मानवी हृदयकी गहरी तथा सर्व स्पर्शी" भावना हैं। शाब्दिक कसरत करनेवाला तर्क उस भावना पर यशस्वी आघात नहीं कर सकता। समुदायप्रियता मानवी जीवनकी सहज प्रवृत्ति है। इसीसे मानवकुलका योगक्षेम चलता है। धर्म सामूहिक विचार तथा सामूहिक सामर्थ्यकी आधार शिला है। प्रत्येक मनुष्य जन्मसे मृत्यु तक समाजके "संघ-गर्भमें" जीता है और धर्मके माध्यमसे अपनेमें संघ-शक्तिका अनुभव करता है। जैसे भ्रूण माताके आहारसे जीता और बढ़ता है। प्रत्येक मनुष्य कण कण क्षण क्षणसे संघ-शक्तिका ग्रहण और अनुभव करता है क्यों कि यही उसकी सुरक्षा-भावनाकी नींव है। तथा "परस्पर सहायतासे मानवको संघबद्ध करना ही धर्म-भावनाका मूल उद्देश्य" होनेसे वह मानवी हृदयके सिंहासन पर सहज ही अधिष्ठित हो गया है। मानवी कुलके प्रतिभाशाली, स्फूर्तिसंपन्न, मनीषी, महापुरुषोंने साक्षात्कार, समाधि, निरालंब शाश्वत सुख, आदि बातोंसे जो सामान्य लोगोंके विचारकी सीमामें भी नहीं जाती धर्म-भावनाको बिना ओर छोरके अमर्याद् चैतन्यसे भर दिया है। ज्ञानेश्वरी १५०