ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1097, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंइससे इन महापुरुषोंके अनुयायियोंको जीवनमें एक समाधान मिलता है । सांसारिक तापत्रयमें झुलसनेवाले हृदयको एक सांत्वना मिलती जो दूसरे किसीसे नहीं मिलती । इसलिये धर्म-भावनामें तथा धर्म-संस्थाको असामान्य उन्नत सामर्थ्य प्राप्त हो गया है । साथ ही साथ मानवी जीवनमें कल्याणरूप, सर्वहितकारक, इष्ट तथा मंगलमय ऐसा जो जो कुछ संभव है वह सब प्राप्त करादेनेका दायित्व भी धर्म ही लेता है ! मानवी जीवनका अभ्युदय,=प्रार्र्पचिव वैभव तथा निःश्रेयस वासना विक्षोपजन्य निरालंब सुख दोनोंका आधार धर्म ही है । मानव-मात्रके लिये यह अत्यंत महत्त्वका है । साध्य और साधनाकी एकतासे बह जितना प्रभाविन होता है उतना और किसीसे नहीं । पुरुषार्थमें, मोक्षके साथ कामार्थको भी समान स्थान देकर, धर्मने मानव मात्रको अपना अनुयायी बना लिया है साथही साथ धर्मका अविरोधी काम परमात्माकी विभूति मान कर तो उन्मुक्त कामको धर्मकी राससे बांध दिया ! इस प्रकार मानवके सर्वांगस्पर्शी विकासके लिये जिन जिन बातोंकी आवश्यकता है उन उन सबको परस्पर सहायताके लिये आवश्यक सीमामें सीमित कर, जीवन रत्नको धर्मके जड़ावमें सुशोभित कर दिया है । इसीलिये मानवी इतिहासमें जहांतक हमारा ज्ञान जाता है, पिछले दस हजार वर्षके इतिहासमें, विश्वके मानव-कुलके हृदय और मस्तिष्क पर धर्मने अमर्याद स्वामित्व प्रस्थापित किया है क्योंकि वह मानव कुलको प्रतिज्ञापूर्वक आश्वासन देता है “ संपूर्ण जीवन, तथा उसके मूलमें जो शक्ति है उस ब्रह्मका रहस्य मैं तुम्हें खोलकर कह दूंगा । साथ ही साथ सामान्य प्रापंचिक सुखसे परम कल्याणकारी निरालंब शाश्वत सुख तक मैं ही अनुभव कर दूंगा !!” धर्मकी इसी प्रतिज्ञा पर विश्वास करके विश्वके मानव कुलने अनंत कलाओंकी सुंदर सुरभित पंखुरियोंसे खिलनेवाला संस्कृति-कमल खिलाया । विश्वके प्रत्येक भागमें जिन जिन कलाओंका विकास हुवा “उन सबकी आधारशिला धर्म है ।” कला और साहित्य धर्मका सहारा लेकर जितना फला फूला और किसीके सहारे नहीं । इसलिये “धर्मकी उपेक्षा, मानव-कुलके दस हजार वर्षकी उपलब्धीकी उपेक्षा है ।” और “धर्मनिरपेक्षता मानव कुलकी इस उपलब्धिसे निरपेक्षता है ।” और यह कार्य, इन दस हजार वर्षोंमें समय समय पर “दूसरोंके खूनसे अपनी शान बढालेनेवाली, भोग ही सर्वस्व मानने वाली-आसुरी-संस्कृतिने किया है ।” भारतका इतिहास ऐसे प्रसंगोंसे भरा पड़ा है । ऐसे समय एकाकी होकर भी लोगोंसे आत्म-विश्वास पूर्वक “मैं दोनों हाथ उठाकर चीख चीख कर कहता हूँ धर्मसे अर्थ और कामभी-निम्न सुख अभ्युदयभी-जब मिलता है तब तुम धर्मसे उसे क्यों नहीं पाते हो !” कहनेवाले भगवान व्यास और महात्मा गांधी भी धर्मकी ही देन है । धर्म केवल अभ्युदय और निःश्रेयस ही नहीं देता, उसने राम, कृष्ण, कौटिल्य, चंद्रगुप्त, जैसे राजनीतिज्ञ और व्यास, महावीर, बुद्ध, तथा गांधी जैसी ऋषि परंपरा भी दी है । ऐसे धर्मकी उपेक्षा कृतघ्नताकी पराकाष्ठा है ! धर्म मानवमात्रकेहित लिये है । धर्मकी कसौटी विशिष्ट उपासना पद्धति अथवा बाह्य आडंबर नहीं । मठ, मंदिर, मसजिद, चर्च, ये सब धर्मका आधार न होकर धर्मका आधार “अपने लिये जो विरुद्ध है, दुःख दायक है, हानिकारक है, उसका आचरण दूस- रोंके लिये नहीं करना यह आचारसूत्र है ।” धर्म-शास्त्र अथवा शास्त्र—मनुष्यको क्या करना चाहिए क्या न करना चाहिए इसका विधि-निषेध कहनेवाले शास्त्रको धर्म-शास्त्र कहते हैं । धर्म-शास्त्र मानवकी आचार संहिता है । ऋग्वेदमें भी जब बार बार धर्म शब्द और कुछ धार्मिक-विधिनिषेध देखनेको मिलते हैं, तब ३५१ परिशिष्ट ५