ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह कहना पड़ता है उससे पहले भी यह विद्यमान था। भारतीय-धर्ममें अधिकारसे भी कर्तव्य पर अधिक जोर है। कर्तव्य ही मनुष्यका धर्म है। प्रत्येक मनुष्यका अपना कर्तव्य करनेका अधिकार ही अधिकार है; दूसरा कोई विशेष अधिकार नहीं। वैसे ही भारतीय धर्ममें धर्म और नीति ऐसे दो विभाग नहीं है। सत्य बोलना धर्म भी है नीति भी है। किसीसे द्वेष न करना धर्म भी है नीति भी है। यह कहनेवाले नियम शास्त्र हैं। शास्त्रका अर्थ शासन करनेवाला ! नियमन करनेवाला । “मनुष्योंकी प्रवृत्ति अथवा निवृत्तिका नियम कहनेवाला जो है वह शास्त्र” है। भारतीय धर्म कोई उपासना पद्धति नहीं किंतु जीवन-पद्धति है। मनुष्यकी स्वाभाविक प्रवृत्तियोंका नियमन करके उसको वास्तविक कल्याण की ओर मोडना और पथप्रदर्शन करना शास्त्रोंका अथवा धर्मशास्त्रोंका कार्य है। ऐसे धर्म- शास्त्रके ग्रंथ निम्न है— सूत्र-ग्रंथ-(१) गौतम-धर्मसूत्र (२) वसिष्ठ-धर्मसूत्र (३) बौधायन धर्मसूत्र (४) आपस्तंब धर्म-सूत्र (५) हिरण्यकेशीय धर्म-सूत्र । मानव धर्म सूत्रोंका उल्लेख मिलता है। किंतु वह अब उपलब्ध नहीं है । धर्म सूत्रोंके विषयमें कहना हो तो वे किसी बडे ऋषिने नहीं बनाये हैं। वे सर्वसामान्य लोगोंकी रचना है, स्वयं धर्मसूत्रोंमें इसका उल्लेख है। वेदादि ग्रंथ, निर्लोभ निर्दोष सज्जनोक आचरण यही इन सूत्रोंका आधार है। ये धर्मसूत्र परंपरागत धर्माचरणका निचोड है। धर्म-सूत्रोंमें वर्णाश्रम धर्मका विचार है। साथ साथ नित्य नैमित्तिक कर्तव्योंका भी विवेचन है। क्षत्रियोंके कर्तव्य कहते समय राजा और प्रजाके परस्पर संबंध, राजाके कर्तव्य, कानून, राज्य- पद्धति, करपद्धति, राजनीति, इन सबका स्पष्ट उल्लेख है। साथ साथ राजासे जो गलतियां होती हैं उसके लिये यथा योग्य प्रायश्चित्त भी है ! विद्वानोंके मतानुसार इन सूत्रोका काल ई. पू. ८०० से ई. पू. १०० तकका है। इसके अलावा स्मृतिग्रंथ भी धर्मशास्त्रमें आते हैं। ये हैं (१) मनुस्मृति (२) याज्ञ- वल्क्य-स्मृति (३) बृहस्पति स्मृति (४) विष्णु-स्मृति (५) वसिष्ठ-स्मृति (६) गौतम- स्मृति (७) व्यास-स्मृति (८) बौधायन-स्मृति (९) शंख और लिखित-स्मृति (१०) अत्रि स्मृति (११) हारित-स्मृति (१२) उशना-स्मृति (१३) अंगिरा-स्मृति (१४) यम- स्मृति (१५) आपस्तंब-स्मृति (१६) संवर्त-स्मृति (१७) कात्यायन-स्मृति (१८) पराशर- स्मृति (१९) दक्ष-स्मृति (२०) शातातप-स्मृति । इन स्मृतिग्रंथोंके कालके विषयमें विद्वानोंका मत है कि मनुस्मृतिकी रचना ई. पू० ६०० की है। सब स्मृतियां ई. पू० १०० से ८०० तक की हैं। किंतु ई. पू० ८०० के आरण्यक ग्रंथोंमें “स्मृति” शब्द मिलता हैं। अर्थात धर्म-शास्त्रके रूपमें स्मृतिग्रंथ कमसे कम २५०० वर्षोंसे भारतमें प्रचलित हैं। भारतीय धर्मशास्त्रोंके विद्वान लोगोंने करीब १०० स्मृतियोंका पता लगाया है। अर्थात् आज वे सब उपलब्ध नहीं है। फिर भी अन्यान्य ग्रंथोंमें उनका उल्लेख मिलता है। इन स्मृतियोंमें भारतीय जीवन-पद्धतिका चित्रण हुवा है। भारतीय आचारसंहिता कही गयी है। इन स्मृति ग्रंथोंपर अनेक भाष्य भी हैं। ई. स. ८०० से इ. स. १८०० तक ये भाष्य लिखे गये हैं। इसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि धर्मशास्त्रोंके रूपमें हमारे पास ज्ञानेश्वरी ४५२