भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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२५०० वर्षोंके भारतीय आचार संहिताका लेखा जोखा है । उसमें भारतीय-जीवन पद्धतीकां सर्वस्पर्शी दर्शन हो सकता है। यह एक बडी निधि है । इसके साथ साथ, धर्म-शास्त्रोंके भिन्न भिन्न विषयोंपर लिखे गये असंख्य प्रबंध हैं। जैसे "दत्तक" इस विषय पर ४० प्रबंध हैं। "गोत्र" इस विषय पर ३५ प्रबंध हैं। "दान" पर भी ४० हैं। ऊपर लिखे धर्म-सूत्र और स्मृतियोंपर भाष्यके अलावा काश्मीरसे कन्याकुमारी तकके सैकडो विद्वानोंने, उसके अलग अलग विषयोंको ले कर प्रबंधात्मक अनेक ग्रंथ लिखे हैं। कमलाकर भट्टने ई. स. १६१२ में लिखे हुए अपने निर्णय-सिंधु ग्रंथमें १०० स्मृति तथा ३०० प्रबंध और प्रबंध लेखकोंका उल्लेख किया है और इसके बाद भी अनेक प्रबंध लिखे गये हैं। ये सब भारतीय आचार-संहिताकी संपदा है जो हमें अब नव-निर्माणमें भी सहायता और प्रेरणा दे सकती है। धारणा—अष्टांगयोगका छठा अंग । पातंजल योगमें किसी विशिष्ट स्थान पर मनको स्थिर करनेकी क्रियाको धारणा कहा है। धारणामें चित्तको किसी विशिष्ट स्थान पर जकड कर रखना होता है । यह स्थान अपने अंतःसृष्टिका कोई स्थान हो सकता है, वैसे ही बाह्य सृष्टिका भी हो सकता है। योगीलोग अपने शरीरके भिन्न भिन्न चक्र-स्थानोंपर मनको स्थिर करनेका अभ्यास करते हैं । वैसे ही बाह्य सृष्टिकी किसी मूर्ति पर, इष्ट देवताकी मूर्ति पर, मन एकाग्र करते हैं। तंत्र मार्गमें पंचमहाभूतोंकी पांच देवताओं पर मन एकाग्र करनेका विधान कहा गया है तो भागवत पुराणमें अंतर्यामीपर केंद्रित करनेका विधान है। धारणा सिद्ध होनेके लिए हठ योगमें अनेक प्रकारकी मुद्राओंका विधान कहा गया है। धारणामें चित्तको इंद्रिय-जन्य भोगों परसे हटाकर किसी उदात्त स्थान पर स्थिर करना होता है । धारणासे ध्यान आसानीसे लगता है। धृति—निर्णायक शक्ति । धर्म, धृति, धारणा, धैर्य, धी आदि एक ही जातीके शब्द हैं जैसे नाम, नम्रता, नमस्कार हैं । जिससे किसी बातका निर्णय किया जाता है, निर्णयके बाद उस निर्णयको आचरणमें लाते समय उससे चिपका रहा जाता है, उसको धृति कहा जाता है । निर्णायक शक्ति, धारणाशक्ति, दृढतासे पकडे रहनेकी शक्ति, निर्णयको कार्यगत करते समय कार्यमें चालना देनेवाली बुद्धिका नियमन करनेवाली शक्ति, यह सब धृति शब्दके अंतर्गत आता है। ध्यान—अष्टांगयोगका सातवां अंग। ध्यानकी अंतिम स्थितिही समाधि है। ध्यानका अर्थ कहते समय पांतजल योग सूत्रमें "जहां धारणा करते हैं उस स्थानका-देवताका-अनुभव करना ही ध्यान" कहा है। साथ साथ सर्वदर्शन संग्रहमें "अन्य विषयोंकी चाह छोड कर ध्येय-वस्तुमें लीन होना ही ध्यान कहा है। केवल ध्येयबिंदुपर ही सदैव बुद्धिप्रवाह चलता रहे यह ध्यान है !" "सतत ब्रह्म चिंतन ही ध्यान है !" "राग विकारका विनाश ही ध्यान है!" भिन्न भिन्न दार्शनिकोंने ध्यानकी ऐसी व्याख्यायें की हैं जो परस्पर पूरक हैं। शरीरके जिस जिस स्थान पर धारणा करनी होती है उस स्थानकी देवता होती है। उस देवताके अनुभवमें लीन होना ध्यान है। धारणासे स्थिर बने हुए चित्तपर विशिष्ट हेतुका प्रवाह- सातत्य टिकाये रखनेकी क्रिया ध्यान है। मन जब ध्येयावेगमें लीन हो जाता है अन्य किसी विषयका स्पर्श नहीं होता, तब वह ध्यानस्थ बनता है। ध्यानमें दो प्रकारका ध्यान होता है। सगुण ध्यान तथा निर्गुण ध्यान। जैसे शरीरके षट्चक्रोंपर धारणा करते हैं वैसे षट्चक्रोंके देवताओंपर ध्यान किया जाता है। शरीरमें जो १५३ परिशिष्ट ५ (11)