भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1100, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1100

मणिपूरक चक्र है इसमें शंख चक्र गदा पद्मधारी नीलवर्ण प्रसन्न वदन विष्णुका ध्यान किया जाता है । हृदयकमलमें निर्वात दीपककी भांति जो ज्योति है उसमें अग्निका ध्यान किया जाता है । वैसे ही हृदयमें सूर्यका भी ध्यान किया जाता है । भ्रूमध्यमें आत्मदेवका ध्यान किया जाता है । अथवा मूर्तिमय स्थूल ध्यान, तेजोमय ज्योतिर्ध्यान तथा बिंदुमय सूक्ष्म ध्यान किया जाता है । ऊपरके सब प्रकार सगुणध्यानके हैं तो ज्योतिर्मय, शुद्ध कूटस्थ आनंदस्वरूप पर ब्रह्मका तादात्म्य भावसे ध्यान करना निर्गुणध्यान कहलाता है । ध्यानके ऐसे अनेक प्रकार हैं । किंतु इन सबमें महत्त्व है तादात्म्य होनेका । किसका ध्यान किया जाता है इससे अधिक जिसका जैसे भी ध्यान किया जाता है उसमें कितनी लीनता आती है, कितना तादात्म्य होता है, यह महत्त्वका है । ध्यानका अर्थ हृदयस्थकी मानस पूजा है जो तादात्म्य भावसे करनी होती है । ध्यान करते समय एक सूक्ष्म वस्तु लेकर उसकी मर्यादा विश्वव्यापी कर उससे तादात्म्य होना होता है । ध्यानसे सभी वासनाएँ शांत होती हैं । इंद्रियां निरपेक्ष होती हैं । साम्य वृत्तिका विकास होता है । राग द्वेषादि द्वंद्वोंके साथ अहंकार भी नष्ट होता है ।

नवद्वार देह, नवद्वार-पुर, नवद्वार नगर—आंखोंके दो द्वार, कानके दो द्वार, नाकके दो द्वार, मुख, गुदा, लिंगद्वार, इन नौ द्वारोंसे युक्त शरीरको नवद्वार देह, आदि कहा गया है । इसके अलावा एक दसवा द्वार है जो गुप्त है । कहा जाता है उसको योग-सामर्थ्यसे खोला जाता है । वह दसवां द्वार ब्रह्मरंध्र कहा जाता है । योगी अपने शरीर छोड़ते समय योग-शक्तिसे इस दसवें द्वारको खोल कर चैतन्यको उस रास्तेसे मुक्त करते हैं। इस मान्यताके कारण आज भी कहीं कहीं मठोंमें, मठपतियोंकी मृत्युके बाद उनको दफनानेसे पूर्व, शंखसे तालूमें प्रहार किया जाता है ! यह परंपरासी हो गई है । कहा जाता है कि योगी योग-सामर्थ्यसे इस ब्रह्मरंध्रसे ब्रह्मांडके किसी ज्ञानको-विषयको स्वयं अनुभव कर सकता है ।

नवरस—साहित्यशास्त्रमें शृंगार, वीर, करुणा, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स, रौद्र, तथा शांत ऐसे नौ रसोंको माना गया है । इसके स्थाई भाव हैं रती, उत्साह, शोक, विस्मय, आनंद, भय, जुगुप्सा, क्रोध और शम । इसके अलावा तुलसीदासजीने अकथित रस नामका एक नया रस भी माना है ।

नाथ-संप्रदाय—योगाभ्यासी शैव संप्रदाय । इसका आदि गुरु-शिव-आदिनाथ । इस लिये यह नाथ संप्रदाय कहलाता है । शिवत्व अथवा नाथत्व प्राप्ति इसकी अंतिम सिद्धि है । योग इसका साधन । आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गहनीनाथ, निवृत्तिनाथ, ज्ञाननाथ ज्ञानदेव-यह इनकी परंपरा है । कदलीबनके तांत्रिक योगिनियोंके जालमें फंसे मत्स्येंद्रनाथको सच्छिष्य गोरखनाथसे मुक्त करालाना इस संप्रदायके विकासका प्रारंभ है । इस समय अपने गुरुबोधसे च्युत गुरुको, उसकी मूल-पतनका रूप-बता कर " गुरुका उद्धार " करनेमें गोरखनाथने-- अपनी परमोच्च आध्यात्मिक शक्ति वैभवका परिचय दिया है । इनका वर्णन करते समय ज्ञानेश्वर महाराज लिखते हैं " योगाब्जजनी सरोवर । विषय विध्वंस एकैक वीर " ज्ञानदेवके इस वर्णनमें नाथ संप्रदायकी साधना और सिद्धीका पूर्ण बोध होता है । ज्ञानेश्वर महाराजका "अनुभवामृत" इस संप्रदायका सर्वोच्च सिद्धांत ग्रंथ है । वैसे तो गोरखनाथका संस्कृतग्रंथ "सिद्धसिद्धांतपद्धति" को इस संप्रदायका सिद्धांत ग्रंथ कहा जाता है। निरुपाधिक " शिवशक्ति " इस संप्रदायका अंतिम तत्व है । नाथपंथकी शक्ति शिवसे अभिन्न है । कपूर और उसकी सुगंधसी, गुड़ और उसकी मिठाससी,

ज्ञानेश्वरी १५४