ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
मणिपूरक चक्र है इसमें शंख चक्र गदा पद्मधारी नीलवर्ण प्रसन्न वदन विष्णुका ध्यान किया जाता है । हृदयकमलमें निर्वात दीपककी भांति जो ज्योति है उसमें अग्निका ध्यान किया जाता है । वैसे ही हृदयमें सूर्यका भी ध्यान किया जाता है । भ्रूमध्यमें आत्मदेवका ध्यान किया जाता है । अथवा मूर्तिमय स्थूल ध्यान, तेजोमय ज्योतिर्ध्यान तथा बिंदुमय सूक्ष्म ध्यान किया जाता है । ऊपरके सब प्रकार सगुणध्यानके हैं तो ज्योतिर्मय, शुद्ध कूटस्थ आनंदस्वरूप पर ब्रह्मका तादात्म्य भावसे ध्यान करना निर्गुणध्यान कहलाता है । ध्यानके ऐसे अनेक प्रकार हैं । किंतु इन सबमें महत्त्व है तादात्म्य होनेका । किसका ध्यान किया जाता है इससे अधिक जिसका जैसे भी ध्यान किया जाता है उसमें कितनी लीनता आती है, कितना तादात्म्य होता है, यह महत्त्वका है । ध्यानका अर्थ हृदयस्थकी मानस पूजा है जो तादात्म्य भावसे करनी होती है । ध्यान करते समय एक सूक्ष्म वस्तु लेकर उसकी मर्यादा विश्वव्यापी कर उससे तादात्म्य होना होता है । ध्यानसे सभी वासनाएँ शांत होती हैं । इंद्रियां निरपेक्ष होती हैं । साम्य वृत्तिका विकास होता है । राग द्वेषादि द्वंद्वोंके साथ अहंकार भी नष्ट होता है ।
नवद्वार देह, नवद्वार-पुर, नवद्वार नगर—आंखोंके दो द्वार, कानके दो द्वार, नाकके दो द्वार, मुख, गुदा, लिंगद्वार, इन नौ द्वारोंसे युक्त शरीरको नवद्वार देह, आदि कहा गया है । इसके अलावा एक दसवा द्वार है जो गुप्त है । कहा जाता है उसको योग-सामर्थ्यसे खोला जाता है । वह दसवां द्वार ब्रह्मरंध्र कहा जाता है । योगी अपने शरीर छोड़ते समय योग-शक्तिसे इस दसवें द्वारको खोल कर चैतन्यको उस रास्तेसे मुक्त करते हैं। इस मान्यताके कारण आज भी कहीं कहीं मठोंमें, मठपतियोंकी मृत्युके बाद उनको दफनानेसे पूर्व, शंखसे तालूमें प्रहार किया जाता है ! यह परंपरासी हो गई है । कहा जाता है कि योगी योग-सामर्थ्यसे इस ब्रह्मरंध्रसे ब्रह्मांडके किसी ज्ञानको-विषयको स्वयं अनुभव कर सकता है ।
नवरस—साहित्यशास्त्रमें शृंगार, वीर, करुणा, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स, रौद्र, तथा शांत ऐसे नौ रसोंको माना गया है । इसके स्थाई भाव हैं रती, उत्साह, शोक, विस्मय, आनंद, भय, जुगुप्सा, क्रोध और शम । इसके अलावा तुलसीदासजीने अकथित रस नामका एक नया रस भी माना है ।
नाथ-संप्रदाय—योगाभ्यासी शैव संप्रदाय । इसका आदि गुरु-शिव-आदिनाथ । इस लिये यह नाथ संप्रदाय कहलाता है । शिवत्व अथवा नाथत्व प्राप्ति इसकी अंतिम सिद्धि है । योग इसका साधन । आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गहनीनाथ, निवृत्तिनाथ, ज्ञाननाथ ज्ञानदेव-यह इनकी परंपरा है । कदलीबनके तांत्रिक योगिनियोंके जालमें फंसे मत्स्येंद्रनाथको सच्छिष्य गोरखनाथसे मुक्त करालाना इस संप्रदायके विकासका प्रारंभ है । इस समय अपने गुरुबोधसे च्युत गुरुको, उसकी मूल-पतनका रूप-बता कर " गुरुका उद्धार " करनेमें गोरखनाथने-- अपनी परमोच्च आध्यात्मिक शक्ति वैभवका परिचय दिया है । इनका वर्णन करते समय ज्ञानेश्वर महाराज लिखते हैं " योगाब्जजनी सरोवर । विषय विध्वंस एकैक वीर " ज्ञानदेवके इस वर्णनमें नाथ संप्रदायकी साधना और सिद्धीका पूर्ण बोध होता है । ज्ञानेश्वर महाराजका "अनुभवामृत" इस संप्रदायका सर्वोच्च सिद्धांत ग्रंथ है । वैसे तो गोरखनाथका संस्कृतग्रंथ "सिद्धसिद्धांतपद्धति" को इस संप्रदायका सिद्धांत ग्रंथ कहा जाता है। निरुपाधिक " शिवशक्ति " इस संप्रदायका अंतिम तत्व है । नाथपंथकी शक्ति शिवसे अभिन्न है । कपूर और उसकी सुगंधसी, गुड़ और उसकी मिठाससी,
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सोना और उसके सुवर्ण-सी !! इसी शिवशक्तिका स्फुरण ही विश्व है। जैसे दो आँखें एक ही दृश्य देखती हैं, दो कान एक ही ध्वनि सुनते हैं, दो होंठ एकही शब्द बोलते हैं, दो पैर एकही गंतव्यकी ओर चलते हैं वैसे शिव-शक्ति ऐसे दो नामोंसे पहचाने जानेवाली तत्त्वकी क्रिया है ! यह विश्वचक्र शिव-शक्तिकी आत्मरति है। इसका अनुभव ही अमृतानुभव अथवा जीवन मुक्तावस्था है । इस अनुभवको अनुभवनेका साधन योग है। यह हठयोग है। राजयोग है। पूर्णयोग है। इस संप्रदायमें अपने तत्त्वज्ञानके साथ आचारधर्मका भी विचार किया है। इस संप्रदायका अपना ही नीतिशास्त्र है। यह गुरुमार्गी संप्रदाय है। गुरुवचन ही इसका शास्त्र है। गुरुको "सन्मार्ग दिखानेमें कुशल" माना गया है। इनका गुरु "न होनेकासा रहता है !" "वह पानीमें घुलेगये नमकका-सा" रहता है। वह "ज्ञानाज्ञानसे परे" रहता है! इस संप्रदायके विषयमें अनेक लोगोंने खोजपूर्ण अनेक ग्रंथ लिखे हैं किंतु ज्ञानेश्वरका "अनुभवामृत" अमृततम ग्रंथ है जिस पर अबतक ४५ लोगोंने टीका लिखी हैं! यह महान् ग्रंथ प्राचीन मराठीमें है। नास्तिक—जो, परलोक, उसका साधन, अदृष्ट, उसका साक्षीभूत ईश्वर, इन बातोंको नहीं मानता वह नास्तिक कहलाता है। पाणिनीने कहा है "जो परलोक नहीं मानता वह नास्तिक है।” मनूने “नास्तिक है वेद निंदक" ऐसा नास्तिक शब्दका अर्थ किया है। अर्थात् "जो वेदको नहीं मानता वह नास्तिक" कहनेसे "जैन बौद्ध, लोकायतमतके लोग नास्तिक" बनते हैं। "परलोक और मृत्युके बादकी व्यवस्था न माननेवाले नास्तिक" कहनेसे "चार्वाकानुयायी" नास्तिक कहलाते हैं। "ईश्वर न माननेवाले नास्तिक" कहनेसे “भौतिकवादी, संदेहवादी, प्रत्यक्षवादी आदि सब नास्तिक कहे जा सकते हैं। किंतु भारतीय दर्शनकी दृष्टिसे "वेदनिंदक ही" नास्तिक हैं। अनीश्वरवादी, सांख्य नास्तिक नहीं कहाते । वेदमें देवताओंको न माननेवालोंका उल्लेख है । देवता और ईश्वर एक होनेकी कल्पना उपनिषदमें देखनेको मिलती है। सांख्य तथा कर्मकांडी पूर्व मीमांसकोंको ईश्वरकी आवश्यकता नहीं लगती । भारतके कई दार्शनिकोंने अनेक उदाहरणोंसे यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि विश्व स्वाधिष्ठित है तथा वह अपनेमें पूर्ण है इस लिए ईश्वरकी कोई आवश्यकता नहीं है। वेदका प्रमाण न माननेवाले चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि दार्श- निकोंको ईश्वरका अस्तित्व स्वीकार नहीं है। चार्वाक कहता है । "ईश्वरका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता इसलिये उसका अस्तित्व नहीं है।” जैन कहते हैं “यह विश्व सृष्ट न होनेसे किसी सृष्टिकर्ताकी आवश्यकता नहीं" और बुद्ध कहते हैं “ईश्वर विषयक सभी प्रकारकी जिज्ञासावें व्यर्थ है !" उपनिषदोंके एक महान ऋषि "वेद प्रमाण न मानना एक महान पातक मानते हैं। गौतम उनको पतितोंमें गिनते हैं। इन सभी बातोंको ध्यानमें रख कर यही ठीक लगता है कि मनूका “वेद निंदक नास्तिक" सिद्धांत सही है ! नित्य-नैमित्तिक कर्म—वेदके विद्वानोंने उसके दो कांड कहे हैं। (१) कर्मकांड (२) ज्ञानकांड । कर्मकांडके दो प्रकारके कर्म हैं। (१) नित्यकर्म और (२) नैमित्तिककर्म । नित्यकर्म करना ही है। वह कर्म करनेसे कोई पुण्य नहीं है किंतु न करनेसे पाप अवश्य है। नित्यकर्म करनेसे अधिकसे अधिक चित्तशुद्धि होती है। जैसे ब्राह्मणके लिये, संध्या, गायत्रीजप, ब्रह्मयज्ञ, आदि नित्यकर्म हैं। दिनके आठ प्रहरोंमें प्रत्येक प्रहरको कोई न कोई नित्य कर्म है। जैसे प्रातः स्मरण, शौचादि विधि, स्वाध्याय, पंचमहायज्ञ, भोजन, अध्ययन, लोक-सेवाकार्य ऐसे ये सब ब्राह्मणके नित्य कर्म हैं। यदि ये नित्य कर्म कोई नहीं करता है तो वह पाप-भागी बनता है। १५५ परिशिष्ट ५.
इनको छोड़ कर कुछ नैमित्तिक कर्म भी होते हैं। ये काम्य और निष्काम ऐसे दो प्रकारके होते हैं । समय समय पर यज्ञादि करना । किसी उद्देश्यसे यज्ञ, व्रत, शांति आदि करना काम्य नैमित्तिक कर्म हैं और श्राद्ध, ग्रहणमें स्नानादि निष्काम नैमित्तिक कर्म है। मनुष्यको अपने अपने अधिकारानुसार नैमित्तिक कर्म भी करना चाहिए । किंतु ये नहीं करनेसे पाप नहीं है। निद्रा—इस शब्दका अर्थ कहते समय पुराने ग्रंथोंमें मेध्या नामकी नाडी तथा मनका संबंध आनेसे निद्रावस्था आती है ऐसा लिखा है । उपनिषदोंमें स्थान स्थान पर जो निद्राकी व्याख्या की है वह आधुनिक शरीर शास्त्रके श्रमवादसे सम्मत ही है । "जैसे गीध पंख खोल कर आकाशमें उड़ते उड़ते थक जाता है तब विश्रांतिके लिये अपने घोसलेमें आता है वैसे थका हुवा जीव नींदका आश्रय करता है।" "सभी इंद्रियां मनमें जब लय होती हैं तब नींद आती है !" "मन प्रकाश सागरमें डूब जानेसे नींद आती है।" "जब मनुष्यको गहरी नींद आती है तब स्वप्न नहीं पडते तब आत्मा अपनी नाडीमें लीन होता है !" प्राचीन ऋषियोंकी मान्यताके अनुसार मनुष्यके शरीरमें पुरीतत नाडीकी ओर बहनेवाली ७२००० रक्तनलिकाएँ हैं। जीव जब इन रक्तनलिकाओंसे पुरीतत नाडीमें आता है तब मनुष्यको नींद आती है। जीव जब इस नाडीमें प्रवेश करता है तथा इस नाडीसे बाहर आने लगता है वह स्वप्नावस्था है। तथा जब जीव हृदय और पुरीतत नाडीमें भ्रमण करता रहता है वह जागृतावस्था है। छांदोग्य उपनिषदमें ऐसा भी कहा गया है कि "मन जब श्वासोच्छ्वासमें लीन होता है तब नींद आती है। इंद्रियोंको निद्रासे विश्रांति मिलती है क्यों कि निद्रामें इंद्रियोंको विषयोंका भान नहीं रहता । निद्राको मृत्युका छोटा भाई माना गया है। निद्रा लघु मृत्यु है और मृत्यु दीर्घ-निद्रा ! नियम—यह अष्टांग-योगका दूसरा अंग है । (१) शौच (२) संतोष (३) तप (४) स्वाध्याय (५) ईश्वरप्रणिधान ये नियम हैं । (१) शरीर और मन स्वच्छ रखना शौच है । शरीर अथवा मन यदि अस्वच्छ होगा तो चित्तवृत्तियोंका निरोध नहीं होगा । मन एकाग्र नहीं होगा। इसलिये साधकको स्नान आदिसे शरीर स्वच्छ रखना चाहिए । सभी मलद्वार स्वच्छ रखने चाहिए। सभी इंद्रिय स्वच्छ रखने चाहिए । मलिन स्थान मलिन व्यक्ति आदिका संपर्क छोड़ना चाहिए । यह सब देश काल परिस्थितिका विचार करके करना चाहिए । शरीर शुद्धीका ही एक रोग न हो जावे । नहीं तो उपाय अपाय होगा। वैसे ही चित्तको रजतमसे दूर रखनेका प्रयास करना चाहिए। रज तम मूलक वृत्तियां मनको उद्विग्न करती हैं। मनमें काम क्रोध लोभ आदि विकारोंको पैदा करती हैं । सत्संग, सद्ग्रंथवाचन, तथा विवेकसे मनको शुद्ध रखना भी शौच है। (२) जिस समय जो मिलता है उसीसे जो हित हो सकता है वह कुशलता पूर्वक साध कर मनको प्रसन्न रखना संतोष है । अतृप्तिसे संताप और संतापसे उद्विग्नताकी परंपरा प्रारंभ होती हैं। रजके कारण उत्पन्न होनेवाली काम क्रोधादि उद्विग्नताएं, अथवा तमके कारण उठनेवाली आलस प्रमादादि वृत्तियोंसे मन मलिन होता है । इसलिय् हित मित आहार विहार, सत्संगति, सद्ग्रंथोंका अध्ययन आदिसे मनको प्रसन्न रखना चाहिए । मनकी यह प्रसन्नता ही संतोष है । संतोषसे चित्त आसानीसे एकाग्र होता हैं । ज्ञानेश्वरी १५६
(३-४) तप और स्वाध्याय, समाधिके अभ्यासके लिये आवश्यक अभ्यासमें अवरोध करनेवाले क्लेशादि विकार तप स्वाध्यायसे दूर होते हैं। इन अवरोधोंसे जो चित्त पुनः पुनः बहिर्मुख होता है उसको अंतर्मुख करनेमें सहायता मिलती है। चित्तके पुनः पुनः बहिर्मुख होनेसे इंद्रियां विषयोंकी ओर खिंचती हैं और चित्त चंचल होता है। इससे अविद्या, क्लेश आदि बढ़ते हैं। अर्थात् चित्तको सदैव प्रसन्न रखनेके लिये, चित्तकी बहिर्मुख होनेकी प्रवृत्ति रोकनेके लिये, तप तथा स्वाध्यायकी आवश्यकता है। इसमें तपसे मनका मालिन्य नष्ट होता है और स्वाध्याय (सद्ग्रंथोंका पठन और जपादि नामस्मरण) से सत्त्व गुणकी वृद्धि होती है। और (५) इनसे भी जो शुभाशुभ संस्कार बचे रहते हैं उनको ईश्वरार्पण करनेसे अविद्यामूलक अहंता ममतादि भाव नष्ट होकर चित्तप्रसन्नताकी स्थिति सहज होती है। निर्गुण-सगुण उपासना—इस सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके पहले एक ही एक आत्मतत्व विद्यमान था। उसको आगे अनेक होनेकी इच्छा हुई। परिणाम स्वरूप यह विविध-रूप सृष्टि हुई। यह वेदांतका प्रसिद्ध और प्रमुख सिद्धांत है। इस सृष्टिके पहले जो एक ही एक आत्म-तत्व था वह अव्यक्त था। निर्गुण था। वह एक ही एक आत्मतत्व अनादि, अनंत, सीमातीत और सर्वव्यापी है। वह निरंतर है। अखंड है। स्वतंत्र और सर्वज्ञ है। वही सृष्टिकी उत्पत्ति स्थिति और लयका कारण है। यह सारी सृष्टि उसीमेंसे निर्माण हो कर उसीमें लय होती है। जिससे यह सारी सृष्टि उत्पन्न होकर उसीमें लय होती है उसे ब्रह्म कहा गया है। उस निर्गुण ब्रह्मसे यह सगुण सृष्टि उत्पन्न हुई है। उपासनाका अर्थ पास जा बैठना। चिंतन, मनन, स्मरण, ध्यान आदिके द्वारा परमात्माके पास जाना, वहीं स्थिर रहना आदिके लिये कोई साधन लगता है। किसी रूपकी आवश्यकता होती है। कोई आधार चाहिए। बिना इसके चिंतन मननादिकी क्रिया ठीक नहीं होती। यह जानकर इस विद्याके आचार्योंने अव्यक्तकी उपासनाके लिये व्यक्त अथवा सगुणकी कल्पना की। परमारथमें कल्पित ये सब गुण उपासककी योग्यतानुसार कम अधिक प्रमाणमें सात्विक होते हैं। उपनिषदमें भी ऐसे कई सगुण वर्णन किये हैं। "वह परमात्मा उत्तम पुरुष है।" "वह सभी भूतोंका अधिपति है!" "वह विश्वकी आंखें विश्वका मुख, विश्वके बाहू और विश्वके पैर है।" ये सारे विविध रूप उपासनाके लिये विविध प्रतीक हैं। वस्तुतः वे गौण हैं। परब्रह्म सगुण नहीं है। वह दर्शन श्रवण स्पर्शादिकी सीमाओंमें आनेवाला नहीं है। वह सच्चिदानंद स्वरूप है। किंतु वह नेति नेति परब्रह्म उपासनाके लिये इति इति हुआ। उपासनाके लिये प्रथम सगुण, फिर सगुण-निर्गुण उसके बाद संपूर्ण निर्गुण ऐसी व्यवस्था है। यह गुणोंसे निर्गुणों की ओर जानेकी प्रक्रिया है। इस विश्वके अलग अलग वस्तुओंके भिन्न भिन्न रूप ही उनका दिया हुआ भिन्न भिन्न नाम है। यह सारा विश्व नामरूपात्मक है। ये सब हर क्षण बदलते रहते हैं किंतु इन सबके मूलमें कभी न बदलनेवाला तत्त्व रहता है। वही तत्त्व सत्य है। इस सत्यके अथवा परमात्माके दो रूप हैं। एक इंद्रियोंसे समझे आकलन है। इसको व्यक्त अथवा सगुण कहते हैं। दूसरा इंद्रियां ही नहीं मन और बुद्धि भी आकलन नहीं कर सकती। उसे अव्यक्त अथवा निर्गुण कहते हैं। उपासनाके लिये जो चिंतन, मनन, ध्यान आदि करना पड़ता है जिसकी भक्ति करनी पड़ती है वह अनाकलनीय होके कैसे चलेगा? इसलिये "वह बिना आंखसे सब कुछ देखनेवाला, १५७ परिशिष्ट ५
बिना कानके सब कुछ सुननेवाला, बिना पैरके सबके आगे दौड़नेवाला, खड़े खड़े दौड़नेवालोंसे भी आगे पहुंचने वाला ब्रह्म विश्वतश्चक्षु, विश्वतोमुख, विश्वतो बाहु और विश्वतो पाद् हुआ !" "यह नहीं वह नहीं" (नेति नेति) वाला परब्रह्म "यही यही" सर्वव्यापी हो गया । अणारमक परब्रह्म अनात्मक ईश्वर बनकर ध्यान धारणा चिंतन मननका साधन बना । इसलिये सगुण निर्गुण दो भेद चल पड़े । उपासनाके भी सगुणोपासना और निर्गुणोपासना ऐसे भेद हुए । उपासकके स्वभावानुसार अथवा सामर्थ्यानुसार उसके अनेक रूप बने । सगुण प्रारंभ है और निर्गुण अंतिम स्थान । इसलिये सबने सगुणका पुरस्कार किया । चलने लगे तो मंजिल पर पहुंच ही जायेंगे । जितना जल्द चालसे चले उतना जल्दी । सगुण उपासना, जहांसे चलना है वह स्थान है और निर्गुण जहां पहुंचना है वह स्थान । चलना छोड़ कर पहुंचना असंभव । इसलिये चिंतन, मनन, ध्यान भक्ति आदिका पहला कदम सगुणोपासना है जो सभी आचार्य और संतोंद्वारा इतना ही नहीं उपनिषदोंके ऋषियों द्वारा भी पुरस्कृत है । निवृत्ति—जीवनके दो अंग हैं । अभ्युदय-निःश्रेयस, प्रेय-श्रेय, प्रवृत्ति-निवृत्ति । अभ्युदय, प्रेय तथा प्रवृत्ति वासना पूर्तिजन्य सुख प्राप्तिकी साधना है । प्रापंचिक वैभवकी साधना है । और निवृत्ति श्रेय तथा निःश्रेयस वासना-विलोपजन्य सुखकी साधना । वासनाका अस्तित्व ही दुःख है और वासनाका अभाव ही सुख । दुःखके कारणीभूत वासनाका लय करना शाश्वत तथा निरालंब सुखका मूल होनेसे वासना विलयके लिये निवृत्तिमार्ग कहा गया है । निवृत्तिमार्गमें सबसे प्रथम मनसे बाह्य इंद्रियोंके व्यापार संयमित किये जाते हैं । इंद्रियोंको निरपेक्ष किया जाता है । फिर मनको संपूर्ण रूपसे बुद्धिमैं लीन करके मनोलय किया जाता है । उसके बाद बुद्धिको पूर्णरूपसे आत्मलीन किया जाता है । बुद्धिके आत्मलीन होनेके बाद आत्माकी सर्व-व्यापकताका पूर्णत्वका अनुभव होने लगता है । अपूर्णताके अनुभवसे वासनाका जो उदय होता है वह पूर्णत्वके अनुभवसे नष्ट होता है । यह वासना विलयजन्य सुख ही शाश्वत सुख है । निरालंब सुख है । अपनेमें आपनेसे आप अनुभव किया जानेवाला सुख है । इस लिये निवृत्ति जन्य सुख सर्वश्रेष्ठ सुख माना गया है । यही जीवकी जीवन्मुक्तावस्था है । निष्काम कर्म—वासना रहित कर्म । जिस कर्ममें कर्म फलकी कोई आशा नहीं वैसा कर्म । मानवी मन अनेक वासनाओंसे भरा रहता है । वासनाओंका खेल अतर्क्य होता है । बिना वासनाके कोई फल भोग नहीं होता । वैसे ही कोई भी कर्म-फल आकस्मिक नहीं होता । पूर्व जन्मकी फलवासनाओंसे पुनर्जन्म मिलता है । जैसे मनुष्य होकर भी बार बार पशुयोनिके अनु- सार कर्म करनेसे उन्हीं वासनाओंके परिणामस्वरूप मनुष्य पशु-योनिमें जाता है । इसीलिये वासना रहित कर्मका महत्व कहा गया है । गीतामें निष्काम कर्मका बड़ा महत्व गाया गया है । वासनाएं अनादि कालसे जन्मजन्मांतरसे-चली आती हैं । योग वासना विलोपकी साधना है । कर्म करते समय फलाशासे कर्म करना तथा कृष्णार्पण भावसे कर्म करना वासना विलोपकी साधना है । वासना विलोपसे-वासनाके अभावमें-शाश्वत सुखका अनुभव होता है तथा ऐसे किया हुवा कर्म पुनः वासनाको जन्म नहीं देता जैसे जला हुवा बीज नहीं फलता । पंचकोश—मनुष्य, पंचतत्त्व, पंचकोश, पंचप्राण, पांच शक्तियां, पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां आदिसे बना है । उनमेंसे पांच कोश हैं ( १ ) अन्नमयकोश ( २ ) प्राणमयकोश ( ३ ) ज्ञानेश्वरी १५८
मनोमयकोश (४) विज्ञानमयकोश (५) तथा आनंदमयकोश । कोशका अर्थ आवरण है । थैला है । जीव इस थैलेसे लिपटा गया है। इसका वर्णन करते समय कहा गया है कि माता पिताके द्वारा लाये गये अन्नसे जो रज वीर्य बनता है उससे मानवी देह बनता है और वह अन्न पर ही जीता है इसलिये वह अन्नमय कोश है । यह आत्मासे भिन्न है क्यों देहकी उत्पत्ति होनेके पूर्व और मृत्युके बाद उसका अभाव होता है। संपूर्ण देहको बल देनेवाला, इंद्रियोंको प्रेरणादेनेवाला जो व्यान- नामका प्राण है वही प्राणमयकोश है। देहको मैं कहनेवाला अहंता ममतादिसे भ्रांत होनेवाला वह मनोमयकोश है । चैतन्याभाससे युक्त जो बुद्धि है जो सुप्तावस्थामें लय होकर जागृतावस्था शरीरमें व्याप्त रहती है वह विज्ञानमयकोश कहलाती है । सुखका अनुभव लेते समय अंतःकरणकी वृत्ति अंतर्मुख होती है । इस लिये अंतःकरणमें आत्मस्वरूपका प्रतिबिंब उठता है। वही वृत्ति पुण्यकर्मका फलभोग शांत होनेसे निद्रामें लीन होती है। इस अंतर्मुख वृत्तिका आनंदमय कोश बनता है । ये सभी कोश चैतन्य पर आवरण मात्र है। ये ही चैतन्य नहीं है। मृत्युके बाद जीव इन सभी कोशोंको पार करता है । जीव अन्नमय कोशको त्याग कर प्राणमय कोशमें, प्राणमयकोशको त्याग कर मनोमय कोशसे प्रज्ञालोकमें विचरण करता है। फिर वह मनोमय कोशको भी छोड़कर अपने जीवलोकमें जाकर पुनः जन्म लेनेके लिये आवश्यक वातावरण तथा शरीरादिको एकत्र करने लगता है । इसीसे पुनर्जन्मके लिये आवश्यक परिस्थिति निर्माण होती है । अन्नमयकोश—पंचकोशमेंसे एक कोश । शरीर पंचभूतोंसे बना है । पंचभूतोंसे बने शरीरके प्रत्येक अंश शरीरपातके बाद अपने मूलरूपको पाता है । इस स्थूल शरीरको अन्नमय कोश कहा गया है । क्यों कि अन्नसे इसका पोषण होता है। जागृतावस्थामें जीव इस कोशमें रहता है । यह स्थूल शरीर चार प्रकारके होते हैं । बीज और मिट्टीसे पैदा होनेवाले-वृक्ष लतादि- उद्बीज कहलाते हैं। पसीने गर्मी ठंडीसे निकले हुए जीव मसक जूं, आदि वैसे ही अंडोंसे निकलनेवाले परिंद, साप आदि अंडज कहलाते हैं । और जारज जैसे मनुष्य पशु आदि । ये चारों प्रकारके स्थूलशरीर अन्न पर आश्रित हैं इसलिये इसे अन्नमय कोश कहा गया है । प्राणमयकोश—पांच कर्मेंद्रियोंके साथ पांच प्राणोके संयोगसे जो एक वलयसा बन जाता है वह प्राणमयकोश कहलाता है । यह कोश चैतन्यपर आवरण डालता है। इस प्राणमयकोशमें क्रियाशक्तिका प्राधान्य है । यह क्रियाशक्ति कार्यके रूपमें हमारे सम्मुख उपस्थित होती है । हमारी सारी क्रियायें अथवा कर्म इसी क्रिया शक्तिका परिणाम है । मनोमयकोश—जैसे कर्मेंद्रिय और पंचप्राणोंको मिला कर प्राणमयकोश निर्माण होता है वैसे पांच ज्ञानेंद्रिय और मनको मिला कर मनोमयकोश निर्माण होता है । यह कोश प्राणमय कोशसे अधिक सूक्ष्म होता है । अधिक चैतन्यशाली होता है । मनुष्यके सारे संकल्प विकल्प इसी कोश पर आधारित होते हैं। आकाशादि भूतोंमेंसे प्रत्येकमें तीन गुण होते हैं। उनमें जो सात्विक अंश होता है उस सात्विक अंशसे ज्ञानेंद्रिय बनती है । जैसे आकाशके सात्विक अंशसे कान बनते हैं। शब्द उसका विषय है । वायुके सात्विक अंशसे त्वक् बनती है जिसका विषय स्पर्श है । तेजसके सात्विक अंशसे चक्षु है रूप इनका विषय है । आपके सात्विक अंशसे रसना बनती है । रस इसका विषय है। और पृथ्वीके सात्विक अंशसे घ्राणेंद्रिय बनती है जिसका विषय गंध है । इन सबका मनसे संयोग होकर जो वलय बनता है वह मनोमय कोश है १५९ परिशिष्ट ५
विज्ञानमयकोश—आकाशादि पंचमहाभूतोंकी सामूहिक सात्विक अंशोंसे निश्चया- त्मक अंतःकरणकी बुद्धि शक्ति, संकल्प विकल्पात्मक मनःशक्ति, अनुसंधानात्मक अंतःकरणकी चित्तशक्ति, अभिमानात्मक अंतःकरणकी अहंशक्ति तथा पांच ज्ञानेंद्रियोंसे सम्मिलित तत्त्वसे विज्ञानमय कोश बनता है जो चैतन्यपर आवरण डालता है । विज्ञानमय कोशसे घिरा हुवा चैतन्य “जीव” कहलाता है। यही लोक परलोक भोगता है। चैतन्यके प्रतिबिंबसे विज्ञानमय कोशमें जो क्रियायें होतीं हैं इसीसे जीव कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी आदिका अनुभव करता है। यही संसारमें रहकर भोगता और जन्म मरणका अनुभव करता है। यही जीवकी बद्धावस्था है। नहीं तो चैतन्य सदैव मुक्त है। निःष्कल और निष्क्रिय है। आनंदमयकोश—ईश्वरने अपनी लीलाके लिये-खेलके लिये-बिना किसी प्रयोजनके सृष्टि- रचना की है। इस समस्त विश्वका “कारण शरीर” ईश्वर है। इस कारण अवस्थामें माया और ब्रह्मके अलावा दूसरा कोई प्रपंच नहीं रहता इसीलिये यह आनंदमय अवस्था है। आनंदमय अवस्थाका यह “कारण शरीर” व्यक्ति देहमें चैतन्यको घेरा रहता है इसको आनंदमय कोश कहते हैं। जब सारा प्रपंच लय होता है तब चैतन्य इसी कोशमें शांत रहता है। इसीलिये इसको सुषुप्ति भी कहते हैं। इस सुषुप्ति अवस्थामें केवल आनंद रहता है। मन, इंद्रियां, इंद्रियोंके विषय आदि नहीं होते। इस समय, स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरका लय होता है और केवल चैतन्य आनंदमय अवस्थामें रहता है। पंचतत्त्व-या पंचमहाभूत—पृथ्वी, आप, तेज, वायू और आकाश इनको पंचतत्त्व अथवा पंचमहाभूत कहते हैं। इसीसे सारी भौतिक सृष्टि बनी है। प्रत्येक भौतिक पदार्थमें इन पंच तत्त्वोंमेंसे प्रत्येक तत्त्वका अंश रहता है। चार्वाकदर्शन चार तत्त्व मानता है। वह आकाश तत्त्वको नहीं मानता। क्यों कि वह इंद्रियगम्य नहीं है। सांख्यमतसे अहंकारके तामसिक अंशसे शब्द तन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा तथा गंधतन्मात्राएं बनी। अहंकारका तामस इन सबमें अलग अलग समान रूपसे विद्यमान है किंतु ये आपसमें मिले हुए नहीं है। इसीलिये इनसे होनेवाली सृष्टि भी अलग अलग है। शब्द तन्मात्रासे आकाशकी सृष्टि हुई। स्पर्शसे वायू, रूपसे तेजस् रससे जल तथा गंधसे पृथ्विकी सृष्टि हुई है। ये भूतसृष्टि-रचनाके स्थूलतम पदार्थ हैं। अर्थात् शब्दादि सूक्ष्म तत्त्व या भूत हैं जिससे पृथिव्यादि स्थूल तत्त्वोंकी सृष्टि हुई है। न्याय और वैशेषिक मतके अनुसार आकाश नित्य और व्यापक है। पृथ्वी—पंच महाभूतोंमें अथवा पंचतत्त्वोंमें पहला तत्व । शब्दार्थकी दृष्टिसे “जिसका विस्तार होता जाता है” ऐसा इसका अर्थ है। इसका वर्णन करते समय कहा गया हैं “गंध इसका गुण है। इसमें छ प्रकारका रस हैं। यह नित्य और अनित्य दो प्रकारकी हैं। इसका “अणुरूप नित्य” है। अन्य रूप अनित्य । शरीर, इंद्रिय तथा उसके विषय ये पृथ्वीके तीन रूप हैं। चार प्रकारके प्राणि इसके शरीर हैं। प्राण इसके इंद्रिय रूप हैं। अणुसे ब्रह्मांड तक सब इसके विषयोंका रूप हैं। ब्राह्मण ग्रंथोंमें पृथ्वी को “सर्व-भूतोंमें प्रथम जन्म पानेवाली” ऐसा कहा गया हैं। कहा गया हैं कि पहले इसे “वायु उडा ले जाता था!” “प्रजापतिने तपसे इसके फेन, सूखी मिट्टी, पत्थर, बालू, मोटी बालू-कंकड-शिलाखंड मोठे पत्थर लोहा सोना और औषधी ऐसे नौ प्रकार बनाये। ज्ञानेश्वरी ३६०
ऋग्वेदमें पृथ्वीकी प्रार्थना करनेवाले कई सूक्त हैं। उनमें "पृथ्वी तू हमसे प्रसन्न हो । तू किसीका अहित नहीं करती । अपनी गोदमें तू सबको समा लेती है । तू हमको सुख दे !" इस प्रकारकी प्रार्थनाए हैं। शतपथ ब्राह्मणमें पृथ्वीको "अग्निगर्भा" कहा गया है । उसमें कहा गया है कि माता जैसे संतानको अपने गर्भमें धारण करती है वैसे पृथ्वीने अग्निको अपने गर्भमें धारण किया है ! पृथ्वीका वर्णन करते समय शतपथ ब्राह्मणमें "पृथ्वी परिमंडल रूप-गोल-अपने ही चारों ओर घूमने वाली वातावरण धारण करनेवाली है !" ऐसे भी कहा गया है। इस पृथ्वीकी उत्पत्तिकी अनेक कथाएं अलग अलग पुराणग्रंथोंमें तथा ब्राह्मण ग्रंथोंमें हैं। पृथ्वीके रूपका वर्णन करते समय पृथ्वी मंडलके चारों ओर बना जल है उसके चारों ओर घनी उष्णता-तेजस्-है तथा चारो ओरसे ऊपरकी ओर बहनेवाला-ऊर्ध्व-टेढा वायु है ऐसे कहा गया है। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिसे पृथ्वी सूर्य-मंडलमें घूमनेवाला तीसरा ग्रह है। चंद्र पृथ्वीका उपग्रह है । चंद्रके प्रभावसे पृथ्वीपर समुद्रमें तूफान आता है। पृथ्वी नारंगी जैसे गोल है। पृथ्वी पर जो असमानता है-नीचे ऊपर-वह नहींके बराबर ही मानना चाहिए । पृथ्वी पर जो ऊंचा भाग है वह २९ हजार फूट ऊंचा है, वैसे ही गढ़ा-घाटी-करीब ३६।।-हजार फूट है। इसका विस्तार १९ करोड ७० लाख वर्ग मील है। इसमेंसे ७०-७१ प्रतिशत भाग पानीमें है। स्थलमंडल, जलमंडल तथा वायुमंडल इन तीन मंडलोंसे यह बनी है। वायुमंडल, स्थलमंडल और जलमंडलको घिरा हुआ है। इस वायुमंडलमें ९९ प्रतिशत नाइट्रोजन और १ प्रतिशत प्राणवायू है। पृथ्वीकी आयुके विषयमें वैज्ञानिकोंमें जो अनेक मतभेद हैं उस परसे कह सकते हैं कि इसकी आयू १८० करोड वर्षोंसे ३०० करोड वर्षकी है। पुराणोंके मतसे इसकी आयू करीब २२० करोड वर्षकी है। प्राचीन भारतीय संस्कृतिमें-सिंधुसंस्कृतिमें-पृथ्वीकी पूजा होती थी। पता नहीं कबसे पृथ्वी-पूजा रुक गयी है। अथर्ववेदमें कहा गया "ऋत, सत्य, उग्रक्षात्रतेज, दीक्षा, तप, तथा ज्ञान इस पृथ्वीको धारण करते हैं। यह भूत भविष्यका पालन करनेवाली है। पृथ्वी हमें विशाल कार्य-क्षेत्र दें।" अथर्वऋषि "पृथ्वीको माता और मानवको उसका पुत्र" मानते हैं। वे गाते हैं पृथ्वीमें अमृत भरा है। वह विश्वंभरा है। जो ज्ञानी है, जिसके पास वाक्शक्ति है, वही=पृथ्वीका हृदय जानता है। ऐसे ही मनुष्यके सम्मुख वह अपना अमररूप प्रकट करती है। पृथ्वीकी उपासना करनेसे मनुष्यको अनेक वरदान मिलेंगे। उसमेंसे अनेक प्रकारकी वीर्यवान् औषधियां उत्पन्न होती हैं जो मनुष्यको पुष्ट करती हैं। जिसका हृदय, प्रेम, सत्य और अमृतसे भरा है। वह पृथ्वी हमारे राष्ट्रको और हमको बल और तेज दें!" आप-ऋग्वेदमें "माता जैसी क्षम्य देती है वैसी उत्तम नीर देनेवाले" आपो देवताका वर्णन है। उसके बाद उपनिषदोंमें विश्वरचनाकी बात कहते समय तज्जलान् कहते हुए जलसे पृथ्वीका निर्माण हुआ ऐसा कहा गया है। सभी शास्त्र और पुराणोंमें "पृथ्वी जलसे उत्पन्न हुई" कहते हुए "यह जलमें ही डूब जायेगी !" कहा है। इसे प्रलय कहते हैं। किंतु आगे यह जल वायुसे सूख जाता है वायु आकाशमें लीन होता है ऐसा प्रलयका वर्णन आता है। न्यायदर्शनमें १६१ परिशिष्ट ५
" आप शांतिस्पर्श-शीतल होता है। वह दो प्रकारका होता है। एक नित्य दूसरा अनित्य । नित्य आप परमाणुरूप होता है । अनित्य आप कार्य रूप होता है। शीतल स्पर्श केवल जल-तत्वकाही होनेसे जहां कहीं शीतलताका बोध होता है वहां सब जल तत्वका अस्तित्व मान लेना ! भारतीय तत्त्वज्ञोंकी भांति ग्रीक तत्त्वज्ञों में भी कुछ लोग “सभी जलसे निर्माण होकर जलमें लीन होता हैं !” कहते हैं। प्राणि, वनस्पति, आदिमें जहां आर्द्रता रहती है वह जलतत्त्वके कारण है । तेज—पंच महाभूतोंमें, तीसरा, जिसका स्पर्श उष्ण है उसको तेज कहा गया है। शब्द, स्पर्श, रूप यह उसके धर्म हैं । अग्नि अथवा तेजको छांदोग्योपनिषदमें “सत्” से निर्मित प्रथम महाभूत कहा है । न्याय शास्त्रमें इसको चमकीला शुभ्रवर्णका कहा गया है तो छांदोग्योप- निषदमें तेजका रंग लाल माना गया है। लाल रंग तेजोरूप है। शुभ्र वर्ण जल रूप है। और काला वर्ण पृथ्वीरूप है ऐसा श्वेताश्वतर उपनिषदमें कहा गया है। अध्यात्मशास्त्रमें तेजको ब्रह्मका प्रतीक माना गया है। तेज, ज्ञान और सद्गुणोंका सूचक है। अनेक उपनिषदोंमें “ ब्रह्मतेजोरूप है और तेजो रूपसे उसका साक्षात्कार होता है !” ऐसा कहा गया है। वैसे ही मुंडकोपनिषदमें, अत्यंत दीप्त स्वर्ण-तेजो मंडलके मध्यमें दीखनेवा शुद्ध शुभ्र निष्कलंक ब्रह्म सर्व श्रेष्ठ तेज है !” ऐसा कहा है। तथा छांदोग्योपनिषदमें “इस संसार सेतुका अतिक्रमण करनेके बाद अंधे मनुष्यको भी अंधत्वका कोई दुःख नहीं होता। उसकी आंखोंके सामने सदैव तेजोमय ब्रह्म चमकता रहता है। रात भी उसको दिनके समान दीखती है !” ऐसा कहा गया है। अनेक संतोंने अपने साहित्यमें तेजोमय ब्रह्म-साक्षात्कारका वर्णन किया है। ज्ञानेश्वरीके ग्यारहवे अध्यायमें भी यह देख सकते हैं। वायू—न्याय और वैशेषिकमें वायुको रूपरहित स्पर्श-बोध जन्य तत्त्व कहा है। वह नित्य और अनित्य दो प्रकारका है। नित्य वायु परमाणुरूप और अनित्यवायु कार्य रूप है। त्वक् नामका वायु वायुजन्य इंद्रिय सारे शरीरभर रहता है जो वायुका अनुभव करता है। शरीरमें संचार करनेवाले वायुको प्राण कहते हैं। उपनिषदोंमें जैसे शरीरके श्वासोच्छ्वासको प्राण कहा गया है वैसे ही विश्वके जीवनतत्त्वको प्राण कहा गया है। इससे प्राण व्यक्ति अथवा विश्वका सामर्थ्य बन गया है। उपनिषदोंमें सारे वस्तु प्राणसे उत्पन्न होकर उसीमें लय होते हैं ऐसा भी कहागया है। इस प्राणको भूतोंका मध्यबिंदु माना है। छांदोग्योपनिषदमें वायुही मूलतत्त्वमाना है। कहा गया है “वायु सबको विलीन करनेवाला तत्त्व है। कोई भी पदार्थ हो उसीमें विलीन होता है। अग्नि बुझ जाता है तो वायुमें। सूर्य वायुमें अस्त होता है। पानी वायुमें सूख जाता है। वायु ही सबको पूर्णरूपसे निगल जाता है !” अंत जिसमें होता है उत्पन्न भी उसीमेंसे होता है यह मान लेना है ! इस विश्वमें सतत और संतत चलनेवाला प्राणवायुका प्रवाह ही मूलभूत जीवन तत्त्व होनेकी बात पुराने ग्रीक दार्शनिकोंने भी कही है। ईशावास्योपनिषदमें संभवतः समष्टिरूप जो वायु अनिल कहा है वही यह संतत बहनेवाला प्राणवायु है। तैत्तिरीय उपनिषदमें “जिससे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, और उत्पन्न होनेपर जीते हैं तथा अंतमें सब इसीमें विलीन होते हैं वही एक मूलतत्त्व है। वही ब्रह्म है !” और ग्रीक तत्त्वज्ञ यही वाक्य दुहराकर इस तत्त्वको वायु कहते हैं। इसका विवेचन करते समय ग्रीक तत्त्वज्ञ कहता है “मनुष्य या अन्य प्राणी श्वासोच्छ्वासके वायुसे ही जीते हैं। इसलिये वायु यह चिरंजीवी, शक्तिमान श्रेष्ठ ऐसा तत्त्व है।” आकाश—प्रवाहण जैबालीने आकाशको सारे जगतका उत्पत्तिकारण माना है। यह इस जगतकी अंतिम गतिके विषयमें भी कहता है। विश्वका आकाश बनेगा। इसके मतसे सभी भूत ज्ञानेश्वरी १६२
आकाशसे उत्पन्न होकर आकाशमें लीन होते हैं। आकाश सर्व श्रेष्ठ है। छांदोग्य उपनिषदमें “ आकाशको अग्निसे भी श्रेष्ठ कहा है। सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, बिजली आदि आकाशमें रहते हैं। इन सबपर आकाशका आवरण रहता है। आकाशके विषयमें ऐसा भी एक विचार है कि खोखलापन का अर्थ शून्य अथवा अभाव है। इसलिये आकाशका अस्तित्वही नहीं ! चार्वाक आकाश नहीं मानता । उपनिषद् कहते हैं आकाश वायूसे भरा है। जहां जहां आकाश है वहां वायु है । आकाशमें अनंत तत्वोंको रहनेकी गुंजाइश है। आकाशमें अनंत तत्वोंका भ्रमण एक दूसरेमें विलीन होना आदि क्रियायें चलती रहती हैं। आकाश एक अखंड महाशून्य है। उसमें नीचे ऊपर आगे पीछे ऐसा कुछ नहीं है। आकाश अनेक तरंगोंका जाल है। सारा विश्व आकाशसे उद्भित होकर आकाशमें लीन होता है । शब्द आकाश तत्वजन्य है। श्रुतिमें “ आत्मासे संभुत आकाश कहा गया है । न्याय और वैशेषिक मानते हैं कि आकाशके अपने परमाणु नहीं हैं। पंच-प्राण—भारतीय तत्व-चिंतकोंने प्राण शक्तिका गहरा अध्ययन करके अपने शरीरमें चलनेवाली कौनसी क्रियायें प्राण-तत्वकी किस प्रकारकी शक्तिसे चलती हैं यह देख कर प्राण तत्वके पांच विभाग किये हैं। इनको पंचप्राण कहा जाता है। उनका नाम हैं (१) प्राण (२) अपान (३) व्यान (४) उदान (५) समान । निम्न छंदोंमें शरीरमें इन पांच प्राणोंका क्या काम है इसको समझाया गया है। जीता है प्राणसे प्राणी उठाता बोझ व्यानसे । मल-मूत्र सदा नीचे उतारता अपानसे ॥ उदानसे चलती वाक् हत्क्रिया है समानसे । चलती जो क्रियां ऐसी देहधारी मनुष्यकी ॥ पंचाग्नि—(१) प्रलयानल, (२) विद्युदनल (३) वडवानल (४) शिवनेत्रानल (५) द्वादशादित्यानल ये पंचाग्नि हैं । प्रलयानल पृथ्वी पर रहता है । विद्युदनल आकाशमें बिजलियोंमें-रहता है। बडवानल समुद्रमें होता है। शिवनेत्रानल रुद्रके क्रोधमें रहता है। द्वादशादित्यानल सूर्यका तेजस है। परमार्थ—परमार्थका अर्थ श्रेष्ठ प्रकारका लाभ । व्यावहारिक लाभ जिसे हम लाभ कहते हैं वे क्षणिक हैं। वे सब लाभ नष्ट हो सकते हैं। किंतु आत्मज्ञान-अपने आपको जाननेका ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता । इसलिये “मैं” क्या है यह जानना, अपने आपको जानना, श्रेष्ठ प्रकारका लाभ है। तभी इसे परमार्थ कहा है। इस ज्ञानसे सुख मिलता है और वह सुख निरालंब सुख होता है। वह किसी बाह्य वस्तु पर आधारित नहीं होता। आपसे अपनेमें अनुभव करनेका होता है । इसलिये वह शाश्वत सुख होता है। कभी नष्ट न होनेवाले शाश्वत सुखका लाभ परमार्थ है। इस प्रकारके सुखको प्राप्त करनेके लिये जो जो कुछ किया जाता है उसको परमार्थ साधना कहते हैं। पाप—पाप एक मल है। जो अंतःकरणको चिपकता है। पश्चात्तापसे उसको दूर किया जाता है। पतितता उत्पन्न करनेवाला, अमंगल, अशुभ, अनिष्टको जन्म देनेवाला क्रियाविशेष ही पाप है । सामान्यतः निसर्ग नियमोंके विरुद्ध चलना पाप है। पाप मनुष्यको गिराता है। प्रत्येक मनुष्य अनेक प्रकारसे-पाप पुण्य न माननेवाला भी-अपनी दृष्टिसे गिरता उठता है। अपनी १६३ परिशिष्ट ५
दृष्टिसे गिरनेका भाव पाप है। ऋग्वेद कालमें भी यह कल्पना थी। वहां पापको बंधन माना है ! वहां एक प्रार्थना है "जैसे बछड़ेसे रस्सी दूर करते हैं वैसे तू मुझे पापसे दूर कर ! क्यों कि बिना तेरे सामर्थ्यके आंख भी नहीं झपकती !" वहां पानीसे पापको धोनेकी प्रार्थना की है और अग्निसे पापको जलानेकी ! आगे शास्त्रज्ञोंने किन किन बातोंसे मनुष्य अपनी दृष्टिसे आप गिरता है उसका विचार करके उन सब बातोंको पापमें गिना और मनुष्यको उन उन बातोंसे दूर रहनेका आदेश दिया। जैसे माता शिशुको जहां जहां धोखा है वहांसे दूर रहना सिखाती है। इस शिक्षा पद्धति कारण पापके (१) प्रकीर्ण (२) अपाङ्क्तेय (३) मलिनीकरण (४) जातिभ्रंशकर (५) उपपातक (६) अतिपातक (७) महापातक ऐसे सात प्रकार बने। भिन्न भिन्न शास्त्र- कारोंने इसको भिन्न भिन्न नाम दिये हैं। धर्म शास्त्रोंमें अपनी तथा समाजकी निगाहोंसे गिरने या गिरानेके अनेक कारणोंकी लंबी सूची दी है। यह पापवृत्ति एक प्रकारसे मानसिक अनारोग्य है। जैसे कोई रोग पीढ़ी दर पीढ़ी आनुवंशिक चलता है वैसे पापवृत्ति भी आनुवंशिक चलती है। इसलिये कहीं कहीं एकके पापमें दूसरेकी जिम्मेदारी भी बतायी गयी है। जैसे सेवकके पापमें स्वामी, प्रजाके पापमें राजा, शिष्यके पापमें गुरु, पुत्रके पापमें पिता, यजमानके पापके पुरोहित आदि। जैसे पाप आनुवंशिक वैसे ही आनुषंगिक भी होता है। जैसे छूतकी बीमारी। गुरूका अनुकरणरूप, अथवा राजाके अनुकरणरूप अथवा समाज धुरीणोंके अनुकरणरूपमें, पाप समाजमें फैलता है ! ऐसे समय ये महाजन कठोर दंडके भागीदार माने गये हैं। पाप, मनुष्यके, पर्या- यसे समाजके नैतिक तथा आत्मिक अधःपतनका कारण होता है। खास करके कोई तत्वज्ञान जब मनुष्यके पाप छिपाने अथवा पापके समर्थनका साधन बनता है तब तो दंभ बढ़ जाता है और वह समाजके पतनका-सर्वतोमुखी पतनका साधन बनता है। विश्वके सभी धर्म-शास्त्रोंमें पापका विचार किया गया है। आधुनिक बुद्धिवादियोंने इस पर अनेक प्रकारसे विचार किया है। कुछ लोगोंने इसकी अवहेलना भी की है। सामान्य जनताको नीतिमार्ग पर स्थिर रखने के लिये इस कल्पनाकी अत्यंत आवश्यकता है। तथा गुप्तपापोंको रोकनेके लिये ईश्वरीय शासनकी भी। बिना इसके दूसरा चारा नहीं। पुण्य—जैसे पाप वैसे पुण्य। जो भिन्न प्रकारका इष्टफल देता है वह पुण्य है। ऐसी पुण्य शब्दकी व्याख्या की है। साथ साथ "विहित कर्मसे उत्पन्न होनेवाला" ऐसा भी कहा गया है। जैसे पाप अपनी निगाहोंसे गिराता है और क्लेश देता है वैसे पुण्य अपनी निगाहोंमें उठाता है और मनको समाधान देता है। धर्मशास्त्रोंने जैसे अपनी निगाहोंसे गिरानेवाले कार्योंकी सूचि दी है वैसे उठानेवाले कार्योंकी भी सूचि दी है। पुण्यसे, विहित काम करनेसे, व्यक्ति तथा पर्यायसे समाजकी शक्ति बढ़ती है। किये हुए पुण्यका प्रचार करनेसे पुण्य नष्ट होता है। इसलिये उसका प्रचार न करनेका आदेश दिया है। पुनर्जन्म—यह भारतीय दर्शनका वैशिष्ट्य है। कुछ अपवाद छोड़ कर भारतके सभी दर्शन पुनर्जन्म मानते हैं। मृत्युका अर्थ मनुष्यका शरीरपात है। मनुष्यका शरीर छूटने पर भी उसके आत्माका नाश नहीं होता। वह आत्मा-अपने कपड़े बदलनेवाले मनुष्यकी भांति दूसरा शरीर धारण करता है। इस सिद्धांतको पुनर्जन्म कहते हैं। ज्ञानेश्वरी १६५
इस कल्पनाके बीज ऋग्वेदमें भी मिलते हैं। जैसे:— चक्षु मिले सूर्यमें प्राण वायुमें जा तू द्यौ या पृथ्वीमें धर्मानुसार । जा तू जलमें अथवा जहां चाहो रह नव-देह सह ओषधीमें ॥ अथवा— देहधारी आत्मा कभी न थकते आता जाता है अपने स्वभावसे । आता जाता है जो इस जगतमें संयोग वियोग युत स्व-शक्तिसे । रचा जिसने इसको न देखता यह रहता वह इससे गुप्त । किंतु देखता वह इसे सदैव तभी गर्भावृत हो भोगता (यह) दुःख । ऐसे मंत्र कहीं कहीं मिलते हैं। आगे उपनिषदोंमें इसका विकास देखनेको मिलता है। कठोपनिषदमें एक स्थान पर कहा गया है कि मनुष्य घासकी भांति सूखकर-वृद्ध होकर-मरता है और वैसे ही घासकी भांति पैदा होता है !" वैसे बृहदारण्यकमें कहा गया है "जैसे झिनगा घासकी एक पात छोड़ते समय दूसरे पात पर आंख गड़ाता है वैसे आत्मा एक देह छोड़ते समय दूसरी देह पर आंख गड़ाता है और उसमें प्रवेश करता है ।" "यह पुरुष काममय है। जैसी इच्छा करता है वैसे सत्कर्म या कुकर्म करनेवाला साधू या पापी होकर पैदा होता है !" ऐसे विचार कई स्थान पर आये हैं। ऐसी ही बातोंको लेकर "वासनानुसार कर्म, कर्मानुसार जन्म, तथा वासनाक्षयसे मोक्ष" जैसे कर्म-सिद्धांतोंका विकास हुवा। अनेक उपनिषद और गीतामें "कर्म तथा पुनर्जन्मका संबंध" स्पष्ट बताया गया है । भारतीय दर्शनोंमें भी "मोक्ष प्राप्त होनेतक मानवी जीव अपने अपने कर्मानुसार अनेक योनियोंमें भ्रमण करता रहता है !" यह सिद्धांत सांख्य, योग, न्याय, वेदांत, जैन, बौद्ध आदि दार्शनिकोंने स्वीकार किया है। इस विषयमें सांख्य कहता है "ऐसा कहना गलत है कि सर्व- व्यापक पुरुष एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है। निर्गुण पुरुषका पुनर्जन्म नहीं होता है किंतु सूक्ष्म-लिंग देहका पुनर्जन्म होता है। अंतःकरणचतुष्टय तथा इंद्रियां, उनकी तन्मात्राओंके तत्वोंसे आत्माकी चारों ओर लिंगदेहका सूक्ष्म कोष तैयार होता है। इस लिंगदेहके साथ आत्मा हृदया- काशमें रहता है। आकाश अंगुष्ठमात्र होनेसे लिंगदेह भी उतना ही होता है। इस लिंगदेहमें कर्म-संस्कार सुरक्षित रहते हैं। यही पुनर्जन्मके कारण होते हैं।" इस विषयमें जैनोंका मत इससे कुछ भिन्न है। जैनदर्शनके अनुसार कर्म जीवमें संपूर्ण रूपसे मिल जाता है। व्याप्त हो जाता है। इसलिये वही कर्म, जीवको संसार क्षेत्रमें खींच लाता है। जीवको इसी कर्मानुसार पुनर्जन्म मिलता है। सतत पुण्यकर्म करनेसे प्राप्त होनेवाले सम्यग्ज्ञानसे जीव जन्ममृत्युसे मुक्त होता है। किंतु बौद्ध-दर्शन आत्माको न मान कर भी पुनर्जन्म मानता है। बिना आत्माके पुनर्जन्म कैसे और किसका ? इस प्रश्नके उत्तरमें बौद्ध दार्शनिक कहते हैं। मनुष्यके कर्मका कभी नाश नहीं होता। उसका यथोचित फल-भोग भोगना ही पडता है। मनुष्यका वर्तमान जन्म उसके पूर्व-जन्मका फल है जैसे एक दीपकसे दूसरा दीपक जलता हुवा दीप-माल तैयार होती है। एक जन्मका कर्म दूसरे जन्मकी स्थिती निश्चित करता है। कर्मकी एकता अथवा अखंडताके कारण मृत जीव और नये जीवमें अभिन्नता रहती है। यही पुनर्जन्म है। १६५ परिशिष्ट ५
महाभारतमें कर्मानुसार जन्मका सिद्धांत समझाते हुए "अव्यक्त आत्मा ही देहधारी प्राणिमात्रका बीज है। बीज भूत आत्मा गुणोंके कारण जीव बनता है। वही काल और कर्मके प्रभा- वसे संसारमें भ्रमण करता है। वृक्षमें यह चैतन्य बीज होता है। सुख दुःख भी होता है। इतना ही नहीं उनकी इंद्रियां भी होतीं हैं।" महाभारतके शांतिपर्वमें इसका विस्तृत दिवचन है। जीव चंद्रलोक तक जा कर वहांसे वनस्पतिमें आता है और अन्नरूपसे वह प्राणिमात्रमें जाकर मातृगर्भमें प्रवेश करता है इस तरह देह त्यक्त जीवका भ्रमण कक्षा बताया गया है। आधुनिक जीव-शास्त्र भी इस सिद्धांतका समर्थन करता है। भारतके बाहरके दार्शनिक इस सिद्धांतको नहीं मानते किंतु भारतीय दार्शनिकोंने हजारों वर्षोंसे, ४.५॥ हजार वर्षसे इस सिद्धांतको स्वीकार किया है और उपनिषदोंसे स्वीकृत पुनर्जन्मके विचारोंका आधुनिक विज्ञान समर्थन करता है। प्राचीन ऋषियोंने स्पष्ट रूपसे कहा है "पुत्र पौत्र प्रपौत्रके रूपमें वंश-सातत्यसे मेरी आत्मा अमर होगी।" "आत्मा पुत्र रूपसे जन्मता है !" यह वाक्य प्रसिद्ध है। पुनर्जन्मका सिद्धांत अमान्य करनेवाले विद्वानोंके "तो पूर्व-जन्मका स्मरण क्यों नहीं रहता ?" इस प्रश्नका उत्तर देते समय भारतीय दार्शनिक "आत्माके अज्ञानावरणके कारण !" कहते हुए इस अज्ञानावरणको दूर हटा कर पूर्व-जन्मका स्मरण प्राप्त करनेका विधान भी-योगमें-बताते हैं। गीतामें पुनर्जन्मका व्यवस्थित विवेचन और समर्थन मिलता है और ज्ञानेश्वरीमें इसका सुंदर स्पष्टीकरण दिया है जो अत्यंत बुद्धिगम्य हैं और आज जो आधुनिक विद्वान वैज्ञानिक ढंगसे अनुसंधान करते हैं वह भी पुनर्जन्मके भारतीय सिद्धांतका समर्थन करता जाता हैं। पुरुष—सांख्य शास्त्रमें प्रकृति और पुरुष यह दो अनादि तत्त्व होनेकी बात कही गयी है। गीताने भी यह कहा है। सांख्य, शुद्ध चैतन्यको जो गुणोंसे परे है पुरुष कहता है। अज्ञानके कारण प्रकृति पुरुषमें जो विपरीत बुद्धि होती है, विवेक द्वारा उसको दूर करके पुरुषको प्रकृतिसे मुक्त देखना ही सांख्यका परम उद्देश्य है। इसीको वे विवेक ख्याति कहते हैं। सांख्यका पुरुष अतींद्रिय है। वैसे सांख्यके तीन प्रकारके पुरुष हैं (१) रूप पुरुष, (२) बद्ध पुरुष (३) मुक्त पुरुष । अनाश्रितत्व, अलिंगत्व, निरवयत्व, स्वतंत्रत्व, अत्रिगुणत्व, विवेक्तित्व, अविषयत्व, असामान्यत्व, चेतनत्व, अप्रसवधर्मित्व, साक्षित्व, कैवल्य, माध्यस्थ्य, औदासिन्य, द्रष्टृत्व, अकर्तृत्त्व ये रूप पुरुषके लक्षण हैं। इसी निर्लिप्त पुरुषका बिंब, बुद्धि या महत्तत्त्व पर पडता है। ऐसे समय बुद्धि या महत् जड होते हुए भी उसमें चैतन्यका भास होता है जो बद्ध पुरुष जीव है। वह सांख्य विवेकसे मुक्त होता है। पुरुष और प्रकृतिका संबंध अनादि है। पुरुषका बिंब जब प्रकृति पर पडता है प्रकृति या बुद्धि अपनेको चैतन्य समझने लगती है। व्युत्क्रम रूपसे बुद्धिके स्वरूपका भास पुरुषसे होता है। जिससे निष्क्रिय, निर्लिप्त, त्रिगुणातीत पुरुषभी अपनेको कर्ता, भोक्ता, आसक्तादि-सा लगता है। यही पुरुषका कल्पित बद्धत्व है। पुरुषका अपने आपको पहचानना मुक्ति है। वही सांख्यका विवेक है। इस विवेकसे-ज्ञानसे-कैवल्य प्राप्त होता है। इस विवेकके द्वारा पुरुषका चैतन्यत्व और प्रकृतिका जडत्व स्पष्ट हो जाता है। गीतामें भी इन तीन पुरुषोंका विचार है तथा ज्ञानेश्वरीमें इसका विस्तृत विवेचन है। सांख्यमें पुरुषके विषयमें जो विवेचन है यहां उसकी झलक मात्र है। पुरुषार्थ—मनुष्यको अपना जीवन कृतार्थ करनेके लिये जो पराक्रम करना होता है उसको पुरुषार्थ कहा गया है। पुरुषार्थ मानवी जीवनका कर्तव्य है। वे चार हैं। (१) काम, काम ज्ञानेश्वरी* १६६
मनुष्यकी, नहीं प्राणिमात्रकी सहज प्रवृत्ति हैं। वह आत्माके अमरत्व प्रस्थापनाका भौतिक प्रयास है। वेदोंमें कहा गया है आत्मा पुत्र रूपसे प्रकट होता है। उपनिषदोंमें कहा गया है "प्रजातंतुका छेदन मत करो!" संतानेत्पादन पितृ ऋणसे मुक्ति है। कुलमर्यादाके साथ कुलवृद्धिका मूल काम है। इसीलिये गृहस्थाश्रम है। गृहस्थाश्रमके इस काम-पूर्तिके लिये, तथा संतानको योग्य संस्कार देनेके लिये अर्थकी- धनकी आवश्यकता है। धन प्रथम पुरुषार्थ काम तथा काम पूर्तिके दायित्व निभानेका साधन है। इसलिये अर्थ-साधना द्वितीय कर्तव्य है। साथ साथ अर्थ साधनमें जुट जानेसे काम-वृत्तिका संकोच भी होता है। वह सीमित होती है। वैसे ही धर्म अर्थलालसाका संकोच करता है। धनकी आवश्यकता है "किंतु सन्मार्गसे" यह धर्म कहता है। चाहे जैसे, जैसे चोरीसे, डाकेसे, जूएसे, अत्याचार अना- चारसे, आनेवाला धन नहीं चाहिए, कैसा धन स्वीकार करना कैसे नहीं करना यह कहनेका कार्य धर्म करता है। अर्थात धर्म, अर्थ लालसाका संकोच करता है और इन सबसे मुक्त करता है। काममें जो सुख है, धनमें जो सुख है, धर्म भावनाका जो सुख है वह क्षणिक है। वह पराश्रित है। बाह्य वस्तुओं पर आश्रित है। इसलिये वह सच्चा नहीं। सच्चा सुख स्वाश्रित होना चाहिए। अपनेमें आपसे भोगा जानेवाला सुख। शाश्वत चिरंतन सुख। ऐसे सुखको मोक्ष कहा गया है। वह मनुष्यको स्थायी सुख देता है इसलिये वह सर्वोच्च पुरुषार्थ है। चतुर्थ पुरुषार्थ है। काम मानवी कर्तव्य तथा सुखकी पहली सीढ़ी है और मोक्ष मानवी कर्तव्य और सुखकी अंतिम स्थिति है। जीवनका सारा प्रयत्न उसके लिये हैं। जीव उसी सुखके लिये बार बार जनमता और मरता है। इसी आशासे कि कभी न कभी वह मिलेगा। पुरोडाश—यज्ञकार्यमें आहुति देनेके लिये बनाया गया अन्न विशेष। यह बनानेका विधि-विधान समंत्र होता है। इसमें भूने गये चावल या जौका सत्तू होता है जो गरम पानीमें गूंद कर कच्छपके आकारके गोले बनाकर मिट्टीके तवे पर भूने जाते हैं। इसको घी लगानेके बाद यह पुरोडाश बनता है। ये पुरोडाश मिट्टीके कितने तवोंपर-खपरैलोंपर-भूने जाते हैं इस पर उसका सप्तकपाल, अष्टकपाल, दशकपाल, एकादशकपाल, द्वादशकपाल आदि नाम होते हैं। पुरोडाशका विशिष्ट भाग यज्ञमें आहुति दे कर जो बचा रहता है वह यज्ञ करनेवाले "यज्ञशेष" के रूपमें खाते हैं। प्रकृति—सांख्यमतानुसार सत्व-रज-तमकी साम्यावस्था ही प्रकृति है। यह सांख्योंके चौबीस तत्वोंमें दूसरा तत्त्व है। गीतामें यह क्षर तत्त्व है जो अपरा प्रकृति कही गयी है। यह अपरा प्रकृति अनादि कालसे पुरुषसे संबद्ध है। इसीसे सब बद्ध हैं। कल्पांतमें भूतमात्र इसमें लीन होते हैं और कल्पारंभमें इसीसे उत्पन्न होते हैं। पुरुष इसका अधिष्ठान मानकर अपनी मायासे सारा विश्व चलाता है। इस अपरा प्रकृतिके ऊपरके स्तरपर परा प्रकृति है। यही जगतको धारण करती है। यह ईश्वरांश है। जो शरीरत्यागके बाद एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाकर इंद्रियादिकेद्वारा विषयोंका भोग करती है। सांख्यमतानुसार मूलप्रकृति अव्यक्त है। उसीसे अन्य २३ तत्त्व उत्पन्न होते हैं। मूल अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न सभी तत्त्व व्यक्त हैं। इन प्रत्येक व्यक्त तत्त्वमें अव्यक्त प्रकृतिके (?) तीन गुण हैं। ये ही गुण संस्थानभेदसे अनेक रूपसे अभिव्यक्त होते हैं। यह मूलप्रकृति जो तीन गुणोंके साम्यावस्थासे बनी है, अव्यक्त है। यह १६७ परिशिष्ट ५
महत्तत्त्वादि अन्य तत्त्वोंमें अपनी अव्यक्त शक्तिसे प्रवेश करती है। और अन्यान्य भेदोंका समन्वय करती है। प्रकृति जड और नित्य है जो अनादि कालसे पुरुषसे जुड़ी हुई है। प्रकृति पर पुरुषका बिंब पड़नेसे वह अपनेको चेतनकी भांति समझती है। प्रकृतिके इसी स्वरूपके आभासके कारण निष्क्रिय निर्लिप्त पुरुष भी अपनेको कर्ता भोक्ताके रूपमें लगता है, यही पुरुष पर आरोपित प्रकृ- तिका बंधन है। इसीका पहचान कर दूर करना स्वरूप ज्ञान है। प्रकृति ही सृष्टि रचनाका कार्य करती है। इस कार्यमें प्रकृति किसीका सहाय नहीं लेती। प्रकृति पर पड़ा पुरुषका बिंब स्वाभाविक है। सृष्टिरचना प्रकृतिका स्वभाव है। गायके थानमेंसे निकल कर बछड़ेके मुखमें जानेवाले अचेतन दूधकी भांति प्रकृतिका कार्य चलता है। इस दूधसे जैसे बछडेको जीवन मिलता है वैसे प्रकृतिके सृष्टि-कार्यसे पुरुषको मुक्ति मिलती है। पुरुषकी मुक्तिके लिये वह अनेक प्रकारके उपाययोजना करती है। वह अपने प्रभुत्वसे, बुद्धिके भावोंकी सहायतासे, एक शरीर छोडकर दूसरा शरीर धारण करती है। इन सब बातोंका एक मात्र उद्देश्य पुरुषको बंधनमुक्त करना है। प्रकृतिको आत्मा समझनेवाला पुरुष, शरीर छूटनेके बाद प्रकृतीमें ही लीन हो जाता है। अथवा प्रकृतिलीन पुरुष मुक्त-सा हो कर भी पुनः हिरण्यगर्भ स्वरूपको धारण करता है। अर्थात् प्रकृतिलीन पुरुषको उत्तरकालमें बन्धन होनेकी संभावना बनी रहती है और ईश्वर जो सदा मुक्तावस्थामें रहता है कभी किसीभी प्रकारसे प्रकृतिके बंधनमें नहीं आता। महत्तत्त्वसे लेकर पृथ्वीतत्त्व तक सभी तत्त्वोंका मूल प्रकृति है। यह सत्य रज तमकी साम्यावस्था है। इस अवस्थामें गुणोंका कोई प्रधान या गौणभाव नहीं रहता। प्रकृति तत्त्वमें ये गुण विभक्त नहीं रहते। परस्पर समन्वित रहते हैं। इस प्रकृतिके दो भेद माने गये हैं। व्यामोहिका प्रकृति तथा मूल प्रकृति। इसी कारण संसारमें अवस्थाभेद हैं। व्यामोहिका प्रकृतिमें पुरुष बद्धावस्थामें जीव कहलाता है और मूल प्रकृतिमें स्वरूप लीन होकर जगत्कारण आत्मा कहलाता है। प्रकृतिका सिद्धांत कहनेवाला सांख्यदर्शन अत्यंत प्राचीन-दर्शन है। इसके विचार अत्यंत व्यापक हैं। सांख्यके बाद कई दर्शनकारोंने तथा भाष्यकारोंने इस पर इतना विचार किया है, इतने विवेचन किये हैं, जिससे अनेक प्रकारके मतभेद दीख पड़ते हैं। कई भाष्यकारोंने इसके अनेक पर्यायवाची शब्द देकर विषयको अधिक उलझा दिया है। यहां तक कि सांख्यकी प्रकृति तथा गीताकी प्रकृति एक नहीं हैं!! इस परसे लगता है कि सांख्यके तत्त्वोंका-प्रकृतिका विवेचन करनेवालोंने अपने अपने अनुभवसे विवेचन किया है। प्राण—पिंड तथा ब्रह्मांडका एक मूलतत्त्व। इस शब्दका अर्थ करते समय "शरीरमें संचार करनेवाला वायु" ऐसा अर्थ किया गया है। इसके साथ ही साथ "सदैव अर्थात् नींदमें भी नाक तथा मुखसे अंदर बाहर जानेवाला तत्त्व" भी कहा गया है। यही तत्त्व है जो "मनुष्य और विश्वको जोडता है!" अनेक उपनिषदोंमें इसका विचार आया है। एक स्थान पर "यह जीवनतत्त्व है" कह कर आगे "प्राण ही ब्रह्म" कहा गया है। यह केवल मनुष्यका ही नहीं "समग्र विश्वका जीवन तत्त्व है!" दूसरे एक उपनिषदमें "प्राण ही विश्वाधार वस्तु कहा है क्यों कि सभी वस्तु प्राणसे निर्माण हो कर प्राणमें ही लीन होते हैं।" चक्रके आरे जैसे नाभीमें गढे रहते हैं वैसे सारा विश्व प्राणमें मिला रहता है।" ज्ञानेश्वरी ७ १६८
विश्वके प्रत्येक वस्तुके पीछे जो सदैव त्रिकालाबाधित गतिमान् शक्ति है वह प्राण है। गुरुत्वाकर्षण, विद्युत्, ग्रहमंडल और नक्षत्रोंका भ्रमण तथा चराचर जीव सृष्टिमें यह प्राणतत्त्व ओतप्रोत है। विश्वके अम्याम्य आकार प्रकारका, विश्वकी विविध शक्तियोंका, तेजका आधार यही प्राणतत्त्व है। विश्वके जीवनका आधारभूत, विश्व-जीवनको नियमित करनेवाला महान तत्त्व हवामें है किंतु हवा प्राण नहीं है। अन्नमें प्राण है किंतु अन्नका पौष्टिक अंश प्राण नहीं। पानीमें प्राण है। किंतु पानी जिन द्रव्योंसे बनता है वह प्राण नहीं ! सूर्य प्रकाशमें प्राण है किंतु उसका प्रकाश या किरण प्राण नहीं है। विश्वके सभी चराचर सृष्टिकी चिच्छक्ति प्राण है और विश्वके सभी वस्तु इस प्राणशक्तिके वाहक हैं। प्राणका अर्थ श्वास प्रश्वास नहीं किंतु जिसके कारण यह श्वसनप्रणाली चलरही है वह प्राण है। आंखोंसे देखना, कानसे सुनना, जीभसे चखना, शरीरसे छूना आदि इसी प्राणतत्वका परिणाम है। जिस शक्तिसे विश्वमें गतिमानता है वह प्राण है किंतु विश्वकी गतिमानता प्राण नहीं। इस बातको अनेक उदाहरण देकर उपनिषदमें समझाया गया है। इस प्राण शक्तिको आधार मानकर उपनिषदोंने दो नीतितत्त्व कहे हैं (१) इंद्रियोंकी विषय प्रीति पाप अर्थात् मृत्युका कारण बनती है, इसलिये प्राणधारणापरूप जीवनव्यापारको महत्व देना (२) तत्वतः सबका प्राण एक होनेसे सबसे प्रेम करना। किसीसे द्वेष नहीं करना। यह औपनिषदीय नीतिशास्त्रका आधार है। प्राणायाम-अष्टांग-योगका चौथा अंग। इस शब्दका प्राण+आयाम ऐसा विभाजन है। श्वासप्रश्वासकी स्वाभाविक गतिपर नियंत्रण रखना प्राणायाम शब्दका अर्थ और उद्देश्य है। जो प्राण अथवा वायु हम बाहर छोड़ते हैं जिसे प्रश्वास कहते हैं उसको प्राणायामकी प्रक्रि- यामें "रेचक" कहा गया है। जो वायू अंदर लेते हैं जिसे श्वास लेना कहा जाता है उसको प्राणायाममें "पूरक" कहा गया है। तथा बाहरी श्वास अंदर लेकर उसको अंदर ही रोकनेकी क्रियाको "कुंभक" कहा जाता है। पूरक कुंभक रेचक मिलकर प्राणायामकी प्रक्रिया चलती है। यह कुंभक एक प्रकारसे श्वास प्रश्वासमें विराम है। यह विराम दो प्रकारका हो सकता है। एक पूरकके बाद अर्थात् बाहरका वायू अंदर लेनेके बाद दूसरा रेचकके बाद अर्थात् अंदरका वायू बाहर छोडनेके वाद। इस दो प्रकारके विरामको अंतर कुंभक और बाह्यकुंभक कह सकते हैं। विरामका यह काल घटाना बढ़ाना, प्राणायामका वास्तविक अभ्यास है। (१) बाहरका वायू अपने फेफड़ोंमें भरना (२) वहां उसको रोकना (३) अंदरका वायू बाहर फेंकना (४) उसको बाहर ही रोकना। इसमें जो प्रकार हैं इससे प्राणायामके अनेक प्रकार बने हैं। जैसे नाकके दोनों नथुनोंसे सांस लेकर तुरंत दोनों नथुनोंसे छोड़ना भस्त्रिका कहलाता है। ऐसे करते समय पेटको लुहारकी धोकनीकी भांति फुला कर छोड़ना पड़ता है। इस भस्त्रिकाके भी उपविभाग हैं। जैसे एक नथुनेसे ले कर तुरंत दूसरे नथुनेसे छोड़ना। ऐसे (१) सूर्यभेदन (२) उज्जार्ड (३) सीत्कारी (४) शीतली (५) भस्त्रिका (६) भामरी (७) मूर्छा (८) प्लाविनी ऐसे आठ प्रकारके मुख्य प्राणायाम हैं। किंतु सामान्यतः दीर्घ-श्वसन, अभ्यास करने जैसा प्राणायामका एक प्रकार है। इसमें हम जो श्वास प्रश्वास लेते छोड़ते हैं, उसका समय धीरे धीरे बढ़ायें। वह शरीर और मनको प्रसन्न रखनेका एक अच्छा और बिना किसी धोखेका साधन है। १६९ परिशिष्ट ५ (13)
इसके बाद शांत एकांत स्थान पर सुबह उठते ही, शामको, रातको सोते समय, अथवा अन्य किसी योग्य समय पर धीरेसे दायों नथुना दबा कर बाये नथुनेसे पूरक करना-श्वास अंदर लेना फिर दोनों नथुने दबाकर उसको कुंभक-अंदर रोकना-करना तथा धीरेसे दहिने नथुनेसे बाहर छोड़कर पुनः बाहर रोकना प्राणायामका एक अत्यंत सरल लाभप्रद प्रकार है । इसमें पूरक - १ कुंभक - अंदरका - ४ - रेचक २ - तथा बाह्य कुंभक ४ । यह कालमर्यादा है । इसको इसी प्रमाणमें अपनी शक्तिके अनुसार बढाते जाना । जैसे ४ - १६ - ८ - १६ । इस प्रकारको सूर्य भेदन कहते हैं । इसके विपरीत दाहिने नथुनेसे पूरक, कुंभक, बाये नथुनेसे रेचक कुंभकको चंद्रभेदन कहते हैं । सूर्य भेदन और तुरंत चंद्रभेदनसे एक प्राण चक्र पूर्ण होता है । इस प्राणायाम प्रकारके साथ, पूरकके साथ मूलबंध, कुंभकके साथ जालंधर बंध और रेचकके बाद उड्डियानबंध अत्यंत लाभप्रद है । वस्तुतः उड्डियानबंध ही बाह्यकुंभक है । इसी प्रकार दोनों नथुनोंसे धीरे धीरे कंठ भागको स्पर्श तथा घर्षण करें, इस प्रकारसे-आगे आगे हृदयको भी श्वास नलिकाके हृदय भागमें भी घर्षण हो सके, ऐसे पूरक करके फिर कुंभक करना, वैसे ही दोनों नथुनोंसे श्वासनलिकाको अंदरसे बाहरतक घर्षण हो सके ऐसे रेचक करना भी एक सरल प्रकारका प्राणायाम है । इसके बाद भी बाह्य कुंभक उड्डियान करें । इसका प्रमाण भी १-४-२-४ है । यह कभी कर सकते हैं । इससे कार्यमें उत्साह बढ़ता है । इसके साथ भी मूल बंधादि कर सकते हैं । आरोग्यकी दृष्टिसे यह उत्तम साधन है । विशेषतया जब सांस फूलता है तब अत्यंत लाभप्रद होता है । यदि इसका सही ढंगसे अभ्यास किया जाय तथा नियमित रूपसे इस पद्धतिसे प्राणायाम किया जाय तो यह कई रोगोंसे बचाता है । इस प्रकारके प्राणायामको उजायी कहते हैं । इसी प्रकार अन्य पांच छ प्रकार हैं । इनमें सूर्यभेदन और उजायी ठंडके दिनोंमें अनुकूल होते हैं तो शीतला, सीत्कारी गरमीके दिनोंमें अनुकूल होते हैं । भस्त्रिका अनेक प्रकारके रोगोंको नाश करता है । प्राणायामसे बुद्धि तीव्र और कुशाग्र होती है । शरीर आरोग्य-संपन्न रहता है । हठ योगके अनेक ग्रंथोंमें इसका वर्णन किया गया है । प्राणायाम प्रातःकाल, माध्यान्हकाल, सायंकाल तथा मध्यरात्रीके बाद करना चाहिए । किंतु प्राणायाम सदैव एकांतमें करना चाहिए । प्राणायाम करनेका स्थान अधिक तर खुला, तथा प्रकाशयुक्त हो । शुद्ध हो । चाहे जहाँ प्राणायाम नहीं करना चाहिए । प्राणायाम करते समय सरल बैठना चाहिए । अनामिका और मध्यमा अंगुलिसे बायां नथुना और अंगूठेसे दायां नथुना दबाना चाहिए । तर्जनी अंगुलीका कहीं भी स्पर्श नहीं होना चाहिए । प्राणायामका समय धीरे धीरे बढाते जाना । समय बढ़ानेमें उतावलापन नहीं करना चाहिये । सारी व्यवस्था सहज हो । प्राणायामके इन आठ प्रकारके अलावा और दो प्रकार हैं । (१) सगर्भ (२) अगर्भ । संमत्र प्राणायाम सगर्भ कहलाता है और मंत्र रहित प्राणायाम अगर्भ कहलाता है । संमत्र प्राणायाम विशेष परिणामकारी होता है । वैसे ही जब भूख लगी हो, प्यास लगी हो, नाक भरा हुवा हो, हर्ष शोक आदिसे मन उद्विग्न हुवा हो, नींद आ रही हो अथवा ठीक मल-विसर्जन न हुवा हो, ऐसे समय प्राणायाम नहीं ज्ञानेश्वरी १७०
करना चाहिए । गलत प्रकारसे प्राणायाम करनेसे अनेक प्रकारके रोग हो सकते हैं। यह अपनी मूल-भूत जीवन शक्तिसे खेलना है। इसलिये इसके विषयमें पूर्ण विचार करके, पूर्ण जानकारी लेकर, किसी-सच्चे अनुभवीके मार्ग-दर्शनमें ही यह करना चाहिए । क्यों कि सही तरीकेसे प्राणायाम करनेसे जैसे सब प्रकारके रोग दूर हो कर शरीर संपूर्ण स्वस्थ और तेजस्वी हो जाता है वैसे ही गलत ढंगसे प्राणायाम करनेसे शरीर सदैवके लिये रोगोंका घर भी हो सकता है । बंध—योग-साधनामें जैसे मुद्राएं हैं वैसे ही कुछ बंध भी हैं। प्राणायाम करते समय नवद्वारोंमें कुछ द्वार बंध करनेमें इन बंधोंकी आवश्यकता होती है। मूलबंध, उड्डियानबंध, जालंधर बंध इन्हे त्रिबंध कहते हैं और ये तीन प्रसिद्ध हैं। वैसे ही विपरीत करणी, वज्रोली, महाबंध, महावेधबंध, आदि बंध है जो शरीरशुद्धि, प्राणायामादिमें सहायक हो जाते हैं । बुद्धि—स्वीकृत-गृहीत-बातमेंसे अनुमान करनेवाली जो शक्ति है, अथवा तर्कसे अनुमान अटकल-लगानेकी एक शक्ति। मनुष्य बुद्धिमान है कहनेमें यही सार है। बिना मनुष्यके अन्य पशुओंमें यह अनुमान करनेकी शक्ति नहीं है। फिर भी अधिक विकसित मानवेतर प्राणी कुछ अटकल लगाते हैं किंतु वह निम्न श्रेणीके-अविकसित-श्रेणीके मानवोंके समान होते हैं। विद्वानोंका यह मत है कि मानवी अनुमानमें आत्मज्ञान होता है और पाशवी अनुमानमें वह नहीं होता । पशु, मानवके समान कल्पना-चित्र चितारता रहता है इसका कोई आधार नहीं मिला । बुद्धिका अर्थ करते हुए विद्वानोंने कहा है कि "जिस शक्तिसे मूलसत्यका बोध होता है वह अंतःस्फूर्त शक्ति ही बुद्धि है ।" कुछ विद्वान कहते हैं "सर्वव्यापी तत्त्वके सहारे सभी बौद्धिक विचार एक करनेवाली शक्ति बुद्धि है !" यह व्यवहारिक बुद्धि से जो छोटे मोटे काम करनेमें आवश्यक होती है, भिन्न है। उपनिषदोंमें बुद्धिको जीवनका सारथी माना है। उपनिषदोंके अनुसार इंद्रियां घोडे हैं, मन उनकी रास है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी और आत्मा रथी है । मनकी राससे इंद्रियरूपी घोडोंको वह अपने ध्येयकी ओर चलाती है। यदि सारथी अच्छा नहीं होता तो जैसे घोडे रथको मनमाने ले जाते हैं वैसे बुद्धि यदि आत्मस्थ न हो तो जीवन-रथ गढ़ेमें जायेगा ! सांख्यशास्त्रमें "महत्तत्त्व-संज्ञक बुद्धिको अंतःकरण" कहा है तो न्यायशास्त्रमें "आत्मा और अंतःकरणके संयोगजन्य समझ=ज्ञान" कहा है । किसी बातको जाननेके किये आवश्यक शक्तिको बुद्धि शक्ति कहा गया है। सांख्य-मतके अनुसार बुद्धि एक तत्त्व है। प्रकृतिके सात्त्विक अंशसे बुद्धितत्त्वकी अभिव्यक्ति होती है । इसलिये बुद्धिमें सत्त्वके प्रकाश और लघुत्व ये गुण हैं। निश्चय, बुद्धिका स्वरूप है। निश्चय करना बुद्धीका कार्य है । रजोप्रधान बुद्धि चंचल होती है। यह विकृत बुद्धि है। निश्चय टिक नहीं सकता। ऐसी बुद्धि अहंकारको उत्पन्न करती है। बुद्धि-जन्य इस अहंकारके भी दो प्रकार हैं। सात्त्विक अहंकार-धर्म, ज्ञान, वैराग्य ऐश्वर्य । तामसिक अहंकार-अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य । बुद्धि जीवके भोगका प्रधान साधन है। बुद्धि प्रकृति-पुरुषके सूक्ष्म-भेदको दर्शाती है। बुद्धिसे ही मुक्ति और मुक्तिके भाव जगते हैं। वे भाव लिंग शरीरमें रहते हैं। सांख्यमतके अनुसार अविद्याके कारण बुद्धि वृत्तिको अपौरुषेय चैतन्यसे एकाकार माना गया है। बुद्धितत्त्वके सूक्ष्म भागके कारण ही "मै हूं" इसका ज्ञान होता है। किंतु पुरुष इस बुद्धिसे परे है। अविद्याके कारण ही बुद्धिमें आत्माका भान होता है। सांख्यमतके अनुसार बुद्धि अहंकार तथा मन मिलकर अंतःकरण बनता है। ज्ञानेंद्रियां और १७१ परिशिष्ट ५
कर्मेन्द्रियां इसका साधन है । इन्हीं साधनोंसे वह " बाह्य ज्ञान " प्राप्त करता है । इंद्रियां अंतःकरणका द्वार हैं । मन संकल्प-विकल्प करता है । बुद्धि निश्चय करती है और अहंकार मुझे ज्ञान हुवा ऐसा अनुभव करता है । अर्थात् बुद्धि निश्चय करनेवाली शक्ति है । जब बुद्धि शरीर भावसे उठकर आत्म-रत होती है तब इसीमें चैतन्यका प्रतिबिंब ग्रहण करनेकी शक्ति आती है । गीतामें भी स्थितप्रज्ञ तथा स्थिरमति इन शब्दोंसे बुद्धिके विषयमें कुछ कहा है । वैसे ही "मिश्र-वचनोंसे मेरी बुद्धिपर मोहावरण क्यों डालता है ?" ऐसा प्रश्न पूछनेवाले अर्जुनको द्विविध निष्ठा सांख्य-निष्ठा और योग-निष्ठाके रूपमें सांख्य-बुद्धि और योग-बुद्धि ऐसे बुद्धिके दो प्रकार कहे हैं । ऊपर सांख्य शास्त्रके अनुसार बुद्धि शक्ति अथवा बुद्धि तत्त्वका विवेचन किया ही हैं । उसके अनुसार चैतन्यका प्रति-बिंब ग्रहण करना अर्थात् आत्मज्ञान प्राप्त करना बुद्धिका कार्य है अथवा आत्म-ज्ञान ही बुद्धि है । तथा गीतामें कर्म-कुशलता योग " कहते हुए आत्मज्ञानानुसार कर्माचरण की कलाको योग-बुद्धि कहा है । कला और शास्त्र दोनोंको समन्वय बुद्धिकी स्थिरता है जो ब्रह्म-निर्वाणका साधन है । कहीं कहीं कहा गया है " शुद्ध बुद्धि एक चिनारीकी भांति है, वह कितनी ही कम क्यों न हो अविद्या-राशिको जला देती है । " फल-निरपेक्ष कुशाग्रता " शुद्ध-बुद्धिका लक्षण है । किसी भी प्रकारकी फलापेक्षासे बुद्धि मैली हो जाती है । फलापेक्षासे बुद्धिकी निर्मलता नष्ट होती है। वह कभी चैतन्यका प्रतिबिंब ग्रहण नहीं कर सकती । कर्तव्य निश्चय, फल-निरपेक्षता, कुशाग्रता, निर्मल बुद्धिका लक्षण है जिससे ब्रह्मज्ञान होता है । वैसे ही ग्रीक तत्त्वज्ञ पहले पहले मानते थे विश्वका मूल-भूत तत्त्व सत्य है । उस सत्यका निश्चय करने-जानने-के लिये किया जानेवाला तर्क ही बुद्धि है । बुद्धि सत्यानुसंधानका साधन है । प्लेटो कहता है मूल-भूत-तत्त्व ईश्वरविषयक विचार है ! किंतु अरस्तूका कहना है " बुद्धिके मूलभूत- तत्त्व विश्व-व्यवस्थामें गूंथे हुए हैं । इसलिये विश्वको छोड़कर सत्यका अनुसंधान करना असंभव है !" अरस्तूका यह भी विश्वास है " मनुष्यमें प्राण इस ईश्वरी तत्त्वसे बुद्धि-तत्त्वका प्रवेश होता है । अन्य भौतिक तत्त्वसे नहीं।" वैसे ही वह " इंद्रिय संवेदनामेंसे बुद्धि निर्माण होती है" ऐसा सिद्धांत प्रतिपादन करता है । वह अपने सिद्धांत कहनेके लिये तर्कका ऐसा जाला बुनता है कि उससे छूटना कठिन हो जाता है । उसके तर्कोंका अध्ययन करते करते कुछ सिद्धांत निकलते हैं । वह भी बुद्धिके दो प्रकार मानता है एक निर्मल बुद्धि दूसरी समझ बुद्धि ! मनुष्य अपनी निर्मल बुद्धिके बल- बूते पर विश्वके अंतिम सत्यको पा सकता है समझ बुद्धिसे वह असंभव है । प्लेटो भी इस बातको स्वीकार करता है अरस्तूके मतसे "बुद्धि भी आत्माकी भांति अमर है । वह भौतिक शरीरका भाग नहीं । आत्माकी भांति उसका शरीरसे साहचर्य रहता है । बुद्धि मनुष्यकी मृत्युके बाद आकाशतत्वमें लीन होती है । इस प्रकारकी निर्मल-बुद्धिको वह आकाश तत्त्वसे जोडता है । किंतु समझ बुद्धिको वह अन्य चार तत्त्वोंसे जोडता है । इस क्रियाशील बुद्धिको वह नाउस कहता है । उसके मतमें जैसे शरीरमें पृथ्वी आप तेज वायू आकाश ऐसे स्थूलसे सूक्ष्म सूक्ष्मतर ऐसे घटक है वैसे बुद्धिके भी हैं । नाउस बुद्धिका यह सूक्ष्म तत्त्व है । वही ईश्वरको अनुभव करता है । वह आत्मकी भांति अमर हैं । उपनिषदमें भी एक स्थान पर इंद्रियां ईश्वरी वैभव देखनेके लिये जो सर्वत्र फैला है बाहर दौड़ती हैं ईश्वरके वैभव-दर्शनमें उलझे हुए इंद्रियोंको इस वैभवके स्वामित्वका भान कराकर उन्हे अंतर्मुख करना और आत्म-रत करना ही योग है और " वह हैं " इस अचल श्रद्धासे बुद्धिको ज्ञानेश्वरी १०३
वह शक्ति प्राप्त होती है और फल निरपेक्ष निर्मल बुद्धि (नाऊस ?) उनको आत्मरत करती है। शायद अरस्तूका नाउस मेधा अथवा केनोपनिषदकी "उमा" हो जो इंद्रके शरीरस्थ ईश बुद्धि है-अंतरिक्षमें उठकर व्योमस्थ होने पर ब्रह्मका रहस्य कहती है। बुद्धियोग—निष्काम कर्म-योगको बुद्धि-योग कहा गया है। बुद्धिको कर्म फलासक्तिमें न लगाते हुए कर्म करनेकी कुशलताको बुद्धि-योग कहा गया है। ईश्वर-चिंतनपूर्वक, ईश्वरेच्छा मानकर, प्राप्त कर्तव्य करके। उसमें या उससे किसी प्रकारकी अपेक्षा नहीं करना। ऐसे कर्म करते समय बुद्धिको ईश्वर निष्ठा अथवा ईश्वर चिंतनमें लीन रखना। इंद्रियों द्वारा बुद्धिको विषयोके पीछे न पड़ने देना। यह बुद्धि योगकी साधना है। बुद्धिको विषय, कर्म कर्मकांडादिमें लीन न होने देते हुए केवल ईश्वरसे जोडकर ईश्वर-लीन या आत्मलीन रखना ही बुद्धियोग है। ब्रह्म—ब्रह्म यह शब्द बृहद् बड़ा बहुत बड़ा जिससे बड़ा कुछ भी न हो ऐसे अर्थमें आया है। ऋग्वेदमें यह शब्द मंत्रस्तुति अथवा गूढ़ शक्ति इस अर्थमें आया है ऐसे विद्वानोंकी मान्यता है। किंतु उपनिषदकालमें ही इस शब्दका अधिक प्रयोग पाया जाता है। ओंकारको-प्रणवको-ब्रह्म वाचक माना है। शतपथ ब्राह्मणमें "परम तत्व" इस अर्थमें यह शब्द सर्वप्रथम आया है। आगे आगे ब्रह्म शब्दका अर्थ इतना व्यापक हो गया कि "यह सारा ही ब्रह्म है!" ऐसे कहा जाने लगा। सारे विश्वके मूलमें जो तत्त्व है उसको ब्रह्म माना जाने लगा। इस तत्त्वके विषयमें उपनिषदोंमें अनेक सिद्धांत कहे गये हैं। ब्रह्मके विषयमें जहां चर्चा है उसको "ब्रह्म-विद्या" कहा गया है। उत्तर मीमांसाका जो ग्रंथ है उसका नाम ही "ब्रह्म-सूत्र" है। "अथातो ब्रह्म- जिज्ञासा" यह इसका सबसे पहला सूत्र है। इस सूत्र ग्रंथ पर करीब २८ लोगोंने भाष्य लिखा है। जगद्गुरु आद्य शंकराचार्यके अद्वैत सिद्धांत श्री श्री रामानुजाचार्यके विशिष्टाद्वैत सिद्धांत श्री श्री मध्वाचार्यके द्वैत सिद्धांत तथा श्री श्री वल्लभाचार्यके शुद्धाद्वैत सिद्धांतकी आधार शिला यही ब्रह्मसूत्र है। ब्रह्मके विषयमें श्री शंकराचार्यके अद्वैत सिद्धांतके अनुसार ब्रह्म एक मात्र पारमार्थिक सत्य है। श्री शंकराचार्यके मतसे इस ब्रह्मको छोड कर और सब असत् है। यह ब्रह्म निर्विशेष तत्त्व है। यह सर्वव्यापी और चैतन्यमय है। यह स्वयं सिद्ध है। अज्ञानग्रस्त जीव इसको नहीं जान सकता। अज्ञानमुक्त जीव ही इसको देख सकता है। ज्ञान इसका साधन है! ज्ञानसे "तत् त्वं असि" "वहे तू है!" का अनुभव आता है! वैसे ही श्री भास्कराचार्यके मतसे ब्रह्म ही इस विश्वका एकमात्र तत्त्व है। इसको जाननेका साधन आगम है। यह अद्वितीय है। जगतका उपादान कारण भी ब्रह्म ही है। कारण ब्रह्ममें ही कार्य ब्रह्म निहित रहता है। ब्रह्मके विषयमें अलग अलग दार्शनिकोंने इतना अधिक कहा है उन सबको देखनेसे "ब्रह्मका भ्रम" बड सकता है। इसलिये उपनिषदकी शिक्षापद्धति अच्छी है। ब्रह्म मौन है। मौन ही ब्रह्मका वास्तविक रूप है। एक कन्नड संतने कहा है "बिना ओर छोरके लहर मारनेवाले आनंद सागरको शब्दके चम्मचसे कितना भार जायेगा ? और इसकी आवश्यकता भी क्या है ? मौन ही वास्तविक ब्रह्म ज्ञान है।" ब्रह्मचर्य—सतत सर्वत्र ब्रह्मचिंतन जन्य श्रेष्ठ आचरण। विषय चिंतनसे अन्य आचरण होता है। जिसके जीवनमें ब्रह्म-चिंतन जितना अधिक उसके आचरणमें एक प्रकारकी प्रतिष्ठा उतनी अधिक आती है। उसको बाहरी भोगादिकी आवश्यकताका अनुभव नहीं होता। अपनेमें ही एक पूर्णताका अनुभव बढ़ता जाता है। वह अपन आपमें सुखसंतोषका अनुभव करने लगता है। उसका मन सदैव प्रसन्न रहता है। उचटा हुवा नहीं रहता। इसलिए उसको मनोरंजनके लिए १७३ परिशिष्ट ५